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कबीरपंथी शब्दावली

Kabirpanthi Shabdavali

स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा

स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)

Devanagarihipublished968 पृष्ठ

शब्दावली

(६८५)

सठि हारेसौं । कालके करम जाल सब छुटैमिलि कवीर मत वारे सो ॥

होरी २०—खेलत फाग वसंत रैन दिन सहज सून्यमें होरी ॥ टेक ॥ सतगुरु दया साधुकी संगति त्रिकुटी महल रचोरी ॥ गुंजत भंवर कोकिला बोले सोहँ सोहँ सोरी ॥ बाजत ताल मृदंग झाँझि अगम निगमकी झोरी ॥ मानों कोटि भान ससि उगे जहां मनुवां विलगोरी ॥ सुरति सुहागिनि मन लिये मनुवां दिये सुमतिकी खोरी ॥ कहैं कवीर मगन भई विरहिनि ब्रह्मज्ञान झकझोरी ॥

होरी २१—हमारे को खेले ऐसी होरी, जामें आवागवन लागी डोरी ॥ श्रवण न सुनो नैन नहीं देखो, पिया पिय लागी लौरी । पंथ निहारत जनम सिरानो, प्रगट मिले नहीं चोरी ॥ जा कारन तुम गृह तज निकसे, लोक लाज कुल तोरी ॥ षट् दर्शन मिल स्वांग बनाये, लोगन लाग ठगोरी ॥ अंग भभूत गरे भृगछाला, कोइ लाये गुदर भर झोरी । चोवा चंदन अबीर अरगजा कपड़ा दे रंग रोरी ॥ जगन्नाथ बड़ी रामेश्वर, देश देशान्तर दौरी । अरसट तीरथ पृथी पैकरमा, पोहकर मैं लट बोरी ॥ वेद प्रमान भागवत गीता, चारों बरन टटोरी । कहैं कवीर सतगुरुके दया विन, भरम मिटे नहीं भौरी ॥

होरी २२—कैसी मजा कर डारी, ऐसे होरीके खिलारी ॥ भारी भ्रमकी सारी फारी, मानकी बेसर तोरी । लोभ मोहके कंकन फोरी, प्रेमके रंगमें बोरी ॥ ज्ञान गुलाल परो नैननमें, देखत नहीं जग सोरी । त्रिगुन बंद अंगिया टूटे, शब्द कुमकुमा मोरी ॥ नित्या नित्य देत है गारी, लाज सरम सब तारी । एकहि भाव बिलास करत है, कौन पुरुष को नारी ॥ पूरन प्रेमहि भूल गयो है, ऐसी न देख धमारी । साहेब कवीर परख रंगरंगिये, परखके कीन्हे न्यारी ॥

(६८६)

कवीरपंथी—

होरी २३—ऐसी होरी खेलो, जामें डुरमत लाज रहोरी ॥ शील सिंगार करो मेरी सजनी, धीरज मांग भरोरी ॥ ज्ञान गुलाल उड़ाव सखीरी, सुमता फेंट गहोरी ॥ होत धमार नगर तेरेमें, अनहद बेन बजोरी । गुरुसे फगुवा मांग सखीरी, हृदया सत् करोरी ॥ संस्कृत भाषा पठ पठ आये, ज्ञानी लोग कहोरी । मोह मायामें बहि गये सजनी, जमके फंद परोरी ॥ खेती बनिज गऊ औ बाछा, चेला शिष्य करोरी । नाव लगी है पार लगनको, कालीदहमें परोरी ॥ मान मनीकी मटकी सिरपर, नाहक बोझ मरोरी । मटकी पटक मिलो सतगुरु सो, साहब कवीर कहोरी ॥

होरी २४—दिग अंजन नैन सँवार, काहूको मारोंगी ॥ टेक ॥ भौंह बनी बरछीकी नोके, नैन बने खरसान विरहके बान नैनसे छूटे, गोसा चढी कमान ॥ चंद्रबदन भृगलोचनी माया, कर सोरा सिंगार । ब्रह्मा विष्णु महेश्वर देवा, इनको कीन्ही यार ॥ नरसे नार कियो नारको पुत्रसे साठ पदार । भुंगीरिषि पारासर देवा, इनको कीन्हा ख्वार ॥ जीव उबारन सतगुरु आये, तेरो लगे नहि लार । कहें कवीर सुनो भाई साधू, इनसे रहोहुशियार ॥

होरी २५—ऐसा रंग बनाया, मेरे नैनोमें समाया ॥ टेक ॥ पहिला रंग नबीजीका आया, जिन उमंद बगसाया । अलीजीके नाम रौशन दुनियामें, जीव जीव कलमा पढ़ाया ॥ दीन उन्हीने बनाया ॥ दुसरा रंग सोहै हम नैनको, जिनोंने सहादत पाया ॥ वे रनसूर लडे रन भीतर, सन्मुख सौस कटाया ॥ शहर कर्वलेका बसाया । तीसरा रंग सोहै पंजतनका, हूरे मंगल गाया । सिर सेहरा मुख मकना बिराजे, नूरके छत्र फिराया ॥ हाथ कंगन बंधवाया ॥ चौथा रंग रंगीले साहबके, रंग सबके

शब्दावली

(६८७)

मन भाया । औलिया अंविया गौस कुतब, या सब मिल रंग बनाया ॥ ध्यान मौलासे लगाया ॥

होरी २६-मेरे साहब आवन हार, होरी खेलोंगी ॥ करनीके कलस संजोय सकल विध प्रीत पांवडे डार । चरन पस्वार चरनामृत लेहौं, मनकी मनी उतार ॥ तन मन धन सब अरपन करिहौं, बहु विधि आरती साज । प्रेम मगन होय मंगल गावों, बिसरी कुलकी लाज ॥ धोखा धूर उडाव शरीरसो, ज्ञान गुलाल प्रकास । पारस पान लेवे सतगुरु सो, मेट दूसरी आस ॥ दया धर्म तन केशर घोरों, भाव भगति पिचकार । सत सुकृत अवीर अरगजा, देउंगी पिया पर डार ॥ साहब कवीर मिले मोहि सतगुरु, फगुवा दीन्हो नाम । आवागमनकी मेट कल्पना, पायो आनन्द धाम ॥

होरी ८-मेरे सतगुरु दीन दयाल, प्रीतम आयो हो ॥ टेका ॥ हंस उबारन जिव निस्तारन, अधम उधारन नाम । बंदीछोर मुक्तिके दाता, परम सनेही नाम ॥ साधु सन्त औ अति अभिलाषा, सब विधि पूरण काम ॥ जैसे चात्रिक स्वातिबूंको रटत है आठों जाम ॥ जिनकी सुरत लगी सतगुरु सों, बिसरे सुख ग्रह धाम । सतगुरु दया करत जीवन पर, देकर अविचल विश्राम ॥ आनंद मंगल उचार परम सुख, अमर कहत है जीव । सुमिरन दे सतलोक पठाये, ऐसे समरथ पीव । चरन कमल सतगुरुके सेऊं, मन चित दे अनुराग । कहैं कवीर ऐसी होरी खेले, जाके पूरन भाग ॥

होरी ९-होरी खेलत लालनके संग प्यारी, हम देखी सुसक्यान ॥ टेक ॥ ज्ञान गुलाल अगर कस्तूरी, प्रेम प्रीति पिचकार । क्षमा केशर ले छिरकन आई, सुरति-सोहागिन अविगतनार ॥

(६८८)

कबीरपंथी—

पांच सखी मिल संगल गावैं, सुषमन थार सँवार । चंद सूर दोउ दीपक बारैं, ब्रह्म जोत उनमुन उजियार ॥ मैं मेरे पियको नितउठ चाहों, जो पिया मोहिको चाहि । आवागमनके फेरे मिटावे, भौसागरमें बहुरि न आहि । शीलकी सेज सँवार महलमें, लौका सिंगार करोरी । साहब कबीर सुरत संयोग, ले, संतलोक गये रसभोगी ॥

होरी १०—कायानगरकी पौररी, मन खेलत होरी ॥ टेक ॥ सुरत ज्ञान डफ बाजन लागे, अनहदके घनघोर री । पांच पचीस बनिता बनि आयी, तेऊ रंगमें बोररी ॥ अबीर गुलाल हेत कर सजनी, प्रेमकी चाचर जोररी ॥ तन नारी औ मन है नारायन, प्रीतम अंग मरोररी ॥ खोल चुण्ट सन्मुख होय खेलो, होनी होय सो होयरी । कहैं कबीर औसर नहि पैहो, फगुवा लेउ न बोररी ॥

होरी ११—ऐसे खेलत फाग बसंत, निरंजन सहज सुन्नमें होरी ॥ टेक ॥ बाजत ताल मृदंग झांझ डफ, अगम निगमकी डोरी । मन एक भँवर कोकिला गुंजे, सोहैं सोहैं सोरी ॥ अष्टकमल दल भीतर मनुवां, त्रिकुटी महल रचोरी । कोटि भानु जगमग उजियारो, जहैं मनुवां बिलमोरी ॥ मानसरोवर हंसा डोलै, अति घन पुहुप फुलोरी । जरा मरनकी ससै मेटो, जाति बग्न बिसरोरी ॥ सुरति सोहागिन संग लिये मनुवां, हाथ सुमतिकी डोरी । कहैं कबीर मगन भई बिरहिनि, ब्रह्म जलमें झकझोरी ॥

होरी १२—तुम संतो खेलो संभारी, जग या होरी मच रही भौभारी ॥ टेक ॥ जड चेतन दो रूप बनाये, एक कनक दूजी नारी । पांच पचीस लिये संग अबला, हँस हँस मिल गावैं गारी ॥ दुरमति डिंभ गहे करमें डफ, हों बड हों बड दे तारी । त्रिगुन तार तमूरा बाजे, आशा तृष्णा गत न्यारी ॥ चोवा चंदन अबीर

शब्दावली

(६८९)

अरगजा, मायाकी गागर भारी। षट् दृशन् पाखंड छानबे, पकर किये सब बेगारी॥ लोभ मोह दोउ भर पिचकारी, छूटत है बारं बारी। जो कोइ सनमुख होयके खेले, उनको छींट लगी कारी॥ कुमति गुलाल डाल मुख मींड़े, काम कला पुटरी मारी। सुर नर मुनि औ पीर औलिया, भीज रहे सब संसारी॥ चतुरन फगुवा दे दे छूटे, मूरखको लगी प्यारी। कहैं कवीर सुनो भाई साधू, निरगुन ज्ञान गली न्यारी॥

होरी १३-ऐसी खेलत फाग सबै नारी, जाके हाथ लकूट मुखमें गारी॥ टेक॥ ग्रिह ग्रिह ते निकसी बनि सुंदरि, भांतिन भांति पहिर सारी। अबिर गुलाल लिये भरझोरी, मिलन चलीं पियको प्यारी॥ अपने अपने झुंडसों निकसीं, गावत तरुन ब्रिध बारी। बैठीं जाय हरिमंदिरमें जहां, बैठे वर मूरत धारी॥ एकन मूठी चोवा चंदन चरचे, एकन मूठी भर मारी॥ एक खड़े सनमुख कर जोरे, एकन हाथ चैंवर डारी। को बोले को चितवे कासों, निरजीव रूप कहो कारी॥ निहुर निहुरके पांय परत हैं, ये देखो अचरज भारी। सबै सहेलरी मुरक चली हैं, कोई न संग गई प्यारी॥ आपहिं नर नारी होय बैठे, प्रान पियाकी गत न्यारी॥ ये सब भर्म छोड़ दे बौरी, अबकी जन्म जुवा हारी। कहैं कवीर अपनपौ खोजो, सुखसागर सुखकी बयारी॥

होरी १४-अब कहां जात बेदरदा हो, मोपे गरदा झारके॥ टेक॥ आये बसंत सबै बन फूले, बन बन हो गये जरदा। जबसे लागी बसंत पंचमी, सब बन होगये मरदा। लोक लाज कुल कान बिसर गई, अंदर खुल गई परदा॥ चलोरी सखी मिल चौसर खेले, पासा परगये नरदा। कहे कवीर सुनो भाई साधू, गुरु चरननकी सरधा॥

(६९०)

कवीरपंथी—

होरी १५—जग या दुई खेलेत होरी, बनी हंसनकी जोरी ॥ टेक ॥ सतगुरु तो सतलोकसे आये, बांधोमें फाग मचोरी । धरमदास उठि चरनन लागे, ये दोई मेल रहोरी ॥ सो तो नहिं जात कहोरी—जग या दुइ—गुरु शिष्य मिल होरी खेले, संत खले चहुं ओरी । प्रीति परस्पर सांची कहिये, ज्ञान ग्रंथ गठजोरी ॥ सो तो सुरझावत कोरी—जग या दुइ—धर्मदास आमिन समुझावे, सब मिल चरन गहोरी । बडे भागसे सतगुरु आये, सब मिल चरन परोरी ॥ यामैं कछु नाहिंन खोरी—जग या दुइ—कहैं कवीर सुनो भाई साधू, जीवन भाग जगोरी । नाम पान परवाना पाये, फगुवा मिलो भरझोरी ॥ जनमसो तिलुका तोरी—जग या दुइ— बोलत होरी ॥

होरी १६—रंग खेलेत फाग सुघर नारी, हाथ सुमति लिये पिचकारी ॥ टेक ॥ पांच पचीस सखी संग निकसीं, सुकित रूप पहिर सारी । धीरज अंजन सीमाकी बेंदी, झीलसिंहूर मांग भरी ॥ बाजत ताल मृदंग झांझ डफ, सब मिल गावैं मंगल चारी । ज्ञान गुलाल अनंद अरगजा, सहजे अबीर उड़त भारी ॥ दया धरमको केसर घोरी, प्रेम प्रीति छुटे पिचकारी । शब्द छडी जबही कर लीन्हें, समुझे संत पर जाय मारी ॥ सुंदर फाग खेले चेतन सों, एक महलमें पिय प्यारी । कहैं कवीर छबि कहैं लग बरनो, सुमति पर कोटिन सुकता वारी ॥

होरी १७—रितु फागुन नियरानी, कोई पियाको मिलावो ॥ टेक ॥ सोई सुंदर जाके पियाको बरत है, सो पियके मन मानी । खेलेत फाग अंग नहिं मारे, सतगुरुसों मन ठानी ॥ पियका रूप कहाँ लग बरनो, पियके रूप लुभानी । सुर नर मुनि जाको ध्यान धरत हैं, सो संतन मिल जानी ॥ एकहि खेले गई गृह अपने,

शब्दावली

(६११)

एकहि कुल उरझानी । एकहि नाम बिना डहकावे, हो रही ऐंचा-तानी ॥ तुम जिन जानो एही फाग है, ये कछु अकथ कहानी । कहें कर्वार सुनो भाई साधू, बूझे बिरला ज्ञानी ॥

होरी १८-या मन निपट अनारी, होरी खेलन न जाने ॥ टेक ॥ काम क्रोध औ लोभ मोहकी, सिर पर गठरी भारी ॥ या नगरीमें पांच मवासी और पचीसों नारी ॥ इन्हें मार होरी खेलो पिया संग, बात सुधर जाय सारी ॥ सखी सहेली होरी खेलैं पिया संग, कुमति सखी रहु न्यारी ॥ कहें कबीर ऐसी होरी खेलो, हाथ सुमति लिये पिचकारी ॥

होरी १९-गगन मंडल उरझानी, नित फाग मची है ॥ टेक ॥ ज्ञान गुलाल अबीर अरगजा, सखियां ले ले धाई । उमैग उमैग रंग डार पिया पर, फगुवा दैव बहाई ॥ फगुवा नाम मिले मोहि सतगुरु, तनकी तपन बुझाई । शब्द डार जहां अगर उड़त है, शोभा बरनि न जाई ॥ गगन मंडलमें होरी मची है, गुरुगम झर लख पाई ॥ कहें कबीर मगन भई विरहिनि, आवागवन नसाई ॥

होरी २०-ऐसे नाम उजागर, होरी खेलन बर आये ॥ टेक ॥ कासीमें सतगुरु प्रगट भये हैं, नीरूके गृह आये । रामानंदके शिष्य भये हैं, निरगुन पंथ चलाये ॥ कथ निरगुन निज नाम अभय पद, सुन पंडित रिसियाये । षट् दरसन मिल बादको आये, जीत न काहू पाये ॥ एक दिना सब प्रपंच बहु कीन्हें, नारद आन लदाये । सबे लुटाय कछु नहीं राखी, लीन्हें साधु बुलाये ॥ कपड़ा बुने बैच ले आवें, तामें सबको देई । लाख टका कोई आन चढावे, ना काहूको लेई ॥ साह सिकंदर परचे लीन्हा, करामात दर्ई तीन्ह । कासी तज प्रभु मगहर आये, तब कछु

(६९२)

कबीरपंथी—

चितवन कीन्ह॥ जलमें बोर अगिनमें डारे, विनशत नाहिं शरीर । मस्ता हाथी आन झुकाये, निरभय सत्य कबीर ॥

होरी २१—बीतो जात बहार, होरी खेलन आई॥ टेक॥ पांच पचीस बनिता बन आई, खेलत धूम धमार । अपन पिया संग होरी खेलो, मेट सकल भ्रम जार॥ आतम रंग सुरंग बनाये, प्रेम प्रीति पिचकार । कहैं कबीर ऐसी होरी खेलो, आवागवन निवार॥

होरी २२—होरी खेलन तो जाग सखीरी, फिर ऐसा दाव न पाइये॥ टेक॥ मनको तार बिरहमिरदंग, बाजत हरिगुन गाइये॥ तन कर मटका मन कर केशर, झीलको रंग जमाइये ॥ चोवा चंदन अबीर अरगजा, सांचेको टीको लाईये ॥ जप कर मंजन तप कर संजम, दर्शन फगुवा पाईये ॥ कहैं कबीर सुनो भाई साधू, नाम पदार्थ धाइये ॥

होरी २३—अपने पिया संग होरी खेलो, सुमति सखी संग लाय ॥ टेक॥ खेलों मैं होरी अंगना मेरो, तन मन सुरति लगाय । प्रीतम पास आस भई पूरन, राखों मैं हिरदै समाय ॥ दुबधा दुरमति दूर परानी, जब देखो निरताय । परसत अंग रंग भये अविचल, तनकी तपन बुझाय ॥ अजर अखंड अमान अभै पद, कौन सकै गुन गाय । गुनवंती निर्गुन गुन राखो, गुरुगम प्रीतम पाय॥ प्रीतम पास सेज सुख विलसो, यह सुख बरनि न जाय । धर्मदास ऐसी होरी खेलो, सब संशय मिट जाय ॥

होरी २४—हेरे प्रीतमजी की बाट, ठाढी अलबेली ॥ टेक॥ गंगा जमुना बहे सरस्वती, तिरवेनीको घाट । अर्ध उर्धके मध्यमें मूरख पाई सांट । सगरे पंथ बिच दोय गली जहां, भर केशरको मांट॥ कुमति करार होय रही अभागिन, मत कर मनकी आंट । पिया दरसनको प्यास भई है, चली जगतसे फाट॥ काम क्रोधकी मूठ

शब्दावली

(६९३)

त्यागके, जगसों भई उचाट । कहैं कवीर मिलो पिय प्यारी, सतगुरु खोल कपाट ॥

होरी २५—छाये प्रीतमजी परदेश, मैंने अब जानी ॥ टेक ॥ अंग बिभूति रमाऊं निसि दिन, स्वेत जटा भये केस । घर घर अलख जगावत डोले, धर जोगिनको भेश ॥ मैं भौसागर भूल रही हों, लिखना भयो संदेस । ऐसे सतगुरु नाहि मिलै, मेरी सुर्त करे परवेस ॥ जाकी ध्यान धरे ब्रह्मादिक, ध्यावत शंकर सेस । नाम लेत भौसागर छूटे, कट गये करम कलेस ॥ जेठ देवरके मोह त्यागके, पियसे बांधो लेस । कहैं कवीर मिलो पिया प्यारे, छूटे सकल अंदेश ॥

होरी २६—तू कैसे हूस रहीरी, नहि हूसन वारी ॥ टेक ॥ कबकी मैं ठाढी तोहि मनाऊं, तू नहि चितमें धारी । गगन मंडलमें धूम मची है उठ चल वेग संवारी ॥ ईगला पिगला हाथ छरी ले, सुषुमन केशर गारी । पांच पचीस भई एक ठौरी, गावे दे दे तारी ॥ जरद कसबका लैहंगा सोहै, और कसुंमल सारी । कहे कवीर ऐसी होरी खेलो, निरतत सुषुमन नारी ॥

होरी २७—खेलो खेलो सुहागिनि होरी ॥ टेक ॥ चरण सरोज पिया हित जौलों, रजकी केशर घोरी ॥ भरम अबीर उडाव सखीरी, लोक लाज कुल तोरी ॥ सोहम् नार जहाँ रंग राची, बीच सुषुमना डोरी ॥ पुरुष पंच गली एक जानो, एकहि संग ढंढोरी ॥ शब्द सजीवन रुयाल पीवका, गहि लीजे निज डोरी ॥ रंग अनंग सखी मत राचो, पियके पांव परोरी ॥ कहैं कवीर ऐसी होरी खेलो, भिटे जमके झगरोरी ॥

होरी २८—पियके रंग रंगी कोई, मेरो काह करेगो ॥ टेक ॥ पिया मेरे सजनी मैं पियकी, पियके पांव परोरी । पियकी सेज

(६९४)

कवीरपंथी—

सँवारत सजनी, सर्व सोहाग भरोरी ॥ कर सिगार मगन भई ठाठी, बिरहिन रूप खड़ी । साहब कवीर पिय पाये सजनी, सबको काज सरी ॥

होरी २९—कोई मोपै रंग न डारोरी, मैं तो भई हों बावरी ॥ टेक ॥ एक तो बौरी दूजी बिरहकी माती, तीजे नेह लगायोरी ॥ ज्ञान गुलाल अगर कस्तूरी, प्रेम प्रीति पिचकारोरी ॥ पांच सखी मिल होरी खेलैं, और सुहागिन नाररी ॥ अपने पिया संग होरी खेलो, यही वसंत यही फागरी ॥ कहैं कवीर ऐसी होरी खेलो, आवागमन निवाररी ॥

होरी ३०—अहो मन सा मदमाती खेलो रंग भरी ॥ टेक ॥ आस पास सब सखी विराजें, ता बिच आप खड़ी ॥ चंचल चपल चातुरी बोलैं, नैनन सैन करी ॥ इन्द्रहि जाय आप बस कीन्हे, ब्रह्मा चले पराई । तिनहुं जाय काम बस कीन्हा, सकुच रहे सिरनाई ॥ शंकर ध्यान छूटे ना कबहुं, बहु बिध कीन्ह उपाई । देखो रूप मोहनी केरे, पीछे काम जगाई ॥ सुर नर किन्नर जच्छ गुनीजन, कोई धरे नहिं थीर । साहब कवीर आप अविगत है, माया जीत शरीर ॥

होरी ३१—आज पियाके मिलनको मैं गेंद भई ॥ टेक ॥ घरसों निकस अँगन भई ठाठी, ले चौगानमें डार दई ॥ ज्ञानकी गेंद सुरतको डंडा, जित चाहो तित ढरक गई । पांच पचीस खेलैया ठाढे, घाट बाट फिर रोक लई ॥ सतगुरु ढोला दियो शब्दके, तैंतीसोंके बस न भई । कहैं कवीर सुनो भाई साधू, निहाल भई जब हाथ लई ॥

होरी ३२—अहो सोई नार सयानी, प्रीतमके मन मानी ॥ टेक ॥ प्रीतम हमको पतिया पठाये, देखतही मुसकानी । पातीके बाँचत

शब्दावली

(६९५)

छाती जुड़ाई, रूपमें रूप समानी ॥ रंगमहलमें आय पुन वैठी, यही वस्तु निज जानी । गगन मंडलमें खेल रचो है, सोई देख ललचानी ॥ परमपुरुष अविगत अविनाशी, ताकी अकथ कहानी । कहैं कवीर सुनो भाई साधू, शब्दमें सुरति समानी ॥

होरी ३३-सतसुकृत खेलैं होरी; अभय नगर अस्थान ॥ टेक ॥ इतसों आये ज्ञान लाडले, उतसों आई मन बौरी । त्रिबेनी तट खेल रचो है, खेलत हो हो होरी ॥ इतसे पांच सखी उठ धाई, कोह स्यामल कोह गोरी । त्रिगुन पिचकारी हाथ लिखे सब, खेलत हो हो होरी ॥ इत सों क्षमा सखी उठ धाई, शील सुमति दोड जोरी । प्रेम पिचकारी रंग रोस सहित, झगरत खेलत होरी ॥ ताल मृदंग झांझ डफ बाजे, अनहद शब्द करोरी । सुषुमन नारी राग अलापत, गावत मंगल होरी ॥ सुरति निरति द्वै मता बनाये, चलो अगम संग होरी । मेरुदंडके छप्पे चढके, खेलत हो हो होरी ॥ मूल कमलते रंग बढो है, बंकनाल निज ठोरी । सुरतिनाल चढ बाहिर आये, खेलत हो हो होरी ॥ खेलत खेलत जहां गयी है, सतगुरु शब्द किये सोरी । साहब कवीर दयानिधि सागर, खेलत हो हो होरी ॥

होरी ३४-होरी खेलैं संत सुजान, आतम राम सों ॥ टेक ॥ घरि घरि पल पल छिन छिन खेलैं, निस दिन आठों जाम ॥ योगी खेलैं योग ध्यानमें, दुनियां भूत पखान ॥ पंडित खेलैं चार वेदसे, मुलना किताब कुरान ॥ पतिबरता खेलैं अपने पिया संग, वेश्या सकल जहान ॥ महा प्रचंड तेज मायाको, सब जग मारा बान ॥ कामी खेलैं कामिनिके संग, लोभी खेलैं दाम ॥ साहब कवीर खेले संतनसों, और न काहू काम ॥

होरी ३५-मेरी उमर आई होरी खेलनकी, पिया मोसे मिलके बिछुर गयेरी ॥ टेक ॥ पिय हमारे हम पियकी पियारी, पिय मोसे

(६९६)

कवीरपंथी-

अंतर कर गयेरी ॥ पिया मिलै तो जीऊं मोरी सजनी, पिय विन जियरा निकस गयेरी ॥ अबीर गुलाल लिये भर झोरी, पिय प्यारी संग रंग रहेरी ॥ धर्मदास बिरहिन पिय पाये, चरन कमल चित लाग रहेरी ॥

होरी ३६-प्रथम फाग वसंत पञ्चमी, सतगुरु मेहेर करोरी ॥ टेक ॥ अब पकडो छूटे नहिं कबहुँ, पियसों जाय मिलोरी ॥ प्रथम गुफामें बैठके सजनी, नाभी आड दईरी ॥ दूजे बंद कंठ ले छेदो, सूखी नाल भईरी ॥ करम भरमके बरुवा काटे, चेतन अगिन दईरी ॥ दियो जराय कुबुध कलेसको, उडके अकाश गईरी ॥ चोवा चंदन अबीर अरगजा, केशर कीच भरोरी ॥ धीरज ध्यान प्रेम कुमकुमा, रंग सतसुधि न रहोरी ॥ आपहि खेल खेलारी साहब, आपहि ज्ञान गुनोरी ॥ दिना चार मायाको रूयालै, खेलत आप धनीरी ॥ इहँ उहँ बाहिर भीतर सबमें, जानै जान गुनीरी ॥ ज्ञान गुलाल लगावो सखीरी, सतगुरु संग चलोरी ॥ कहैं कवीर सुनो भाई साधू, एकहि फूल फुलोरी ॥

होरी ३७-या मन जालिम जोर रे, बरजो नहिं माने ॥ टेक ॥ निसि बासर सो चलत रहत है, सांझ गिनै नहिं भोररे ॥ कोटि जतन कर तनमें राखों, भागे सांकर तोररे ॥ सात द्वीप इकइस ब्रह्मांडलों, जहाँ लग याकी दोररे ॥ सुर नर मुनि औ पीर औलिया, काहू न पायो चोररे ॥ ब्रह्मा विष्णु महेसुर कहिये, एहि कटे चित चोररे ॥ कहैं कवीर जुगतसे राखो, गुरु चरननकी बोररे ॥

होरी ३८-ये फागुन दिन चारी, होरी खेल मनारे ॥ टेक ॥ दया धरमको केशर घोरी, प्रेम प्रीति पिचकारी । बाजत ताल श्रुदंग झांझ डफ, अनहद धुनि झनकारी ॥ उड़त गुलाल लाल भये बादर, बरसत रंग अपारी । बीच बीच मुरली धुनि बाजे,

शब्दावली

(६९७)

रोम रोम लगी तारी ॥ दस दरवाजे घेर मन पकरो, डुरमति खैंच उतारी । घूंघुटके पट खोल गये हैं, लोक लाज सब झारी ॥ होरी खेल उलट घर आवे, सो तिरिया पिय प्यारी । कहैं कवीर टरे नहिं टारी, परम पुरुषकी नारी ॥

होरी ३९-फागुन आयो दुख देन सखीरी, मेरो पिया घर नाही ॥ टेक ॥ अपने अपने भवनसो निकसे कामिन कंथ । मेरो पिया परदेस सखीरी, मोको कैसे बसंत ॥ चोवा चंदन अबीर अरगजा, का घसि लाँक अंग । सुध बुध मेरी गई सब सजनी, वाही पियाके संग ॥ तेरो पिया समीप सखीरी, तू तो हिलमिल खेल । नाहीं वर मेरोरी सजनी, गयो है ऊभी मेल ॥ एक संदेशा सुनरी सजनी, पिया घर आवैगे आज । दुबरी विरहिन भई बावरी, अजहुँ न आवे लाज ॥

होरी ४०-खेलो सइयां संग होरी, रंग भीनी पिया सों ॥ टेक ॥ निरगुन रूप लियो घट भीतर, मनसा हौदे भरोरी । चित चोवा बुध कैशर कहिये, भाव अरगजा घोरी ॥ शील संतोष ज्ञान उजियारो, पिचकारी भक्ति भरोरी । कहैं कवीर ऐसी होरी खेलो, जाते भाग जगोरी ॥

होरी ४१-फागुन मेरोरी मैं कैसे भरों दिन रैन ॥ टेक ॥ परकी फाग पिया संग खेली, अबीर गुलाल उड़ाय । आसोंकी फाग पिया घर नाही, खेलोंगी हमरी बलाय ॥ हमरे आंगन चंदनके बिरवा, जहैं चढ बोले काग । झूठे सगुन तुम्हार सखीरी, झूठे बनके काग ॥ उड़ उड़ काग सुलछना, जो पिय आवैगे आज । असी कोस मोरे पिया बसत हैं, सो कस आवैगे आज ॥ हमरे बालम फुलवारि लगाई, मृगा चुन चुन जाय । मारोंगी मृगा गुलेलसों, नयन कमान चढाय ॥ अपने बलमाको पतिया भेजों,

(६९८)

कवीरपंथी—

नयन कज्जल मसि लाय । बीच बीच बिरहा लिख भेजो, दुख सुख लिखो न जाय ॥ सतगुरु आये कंठ लगाये, मिट गइ तपन हमार । गुरु प्रताप ताप गई तनकी, धर्मनि कहें पुकार ॥

होरी ४२—मैं तो आन परी चोरनके नगर, सतसंग बिना जिव तरसे ॥ टेक ॥ हाथके हीरा डार दियो, का सूठी भरी कंकरसे । होरी खेलनकी यही बेर है, फिर चौरासी मंदिलसे ॥ अपने पिया संग होरी खेलों, और न काहू मनसे ॥ कहैं कवीर यह मोहिं लखाया, क्या छोड़ चले हो फिरसे ॥

होरी ४३—मैं तो अब कैसे खेलोंगी होरी, मोहि लागी शब्दकी डोरी ॥ टेक ॥ या होरीका सकल पसारा, लोग कहे थोरी थोरी ॥ होरी खेलो जो अपने पिया संग, या होरी मेरे अंग बयोरी । निश्चि दिन खेलों अपने पिया संग, दूटत नाहिं न डोरी ॥ धर्मदास सतगुरु सों माते, साहेब कवीर भ्रम तोरी ॥

होरी ४४—गुरु लाये मुक्तिके पान, प्रीतम आये हो ॥ टेक ॥ पान परवाना देत जीवनको, वे पावैं सुख धाम । चौदा लोक पर जोत निरंजन, तीन देव परमान ॥ तीरथ व्रत औ चार वेदमें, इनमें जगत भुलान । सात सुरतिके ऊपर कहिये, सोइ पुरुष पुरान ॥ सही छाप गुरु उहांसो लाये, समरथके फुरमान । सतयुगमें सतसुकृत कहिये, त्रेता सुनिंदर नाम । द्वापरमें करुणा-निध स्वामी, कलियुग कवीर निधान । कालको जीव कही नहिं माने, कोट सुने जो ज्ञान ॥ जैसे लाख अगिनमें पिघले, बिछुरत काठ समान । जे करतासे सब जग उपजो, भूले ठौर ठिकान ॥ जुगनके जुगनके बिछुरे हंसा, भेटे पुरुष पुरान । तेरह पीढ़ी ज्ञान रजधानी, दोऊ दीन ले पान ॥ राजा रंक सकल फिर आवे, छोड़ि कुल अभिमान । पांच हजार पांच सौ बीते, चलि है पंथ

शब्दावली

(६९९)

निशान ॥ घर घर सत्य शब्द जो फैले, सतजुग बरते आन । साहब कवीर आये निज घरसो, फगुवा दीन्हे नाम ॥ निरगुन भगतीरूप कलजुगमें, वेद मरम नहिं जान ॥

होरी ४५—मेरे मन परदेसी मीत, होरी खेलिये ॥ जब जैहो घर आपने, तब कौन तुम्हारे साथ ॥ टेक ॥ बाहिर खेलन नाहीं पैहो, आनि गहे जमराज । बांह पकर जम ले चले, धरी रहे सब साज ॥ जो तुम काज आपनो चाहो, नाम गहो बहु भांत । अजहुं चेत अचेत बावरे, जन्म सिरानो जात ॥ ज्ञान पुटरिया बांधके हो, सुरत अबीर उडाव । जाय लगे पियके हिये, अब खेलनको दाव ॥ पांच नार तुमको सजी, पांच हुए के जात । वे रस चाहें आपनी, अपनी अपनी भांत ॥ साहब कवीर होरी रचो, मचो कुलाहलसोर । समझ देख नरबावरे, येतो होरी कैसे मोर ॥

होरी ४६—तेरो है घर कंथ सुजान, खेलो रंग भरी । जनम जनमकी मिटी कल्पना, पायो जीवन प्रान ॥ टेक ॥ पांच सखी मिल मंगल गावैं गुरुगम शब्द बिचार । बाजत ताल मृदंग झांझ डफ, उठत शब्द झनकार ॥ खेलन चली पंथ प्रीतमके, तनकी तपन बुझान । पिचकारी छूटे अति अदभुत, रसके कीच बहान ॥ सतगुरु मिल आपा बिसरावैं, लागी खेल अपार । जित कित होहो होय रही, रटना लगी हमार ॥ सुख सागरमें न्हाइये, निरमल भये शरीर । आवागमन तब मेटिया, जब फगुवा पाये कवीर ॥

होरी ४७—तज काम क्रोध मद मोह होरी खेलिये ॥ टेक ॥ ज्यों पंकज जलमें रहे, जल नहिं परसत देह । उर माया मन परहरी, सतगुरुसे कर नेह ॥ ज्ञान सुगंध गोद भर लीजे, कुबुध गुलाल उड़ाय । सत्यनाम गुन गाइये, जश को डफ बजाय ॥

(७००)

कवीरपंथी—

मानुष जन्म डुरलभ है संतो, खेलो फाग सुभाव । कहैं कवीर चित् चेतो हंसा, बहुर न ऐसो दाव ॥

होरी ४८—मिल खेलो बिमल बसंत, प्यारे कंथसो । खोल अंधेरी कोठरी, मिल बैठो महल एकंत ॥ टेक ॥ गगन मंडल दीपक धरे महल करो उजियार । छैल छबीले कब मिलो, मेरे जीवन प्रान अधार ॥ गंग जसुनके अंतरे, चंद सूरके बीच । अर्ध उर्धके मध्यमें जहां मची अरगजा कीच ॥ बिन पग निरत होत है, बिन कर बाजे ताल । बिन नैनन छबि देखिये, बिना सरवन झनकार ॥ जहां सुरंग रंग रहो, हिल मिल एकहि ठांव । धर्मनि भेटे भावसों, गुरु पाये अपने नाव ॥

होरी ४९—खेलत फाग वसंत रैन दिन । सहज शुन्यमें होरी ॥ टेक ॥ सतगुरु दया साधुकी संगति । त्रिकुटी महल रच्योरी ॥ गुंजत भंवर कोकिला बोले । सोहं सोहं सौरी ॥ बाजत ताल मृदंग झांझि । अगम निगमकी झोरी ॥ मानो कोटि भान ससि ऊगे । जहां मनुवां विलमोरी ॥ सुरति सुहागिनी संग लिये मनुवां । दिये सुमतिकी खोरी ॥ कहैं कवीर मगन भई विरहिनि, ब्रह्म ज्ञान झकझोरी ॥

फाग प्रारम्भ ।

फाग १—मेरे सतगुरु आये आज खेलन फागरी । वानी बिमल सुगन सब बोले अति सुख मंगल रागरी ॥ टेक ॥ चाँचर सरस सखा संग बोले । अनहद बानी रागरी ॥ शब्द सुनत अनुराग होत है । कहा सोवे उठि जागरी ॥ पानी आदर पवन बिछौना । बहुत कहूं सन्मानरी ॥ देत अशीस अमर पद लेऊँ । अब चल युग युग राजरी ॥ चरन प्रच्छालि चरनोदक लेहु । उठि उनके

शब्दावली

(७०१)

पग लाग री॥ पांच सखी मिलि मंगल गावे । पीव अपने संग लाग री ॥ पांच अमृत भोजन लेवै । प्रेम प्रीति भरि थार री ॥ महा प्रसाद संत सुख पावे । आनि खुले मेरे भागरी॥ चौरासीकी बंध छुड़ावन । आये सतगुरु आपरी॥ पान प्रवाना देत जीवनको । वे पावैं सुख वास री॥ चोवा चंदन अरगजा कुमकुम । पुहुप माल गल हार री ॥ फगुवा माँगि मुक्ति फल लेवौं । जीव अपनेके काजरी॥ सोलहो सिंगार बत्तीसो आभरन । सुरति सिंगार सँवौररी॥ संत कवीर मिले सुख सागर । आवा गवन निवार री ॥

फाग २-मिलि खेलो विमल वसंत । प्यारे कँत सों ॥ खेली अंधेरी कोठरी मन । बैठो महल इकंत॥ टेक॥ गगन महल दीपक धरा हो । भवन कियो उजियार ॥ छैल छबीलौं ना छीपै । मेरे जीवन प्रानाधार ॥ विन पग नटवा निरति होत है । विन कर बाजे तार ॥ विन नैन जहाँ देखिये । विन श्रवण सुनि झन्कार॥ गढ़ जमुनके अंतर है । चंद सुरजके बीच॥ अरध उरधकी संधिमें । जहाँ मची अरगजा कीच ॥ रंग सुरंग रङ्ग रंगि रहे हो । हिलि मिली एकै ठाँह॥ धर्मनी भेटे भावसों हो । मिले पुरातम नाह॥

फाग ३-जहाँ मन पावे विसराम, संगति साधुकी । साधु संत मिलि होरी खेलो, निशि दिन आठों जाम ॥ टे०॥ होरी हरिको नाम है हो । लीजिये गाय बजाय ॥ फगवा बारह मास है हो । तुम मति विसरो ताहि ॥ पिचकारी नासा बनि हो । स्वासा कैसर रंग ॥ भरि भरि डारै सुषमना । धुनि अनहद ताल मृदंग॥ तीन रंग एकै भयो है । पीत श्याम अरु सेत॥ होरी खेले आत्मा । परमात्म कंत समेत॥ कवीर बलि गुरुदेवकी । पद परसत राजा राम॥ जापर दया भई सतगुरुकी । जुग जुग अविचल धाम॥३॥

(७०२)

कवीरपंथी-

फाग ४-करि सुमरन सुरंग होरी खेलिये हो । ज्ञान पिचकारी ध्यान केशर भरि ॥ या विधि मनको लहिये हो ॥ टे० ॥ पांच सखी मिलि उठि उठि धावै । इनकी लुकट बचइये हो ॥ काम क्रोध अरु लोभ मोह सब । अबीर गुलाल उड़इये हो ॥ बाजत ताल मृदंग झांझि डफ । अनहद नाद बजइये हो ॥ सुरति निरति और राग रागिनी । अनचित चितसो गइये हो ॥ चोवा चंदन अरु अरगजा । रसकी कीच मचइये हो ॥ कहै कवीर तब साध कहावैं । गुरुसों फगुवा पइये हो ॥ ४ ॥

धमार प्रारम्भ ।

धमार १-नित मंगल होरी खेलिये हो । अहो मेरे संतो नितही वसंत नित फाग ॥ टेक ॥ दया धरमकी केशर घोरो । प्रेम प्रीति पिचकारी ॥ भाव भगत सों भरि सतगुरुको । सुफल जनम नर नारी ॥ छिमा अबीर चरच चित चंदन । सुमरन ध्यान धमारि ॥ ज्ञान गुलाल अगर कसतूरी । उमंगि उमंगि रंग डारि ॥ चरणामृत प्रसाद चरण रज । अपने शीश चढाय ॥ लोक लाज कुल कानि मेटिके । निर्भय निशान बजाय ॥ कथा कीर्तन मग्न महोछब । करि संतनकी भीर ॥ कबहुँ ना काज विगड़ है तेरो । सत सत कहैं कवीर ॥ १ ॥

धमार २-कोई नाम सनेही खेले वसंत । अहो मेरे संतो कुलकी हो कानि निवारी ॥ टेक ॥ सत्संगति अरु दया भावसों । लागो प्रेम गुरु संग ॥ आसा मूल निराश विसारी । बाजत नाद मृदंग ॥ डिम कपट गुलाल उड़े जब । लागो रंग अपार ॥ पांच सखी मिलि मंगल गावे । लागि रही इक तार ॥ खेलन चली पंथ प्रीतमके । अति ही उलास आनंद ॥ भव विसारि कहु शंक न

शब्दावली

(७०३)

कीन्ही । सुरति शब्द गठि बंद ॥ चाचर रचि संग प्रीतमके । खुलिया ज्ञान भंडार ॥ पीवत नाम महारस छोके । निरखत रूप अपार ॥ कहैं सुने कछु वनती नाहि । जो खेले संत सुजान ॥ अजर अमर अविनाशी साहेब निर्भय नाम अमान । जरा मरण भय संशय छूटी । छाडचो विष संसार ॥ दास कवीर ऐसे खेलिये हो । आवागवन निवार ॥

धमार ३-निज नाम रंगीले रंग रंगे हो । अहो मेरे संतो छोड़ो हो कर्म अपार ॥ टेक ॥ छोड़ौ कनक कामनि बहु रंगा । याते कपट विकार ॥ जनम जनमके फंद कटत हैं । सतगुरु शब्द सम्हार ॥ जम पाटनको करम निवारो । हंस हो निरवान ॥ माया आस विचारि तजो जीव । बहुरि न भरम समान ॥ चेतो रे नर मूरख प्रानी । ये जम बड़ वरियार ॥ सार शब्द निश्चय उर धारो । भाग चले जम धार ॥ सत्सुकृतको निजकर सुमिरो । गहो अगमकी डोरि ॥ सतगुरु सेती परिचय पाइये । छूटचो जमको जोर ॥ पारस परस अमर घर पायो । हंस भये अस्थीर ॥ सदा करारी जुरा न व्यापे । ता रंग रंगे है कवीर ॥

धमार ४-कोई नाम रंगीले रंग रंगे हो । मेरे साधो गहो शब्द टकसार ॥ टेक ॥ प्रेम ते गगन परवावज बाजे । सुनिये छतीसों राग ॥ आवरन वरन गुलाल बहु रंगी । बहु रंगी पांचो राय ॥ बीस पांच अरु तीन सहेली । खेल त्रिकुटीमें आन ॥ अगर अबीर कुमकुमा केशर । अष्ट कमल परमान ॥ गगन मंडलमें खेलत हौं होरी । तत मता गल तान ॥ फगवा लेन भरली विधि आवो । पावे मुक्ति फल दान ॥ कहै कवीर ऐसी होरी खेलो । पांच पचीसों मारि ॥ नाम गहे ते परम पद पावे । पुनरपि जनम निवारि ॥

(७०४)

कवीरपंथी—

धमार ५—सतगुरुह संग होरी खेलिये हो । अहो मेरो साधो जाते जरा मरण भरमजाये॥ टेक॥ ध्यान जुगतकी करि पिचकारी । छमा चलावन हार ॥ आत्म ब्रह्म जो खेलन लागे । पांच पचीस मंझारि ॥ ज्ञान गलीमें होरी खेले । मची प्रेमकी कीच ॥ लोभ मोह दोऊ कटि भागे । सुनि सुनि शब्द अजीत ॥ त्रिकुटी महलमें बाजा बाजे । होत छतीसों राग ॥ सुरति सखी जहां देख तमाशा । सतगुरु खेलत फाग ॥ इंगला पिंगला सुषुम्ना हो । सुरति निरति दोउ नारि ॥ अपने पिया संग होरी खेलों । लज्जा कानि निवारि ॥ शुन्य शहरमें होत कुतूहल । करै राग अनुराग ॥ अपने पुरुषका दर्शन पावे । पूरन प्रेम सुहाग ॥ सतगुरु मिलि फगवा निज पायो । मारग दियो है लखाय ॥ कहै कवीर जो ये तत पावे । सो जीव लोक सिधाय ॥

धमार ६—ऐसे निर्गुण होली खेलिये हो । अहो मेरे साधो जहां पुरुष विसराम ॥ टेक ॥ मूल शब्दका बजै नगारा सहज उठे झन्कार ॥ असंख्य पाखंडीको लोक रच्यो है । बहु शोभा विस्तार ॥ वाकी आभा कायामें रहियो । गगन मंडलमें वास ॥ ताही सुमिरि हंसा पग धरिहो । काल न आवे पास ॥ निःअच्छर विहंगम जुग कीन्हा । वास धरै अस्थूल ॥ सब जीवन पर दया जु आई । प्रगट पुकारे मूल ॥ धरमदास तुम निज करि मानौ । यहि घर रहन हमार ॥ ऐसा मूल प्रताप जोरावर । चलत होय उजियार ॥ यहि प्रताप लोक पहुंचावै । सुरति निरति लिया साथ ॥ कहै कवीर सोई भल वंचै । मूल लेखा जिन हाथ ॥

धमार ७—ऐसे प्रभु संग होरी खेलिये हो । अहो मेरे साधो जैसे खेले हैं भुव प्रह्लाद ॥ टेक ॥ बालापन खेल खेलहि खोयो ।