कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
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कवीरपंथी—
मानुष जन्म डुरलभ है संतो, खेलो फाग सुभाव । कहैं कवीर चित् चेतो हंसा, बहुर न ऐसो दाव ॥
होरी ४८—मिल खेलो बिमल बसंत, प्यारे कंथसो । खोल अंधेरी कोठरी, मिल बैठो महल एकंत ॥ टेक ॥ गगन मंडल दीपक धरे महल करो उजियार । छैल छबीले कब मिलो, मेरे जीवन प्रान अधार ॥ गंग जसुनके अंतरे, चंद सूरके बीच । अर्ध उर्धके मध्यमें जहां मची अरगजा कीच ॥ बिन पग निरत होत है, बिन कर बाजे ताल । बिन नैनन छबि देखिये, बिना सरवन झनकार ॥ जहां सुरंग रंग रहो, हिल मिल एकहि ठांव । धर्मनि भेटे भावसों, गुरु पाये अपने नाव ॥
होरी ४९—खेलत फाग वसंत रैन दिन । सहज शुन्यमें होरी ॥ टेक ॥ सतगुरु दया साधुकी संगति । त्रिकुटी महल रच्योरी ॥ गुंजत भंवर कोकिला बोले । सोहं सोहं सौरी ॥ बाजत ताल मृदंग झांझि । अगम निगमकी झोरी ॥ मानो कोटि भान ससि ऊगे । जहां मनुवां विलमोरी ॥ सुरति सुहागिनी संग लिये मनुवां । दिये सुमतिकी खोरी ॥ कहैं कवीर मगन भई विरहिनि, ब्रह्म ज्ञान झकझोरी ॥
फाग प्रारम्भ ।
फाग १—मेरे सतगुरु आये आज खेलन फागरी । वानी बिमल सुगन सब बोले अति सुख मंगल रागरी ॥ टेक ॥ चाँचर सरस सखा संग बोले । अनहद बानी रागरी ॥ शब्द सुनत अनुराग होत है । कहा सोवे उठि जागरी ॥ पानी आदर पवन बिछौना । बहुत कहूं सन्मानरी ॥ देत अशीस अमर पद लेऊँ । अब चल युग युग राजरी ॥ चरन प्रच्छालि चरनोदक लेहु । उठि उनके