कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
पृष्ठ 715, कुल 968 में से
संदर्भ में पढ़ेंशब्दावली
(७०१)
पग लाग री॥ पांच सखी मिलि मंगल गावे । पीव अपने संग लाग री ॥ पांच अमृत भोजन लेवै । प्रेम प्रीति भरि थार री ॥ महा प्रसाद संत सुख पावे । आनि खुले मेरे भागरी॥ चौरासीकी बंध छुड़ावन । आये सतगुरु आपरी॥ पान प्रवाना देत जीवनको । वे पावैं सुख वास री॥ चोवा चंदन अरगजा कुमकुम । पुहुप माल गल हार री ॥ फगुवा माँगि मुक्ति फल लेवौं । जीव अपनेके काजरी॥ सोलहो सिंगार बत्तीसो आभरन । सुरति सिंगार सँवौररी॥ संत कवीर मिले सुख सागर । आवा गवन निवार री ॥
फाग २-मिलि खेलो विमल वसंत । प्यारे कँत सों ॥ खेली अंधेरी कोठरी मन । बैठो महल इकंत॥ टेक॥ गगन महल दीपक धरा हो । भवन कियो उजियार ॥ छैल छबीलौं ना छीपै । मेरे जीवन प्रानाधार ॥ विन पग नटवा निरति होत है । विन कर बाजे तार ॥ विन नैन जहाँ देखिये । विन श्रवण सुनि झन्कार॥ गढ़ जमुनके अंतर है । चंद सुरजके बीच॥ अरध उरधकी संधिमें । जहाँ मची अरगजा कीच ॥ रंग सुरंग रङ्ग रंगि रहे हो । हिलि मिली एकै ठाँह॥ धर्मनी भेटे भावसों हो । मिले पुरातम नाह॥
फाग ३-जहाँ मन पावे विसराम, संगति साधुकी । साधु संत मिलि होरी खेलो, निशि दिन आठों जाम ॥ टे०॥ होरी हरिको नाम है हो । लीजिये गाय बजाय ॥ फगवा बारह मास है हो । तुम मति विसरो ताहि ॥ पिचकारी नासा बनि हो । स्वासा कैसर रंग ॥ भरि भरि डारै सुषमना । धुनि अनहद ताल मृदंग॥ तीन रंग एकै भयो है । पीत श्याम अरु सेत॥ होरी खेले आत्मा । परमात्म कंत समेत॥ कवीर बलि गुरुदेवकी । पद परसत राजा राम॥ जापर दया भई सतगुरुकी । जुग जुग अविचल धाम॥३॥