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कबीरपंथी शब्दावली

Kabirpanthi Shabdavali

स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा

स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)

Devanagarihipublished968 पृष्ठ

शब्दावली

(७०१)

पग लाग री॥ पांच सखी मिलि मंगल गावे । पीव अपने संग लाग री ॥ पांच अमृत भोजन लेवै । प्रेम प्रीति भरि थार री ॥ महा प्रसाद संत सुख पावे । आनि खुले मेरे भागरी॥ चौरासीकी बंध छुड़ावन । आये सतगुरु आपरी॥ पान प्रवाना देत जीवनको । वे पावैं सुख वास री॥ चोवा चंदन अरगजा कुमकुम । पुहुप माल गल हार री ॥ फगुवा माँगि मुक्ति फल लेवौं । जीव अपनेके काजरी॥ सोलहो सिंगार बत्तीसो आभरन । सुरति सिंगार सँवौररी॥ संत कवीर मिले सुख सागर । आवा गवन निवार री ॥

फाग २-मिलि खेलो विमल वसंत । प्यारे कँत सों ॥ खेली अंधेरी कोठरी मन । बैठो महल इकंत॥ टेक॥ गगन महल दीपक धरा हो । भवन कियो उजियार ॥ छैल छबीलौं ना छीपै । मेरे जीवन प्रानाधार ॥ विन पग नटवा निरति होत है । विन कर बाजे तार ॥ विन नैन जहाँ देखिये । विन श्रवण सुनि झन्कार॥ गढ़ जमुनके अंतर है । चंद सुरजके बीच॥ अरध उरधकी संधिमें । जहाँ मची अरगजा कीच ॥ रंग सुरंग रङ्ग रंगि रहे हो । हिलि मिली एकै ठाँह॥ धर्मनी भेटे भावसों हो । मिले पुरातम नाह॥

फाग ३-जहाँ मन पावे विसराम, संगति साधुकी । साधु संत मिलि होरी खेलो, निशि दिन आठों जाम ॥ टे०॥ होरी हरिको नाम है हो । लीजिये गाय बजाय ॥ फगवा बारह मास है हो । तुम मति विसरो ताहि ॥ पिचकारी नासा बनि हो । स्वासा कैसर रंग ॥ भरि भरि डारै सुषमना । धुनि अनहद ताल मृदंग॥ तीन रंग एकै भयो है । पीत श्याम अरु सेत॥ होरी खेले आत्मा । परमात्म कंत समेत॥ कवीर बलि गुरुदेवकी । पद परसत राजा राम॥ जापर दया भई सतगुरुकी । जुग जुग अविचल धाम॥३॥

(७०२)

कवीरपंथी-

फाग ४-करि सुमरन सुरंग होरी खेलिये हो । ज्ञान पिचकारी ध्यान केशर भरि ॥ या विधि मनको लहिये हो ॥ टे० ॥ पांच सखी मिलि उठि उठि धावै । इनकी लुकट बचइये हो ॥ काम क्रोध अरु लोभ मोह सब । अबीर गुलाल उड़इये हो ॥ बाजत ताल मृदंग झांझि डफ । अनहद नाद बजइये हो ॥ सुरति निरति और राग रागिनी । अनचित चितसो गइये हो ॥ चोवा चंदन अरु अरगजा । रसकी कीच मचइये हो ॥ कहै कवीर तब साध कहावैं । गुरुसों फगुवा पइये हो ॥ ४ ॥

धमार प्रारम्भ ।

धमार १-नित मंगल होरी खेलिये हो । अहो मेरे संतो नितही वसंत नित फाग ॥ टेक ॥ दया धरमकी केशर घोरो । प्रेम प्रीति पिचकारी ॥ भाव भगत सों भरि सतगुरुको । सुफल जनम नर नारी ॥ छिमा अबीर चरच चित चंदन । सुमरन ध्यान धमारि ॥ ज्ञान गुलाल अगर कसतूरी । उमंगि उमंगि रंग डारि ॥ चरणामृत प्रसाद चरण रज । अपने शीश चढाय ॥ लोक लाज कुल कानि मेटिके । निर्भय निशान बजाय ॥ कथा कीर्तन मग्न महोछब । करि संतनकी भीर ॥ कबहुँ ना काज विगड़ है तेरो । सत सत कहैं कवीर ॥ १ ॥

धमार २-कोई नाम सनेही खेले वसंत । अहो मेरे संतो कुलकी हो कानि निवारी ॥ टेक ॥ सत्संगति अरु दया भावसों । लागो प्रेम गुरु संग ॥ आसा मूल निराश विसारी । बाजत नाद मृदंग ॥ डिम कपट गुलाल उड़े जब । लागो रंग अपार ॥ पांच सखी मिलि मंगल गावे । लागि रही इक तार ॥ खेलन चली पंथ प्रीतमके । अति ही उलास आनंद ॥ भव विसारि कहु शंक न

शब्दावली

(७०३)

कीन्ही । सुरति शब्द गठि बंद ॥ चाचर रचि संग प्रीतमके । खुलिया ज्ञान भंडार ॥ पीवत नाम महारस छोके । निरखत रूप अपार ॥ कहैं सुने कछु वनती नाहि । जो खेले संत सुजान ॥ अजर अमर अविनाशी साहेब निर्भय नाम अमान । जरा मरण भय संशय छूटी । छाडचो विष संसार ॥ दास कवीर ऐसे खेलिये हो । आवागवन निवार ॥

धमार ३-निज नाम रंगीले रंग रंगे हो । अहो मेरे संतो छोड़ो हो कर्म अपार ॥ टेक ॥ छोड़ौ कनक कामनि बहु रंगा । याते कपट विकार ॥ जनम जनमके फंद कटत हैं । सतगुरु शब्द सम्हार ॥ जम पाटनको करम निवारो । हंस हो निरवान ॥ माया आस विचारि तजो जीव । बहुरि न भरम समान ॥ चेतो रे नर मूरख प्रानी । ये जम बड़ वरियार ॥ सार शब्द निश्चय उर धारो । भाग चले जम धार ॥ सत्सुकृतको निजकर सुमिरो । गहो अगमकी डोरि ॥ सतगुरु सेती परिचय पाइये । छूटचो जमको जोर ॥ पारस परस अमर घर पायो । हंस भये अस्थीर ॥ सदा करारी जुरा न व्यापे । ता रंग रंगे है कवीर ॥

धमार ४-कोई नाम रंगीले रंग रंगे हो । मेरे साधो गहो शब्द टकसार ॥ टेक ॥ प्रेम ते गगन परवावज बाजे । सुनिये छतीसों राग ॥ आवरन वरन गुलाल बहु रंगी । बहु रंगी पांचो राय ॥ बीस पांच अरु तीन सहेली । खेल त्रिकुटीमें आन ॥ अगर अबीर कुमकुमा केशर । अष्ट कमल परमान ॥ गगन मंडलमें खेलत हौं होरी । तत मता गल तान ॥ फगवा लेन भरली विधि आवो । पावे मुक्ति फल दान ॥ कहै कवीर ऐसी होरी खेलो । पांच पचीसों मारि ॥ नाम गहे ते परम पद पावे । पुनरपि जनम निवारि ॥

(७०४)

कवीरपंथी—

धमार ५—सतगुरुह संग होरी खेलिये हो । अहो मेरो साधो जाते जरा मरण भरमजाये॥ टेक॥ ध्यान जुगतकी करि पिचकारी । छमा चलावन हार ॥ आत्म ब्रह्म जो खेलन लागे । पांच पचीस मंझारि ॥ ज्ञान गलीमें होरी खेले । मची प्रेमकी कीच ॥ लोभ मोह दोऊ कटि भागे । सुनि सुनि शब्द अजीत ॥ त्रिकुटी महलमें बाजा बाजे । होत छतीसों राग ॥ सुरति सखी जहां देख तमाशा । सतगुरु खेलत फाग ॥ इंगला पिंगला सुषुम्ना हो । सुरति निरति दोउ नारि ॥ अपने पिया संग होरी खेलों । लज्जा कानि निवारि ॥ शुन्य शहरमें होत कुतूहल । करै राग अनुराग ॥ अपने पुरुषका दर्शन पावे । पूरन प्रेम सुहाग ॥ सतगुरु मिलि फगवा निज पायो । मारग दियो है लखाय ॥ कहै कवीर जो ये तत पावे । सो जीव लोक सिधाय ॥

धमार ६—ऐसे निर्गुण होली खेलिये हो । अहो मेरे साधो जहां पुरुष विसराम ॥ टेक ॥ मूल शब्दका बजै नगारा सहज उठे झन्कार ॥ असंख्य पाखंडीको लोक रच्यो है । बहु शोभा विस्तार ॥ वाकी आभा कायामें रहियो । गगन मंडलमें वास ॥ ताही सुमिरि हंसा पग धरिहो । काल न आवे पास ॥ निःअच्छर विहंगम जुग कीन्हा । वास धरै अस्थूल ॥ सब जीवन पर दया जु आई । प्रगट पुकारे मूल ॥ धरमदास तुम निज करि मानौ । यहि घर रहन हमार ॥ ऐसा मूल प्रताप जोरावर । चलत होय उजियार ॥ यहि प्रताप लोक पहुंचावै । सुरति निरति लिया साथ ॥ कहै कवीर सोई भल वंचै । मूल लेखा जिन हाथ ॥

धमार ७—ऐसे प्रभु संग होरी खेलिये हो । अहो मेरे साधो जैसे खेले हैं भुव प्रह्लाद ॥ टेक ॥ बालापन खेल खेलहि खोयो ।

शब्दावली

(७०५)

जवानीमें जोवन जोर ॥ यह मन भल कहो नहि माने । सांझ गिने नहीं भोर ॥ सनकसनंदन सुखदेव खेले । खेले शेष महेश ॥ कुलकुँ छाड़ि विभीषण खेले । कीन्हे हैं लंक नरेश ॥ अविनाशी संग विनसत नाहिं । जिनकी कथा अपार ॥ साधु ससुझि मूल गहि बैठे । सब जग लाग्यो डारि ॥ विरघ भयो कोइ नाम लैहै । ससुझि देख मन क्रूर ॥ निर्भय होरी खेल कवीर जी । घटहीमें हाल हजूर ॥

धमार ८—ऐसे खेलको कहा खेलिये हो । अहो मेरे साधो जामें आवागमन बसेर ॥ टे० ॥ निशि वासर जहाँ मिरतक व्यापे । भवसागरमें वास ॥ पांचों चोर छठो मन राजा । निश दिन करत विनास ॥ घर माटीको भीत झाँझरी । अष्ट धातको जडाव ॥ नव दरवाजे रहत मलीने । काहेको करत उपाव ॥ प्रकृति पचीसों संग जंजाली । काम क्रोध कोटवाल ॥ इतने कटकमें राजा भूलो । खेलत भरमको ख्याल ॥ भरम छोंड़ि अजहूँ किन चेतै । कहैं कवीर ससुझाय ॥ कहा हमारा जो कोइ माने । आवागवन नसाय ॥

धमार ९—अविनाशी दुलहा कवीर कब मिलिहो । अहो मेरो साधो सब संतनके रक्षपाल ॥ टेक ॥ जल उपजी जलसों नहि नेहा । रटत प्यास प्यास ॥ मैं विरहिनि ठाढी मग जोहूँ । राम तुम्हारी आस ॥ दिवस न भूख रैन नहीं निद्रा । गृह आँगन न सुहाय ॥ सेजरिया वैरन भई हमको । जागत रैन विहाय ॥ छांडया गेह नेह लाग्यो तुमसो । भयी चरन लवलीन ॥ तुम विनु जियरा यूँ तलफतु है । जैसे जल विनु मीन ॥ हमतो तुम्हारी दासीहो प्रभुजी । तुम हमरे भरतार ॥ दीन दयाल दयाकर आवो । साहिब सिरजन हार ॥ कै तो प्रान तजति हूँ साहेब । कै अपनी कर लेव ॥ दास कवीर विरह अति बाढी । हमको दर्शन देव ॥

कवीरपंथी शब्दावली २३

(७०६)

कवीरपंथी--

धमार १०—कैसे जीवेगी विरहनी पिया विनु हो । अहो मेरा साधो कीजे हो कौन उपाय ॥ टेक ॥ दिवस न भूख रैन नहीं सुख है । जैसे कलिजुग जाँम ॥ खेलत फाग छाड़ि चलि सुंदर । तजि चलि धन अरु धाम ॥ बन खंड जाय नाम लव लावो । मिलि पिया सुख पाय ॥ तलफत मीन विना जल जैसे । दर्शन दीजे हो धाम ॥ विना अकार रूप नहीं रेखा । कौन मिलेगा आय ॥ आपन पुरुष समुझिले सुन्दरी । देखो तन निरताय ॥ शब्दसरूपी जब पिया बुझो । छाड़ो भरमकी टेक ॥ कहै कवीर आन नहीं पूजा । जुग जुग हम तुम एक ॥

धमार ११—खेले तेरी माया मोहिनी हो । अहो मेरे साधो जिन जेर कियो संसार ॥ टेक ॥ चंद्र वदन मृगलोचनी माया । विद्वैलो दियो है लिलार ॥ जती सती सब मोहि लियो है । गज गति वाकी है चाल ॥ हरे रंगकी चूँदरी हो । माया पहिरे ताही ॥ शोभा अद्भुत रूपकी हो । महिमा वरनि न जाय ॥ जेते तेते लिये हो । घँघुट माँहि समाय ॥ आजन वाकी रेख हो । अदग गयो नहीं कोय ॥ छिड़कत थोथे प्रेम सुमाया । भरि पिचकारी गात ॥ सनकसनंदन कहत है । औरकी केती बात ॥ अनहद ध्वनि बाजा बाजे हो । सरवन सुनत भयो चाव ॥ खेलन हारे खेलिहै हो । बहुरि न ऐसो दाव ॥ ज्ञान डगा षग रोपिया हो । टारचो टरत न पांव ॥ बाँस लिये कर आपने हो । फिरि फिरि झूत जाय ॥ ब्रह्मा शंकर वश कियो माया । दोऊ पकडे जाय ॥ फगुवा लीन्हो आपनो हो । बहुरि दियो छिटकाय ॥ नारदको सुख मोरिकै । माया लीन्हो बसन छुटाय ॥ गर्व गहेली गरबते हो । बहुरि चली मुसकाय ॥ सुर नर मुनि एक ओर भये हैं । एक अकेली आप ॥ सन्मुख कोऊ ना रहै हो । मारि लियो एक धाप ॥ इन्द्र सकुच

शब्दावली

(७०७)

ठाढे गढौ भयो हो । लोचन ललित अंजाय ॥ हरि अविनाशी उबरे हो । कहै कवीर गुण गाय ॥

धमार १२-भरम भुली माया जग मोहै हो । अहो मेरो साधो खेलत भ्रमको ख्याल ॥ टेका ॥ कटि केहरि गज गामिनी माया । संशय कियो सिंगार ॥ राखे रोकि सब मोह नदीमें कोऊ न उतरचो पार ॥ ब्रह्माको चित्त चोर लियोहै । शिवको लीन्हों साथ ॥ बस किय विष्णु विश्वके ठाकुर इंद्र नवायो माथ ॥ तैंतीस कोटि छले सुनि देवा । डारचो भरम गुलाल ॥ बरन फेरि अवरन होय नाची । ऐसी अलबेली नारि ॥ पंडित आविन आँजन आँज्यो । मूरख आँखिन धूरि ॥ जती सती सब बाँसन मारे सुरनर सुनि किय चूर । गोपीचंद भरथरी गोरख । खेलन आये फाग ॥ शृंगी ऋषि पाराशर लुटे ॥ छांडि छांडि वैराग ॥ सात दीप नौखंड तिहुपुर । फगवा सब सो लीन ॥ ठाढी विनती करै कबीरसों, हम तुमरे आधीन ॥

धमार १३-तुम दीन दस खेलों साजना हो । अहो मेरो सेतो बहुरि न ऐसो दाव ॥ टेक ॥ रिनु वसंत माया संजोरी । कछुक करो अनुराग ॥ फिरि पीछे पछतावगे संतो बीति जायगी फाग ॥ ग्यान डगा तुम रोपि हो । सन्मुख रहो सम्हारि ॥ मारेगी चित्त चोरकै हो । मोहिनि चंचल नारि ॥ हरि सुभिरनकी गारी दीजै । गुरुकै वचन संम्हारि ॥ साधु संगति तुम जोरिकै हो । कबहुं न आवेगी हारि ॥ अनहद बाजा बाजे सखीरी । नौतम प्रीतम ठाय ॥ केशरि चरचो प्रेमकी हो । जुग जुग रंग न जाये ॥ कहै कवीर ऐसी होरी खेलो । तीन तीसको मारि ॥ नाम गहेते परम पद पड़ये । आवागमन निवारि ॥

धमार १४-कर मन संग भरमत केई जुग गये । अहो मेरो

(७०८)

कवीरपंथी-

साधो उपज्यो न केवल ज्ञान ॥ टेक ॥ कबहुँक बन चर तुम भये हो । कबहुँक तिन चर रूप ॥ कबहुँक सिंह दहारत वनमें । कबहुँक मीड़क कूप ॥ कबहुँक नरपति तुम भए हो । कबहुँक मांगत भीख ॥ कबहुँक गज होय घूमंत डोले । कबहुँक मस्तक लीख ॥ कबहुँक विकत तुम भयो हो । कबहुँक गये फँदे जंगल ॥ कबहुँक उड़िकै गये गगनकूँ । कबहुँ गये पाताल ॥ कबहुँक सुरपति तुम भये है । कबहुँक नरक निदान ॥ कहै कवीर ऐसे भरम डोले । जैसे सूकर स्वान ॥

धमार १५-ऐसे पिया संग होरी खेलिये हो । अहा मेरो साधो सुरति सुहागिन नारि ॥ टेक ॥ पांच पचीस सखियनकी संगति तत मत सखी लिया साथ ॥ अरस परस पियाके संग राची । सहज लकुटिया हाथ ॥ गगन मंडलमें होत कुलाहल । उठत राग अनुराग ॥ बाजत ताल मृदंग झांझि डफ । बहु विधि भयो सुहाग ॥ ग्यान गुलाल अनहद अरगजा । चित चोवां मन लाय ॥ कर-करनी केशरि रंग भीनी । विन रसना गुन गाथ ॥ धन सतगुरु धन साधुकी संगति । धन हमारे भाग ॥ सांची फाग भगति सतगुरुकी । कहै कवीर सुहाग ॥

धमार १६-अभि अंतर अनहद सुरली बाजे । अहो मेरो साधो चलो न देखन जाय ॥ टेक ॥ काया कुंज गली वृन्दावन । अनुभव जमुना नीर बैन वजाई बीचमें मोहन नाभि कमलके तीर ॥ सुधि बुधि विसार गई सब श्यामा । सुनि सुरलीकी टेरे ॥ उलटी सिंगार कियो है आतम । पहरचो है अम्बर फेर ॥ सुरलीको शब्द सुनत सब गोपी । भूलि गई परिवार ॥ पांच पचीस ॥ सखी संग राधो । भेटन चली है सुरार ॥ आस पास गोपियनको मंडप । विचि विचि परमानन्द ॥ भयो उछाह प्रेम अति

शब्दावली

(७०९)

वाटचो । ज्ञान उदय जिमि चंद ॥ थाके चंद सुरगुन मारुत । वहै न जमना नीर ॥ सुनि सुनिवरको ध्यान डिग्यो है । बछा न पीवै क्षीर ॥ घट घट रास रच्यो वृन्दावन । घट घट गोपी कान्ह ॥ घट घट राम रमे अविनाशी । जाने कोई संत सुजान ॥ सतगुरुके प्रताप सखीरी । वरनि सुनायो रास ॥ मानुष जन्म सुफल भयो साधो । विं धनि धरमदास ॥

धमार १७—अहो अविनाशी दूलहा कब मिलिहो हो ॥ हो भाई साधो मिलिहो सनेही आय ॥ टेक ॥ जल उपजे जलसो नहिं नेहा, रटत पियास पियास । मैं विरहिन ठाढी मग जोहों, पिया मिलनकी आस ॥ दिन नहिं चैन रैन नहिं निद्रा, घर अंगना न सोहाय । सेजरिया बैरन भइ हमको, जागत रैन बिहाय ॥ हूं तो तुम्हरी दासी साहब, तुम हमरे भरतार । दीन दयाल दया करो जन पर, साहब सिरजन हार ॥ आमिनकी बिनती सुन साहब, रहूं चरन लौ लीन ॥ तुम बिन जियरा ऐसे तलफे, जैसे जल बिन मीन ॥ की हम प्रान तजत हों साहब, की आपन कर लेव । साहब कवीर बिरह रस भोगी हमहूं को दर्शन देव ॥ १ ॥

धमार १८—अहो ऐसे गुरु संग, होरी खेलिये हो हो ॥ हो भाई साधो हो, जरा मरन भ्रम जाय ॥ ज्ञान जुगतकी कर पिचकारी, छमा चलावन हार । आतम ब्रह्म संग खेलन लागे, पांच पचीस मंझार ॥ ज्ञान गलीमें खेलैं होरी, मची प्रेमकी कीच । लोभ मोह दोउ कुटि कुटि मैं, सुनि सुनि शब्द अजीत ॥ त्रिकुट महलमें बाजा बाजे, हौ छतीसो राग । ज्ञान ध्यान दोउ देखै तमाशा, सतगुरु खेलैं फाग ॥ ईगला पिंगला सुषुमन रोको, सुरति निरति दोउ नार । अपने पिया संगहोरी खेलो, लजा कान निवार ॥ सुन्न महलमें होत कुतूहल, करहिं राग

(७१०)

कवीरपंथी—

अनुराग । अपने पियाके दरशन पाऊँ, पूरन प्रेम सुहाग ॥ सत-गुरु फगुवा पाइया हो, मारग दियो बताय । कहैं कवीर जो यह तत्त्व पावे, सो जन लोकहि जाय ॥

धमार १९—अहो साहब संग होरी खेलिये हो ॥ हो भाई साधो हो खेलो तन मन वार ॥ टेक ॥ धोखेकी एक होरी बनाई, भवको डाँढो गाड़ । दुबधा की जार लाय इत उतसों, लब्बाको देउंगी जार ॥ प्रेम पावक ले होरी दागों, कर्म बरूला डार । भावर दे दे मंगल गावों, त्रिगुण फंद निरवार ॥ ससुझकी झोरी सुमतिने पकरी, होरीकी भस्म लई झार । जित कित धूर उड़ाय जगत पै, कुल पर डारोंगी छार ॥ करनी को केशर घटमें घोरों, रहन करो पिचकार । परख पतंगके रङ्ग उतारों, देउंगी मन पर डार ॥ दया अबीर गुलाल धर्म कर, चित चंदन लेह गार । सतगुरु मुख पर डारों, प्रीतिसों, पाँचौ चोरन मार ॥ जो कछु चाल होय गुरु सप्रथ, पहिले देहु तिस्वार । आमिनकी बिनती सुन साहब, फगुवा देहु हमार ॥ कहैं कवीर सुन धर्मनि नागर, अब है राह बिचार । अमी अंक परवाना पावै, पहुंचे पुरुष दुआर ॥

धमार २०—अहो बैरागी नागर होरी खेलिये हो हो ॥ हो भाई साधो हो, खेलो निरगुन नाह ॥ गढ बांधोंमें चाचर खेलै, निरगुन नाम विचार । संगन सनेह, हंस परबोधो, जमसो जीव उबार ॥ सूर सनेह गहो निशि बासर, सुषुप्त वेद टकसार । निरगुन नाम निअच्छर गावो, जुग जुग शब्द पुकार ॥ मंदिर-सों निकसी एक सुंदर, कर पग शीश न छंद । बिन नेनन देखिये वाकी सुरत, दिन दिन परम अनंद ॥ बिन जुगबंध काल छोड़े, बहु विधी भेष बनाय । जब लग जमकों चिरे न कागद,

शब्दावली

(७११)

काल धरी धरखाय ॥ पिंड न प्रान देह नहि सुंदर, विन रसना गुन गाय । ऋग यजु साम अथर्वण थाके, विन गुरु कौन लखाय ॥ जोजन तीन चले विन चरनो, करपलो परमान । सुर नर मुनि जाको मर्म न जाने, निरगुन चतुर सुजान ॥ तैंतीस कोटि देव नहि जाने, निरगुन भेद नियार । कहैं कवीर मुक्तिके दाता, परख परख टकसार ॥

धमार २१—अहो करनाटक नागर होरी खेलैं हो हो ॥ हो भाई साधो हो खेलैं जो राय बंकेज ॥ टेक ॥ एक समय गज अस्थल आये, करनाटकके लोग । बिहँसि बिहँसि सब मंगल गावैं, बहुत करहिं सुख भोग ॥ राय बंकेज हंसनके राजा, गज अस्थल कडिहार । हंसन पार उतारहीं, परख परख टकसार ॥ हंस हंस युग बांधहीं, जम सों जीव छोडाय । सत्य शब्द दे लोक पठावैं, अभय निशान बजाय ॥ ज्ञान सुगंध धरो घट भीतर, कुबुधि अबीर उडाय । सुरति शब्द जीवनको दीन्हे, हंस लिये सुकताय ॥ भये लवलीन हंस सुकताहल, सतगुरु बांह चढाय । कहैं कवीर मुक्तिके दाता, तबहिं अभय पद पाय ॥

धमार २२—अहो भर्म भारी माया जग मोहे हो हो ॥ हो भाई साधो हो जेर कियो संसार ॥ टेक ॥ कटि केहरि गजगामिनि माया, संशय कियो सिंगार । रोक रही सब मोह नदी में, कोई न उतरे पार ॥ ब्रह्माके चित चोरी माया, शिवको लीन्ही साथ । बस कीन्ही बसुधाके ठाकुर, इंद्र नवावै माथ ॥ तैंतिस कोटि छले मुनि देवा, डारी बिरह गुलाल । बरन फेर अबरन होय नाचे, ऐसी अबला नार ॥ पंडित आंखिन अंजन दीन्हे, मूरखके सुख धूर । जती सती सब बांसन मारे, सुर नर मुनि किये चूर ॥ गोरख गोपीचंद भरथरी, आये खेलन फाग । शृंगीऋषि पाराशर

(७१२)

कवीरपंथी-

आये, छांड़ छांड़ बैराग ॥ सात द्रौप नौ खंड तिहुंपुर, सो सो फगुवा लीन्ह । साहब कवीरसों अरजी करत हैं, तुम मोहिं कछू न दीन्ह ॥ ६ ॥

धमार २३—अहो गुरुगम सों होरी खेलिय हो हो ॥ हो भाई साधो हो शब्द सुरति लौ लाय ॥ टेक ॥ कोई एक नाम निरंजन ध्यावे, कोई कहे निरधार । जोत सुरूपी अलख कहत है, राँचि रहौ संसार ॥ कोई दुर्गा शिवको जाने, कोई जाने भूत । कोई यंत्र मंत्रसों राचे, मूल विसारो सूत ॥ कोईक नवली कर्महिं साधे, पवना देह चढाय । बिंदहिं साध भगन होय फूले, सतगुरु शब्द न पाय ॥ अजपा सुन्न जपे सब कोई, छर अच्छर लग दौर । मारग भूल फिरे भटकाना, मन आवत नहिं ठौर ॥ कोई ओहं कोई सोहं ध्यावे, कोई एक नहिं ठहराय । घटमें ज्ञान कथे सब ज्ञानी, तन छूटे कहं जाय ॥ पूरन ब्रह्म कहे सब कोई, सो जग करे अहार । तन छूटे कहु मिले ब्रह्मको, जनम जु होत खुवार ॥ ऊर्ध तपे बन खण्ड जात है, खात वृच्छके पात । जोगी जंगम औ दरवेसा, भेष धरे संसात ॥ कथनी बकनी पार न पावे, सतगुरु शब्द अकाल । अच्छरमें निःअच्छर दरशे, सतगुरु होहिं दयाल ॥ युक्ति जान खेले जो कोई, शब्द डोर चढ जाय । अमर लोकमें पुरुष विदेही, सत कवीर लौ लाय ॥ ७ ॥

धमार २४—अहो कोई नाम रंगीला सतसंगी हो हो ॥ हो भाई साधो हो गहो शब्द टकसार ॥ टेक ॥ प्रेमसो गगन पखावज बाजे, बिन कर बाजे ताल । रुनक झुनक अनहद धुनि बाजे, उठत छतीसों राग ॥ अरुन बरुन गुलाल बहुरंग । बहुरूपी पांचौ राव । इन पांचौं विश्वास न लीन्ह, खेले त्रिकुटी भाव ॥ प्रेमके रंग सींचत रहै, अष्ट कमल परकास । ज्ञान गली छूटे पिचकारी,

शब्दावली

(७१३)

भँवर गुफा निज वास ॥ गगन मंडलमें होरी खेलैँ, तत्त्व मता गलतान । फगुवा नाम लिये बन आवै, पावै मुक्ति फलदान ॥ कहै कवीर ऐसी होरी खेलो, तीनों तापको मार । निगम ये जावो परमपद पावो, पूरन जन्म निवार ॥

धमार २५-अहो सतगुरु संग होरी खेलिये हो हो ॥ भाई साधो हो बहुर न ऐसो दाव ॥ टेक ॥ खेलत हंस बंस कर लीन्है, मित गये विषय विकार । भाव रचेउ रंग संग निज पायो, खुलगये दशाहु दुवार ॥ गगन गुलाल उड़ाव रैन दिन, भर पिचकारी शील । खेलत हंस परमपद पावै, बिमल हंसनकी भीर ॥ गगन मंडलमें हंसा खेलै, चढे सवाया नूर । खेलै हंस सोहंगम डोरी, वर पाये भरपूर ॥ सोरह सुतका एक तत्त्व है, जासों न्यारा बीज । कहै कवीर हम निश दिन खेलैँ, सतगुरु दीन्हा चीज ॥

धमार २६-अहो नित मंगल होरी खेलिये हो हो ॥ हो भाई साधो हो, नितही बसंत नित फाग ॥ दया धरमकी केशर घोरो, प्रेम प्रीति पिचकार । भाव भक्ति भर भर सतगुरु सो, सुफल जनम नर नार ॥ छमा अगर छिरक चित चन्दन, सुमिरन ध्यान धमार ॥ ज्ञान गुलाल अगर कस्तूरी, उमँग उमँग रंग डार । चरनामृत प्रसाद चरन रज, अपने शीश चढाय । लोक लाज कुल कान तोरके, निरभय निशान बजाय ॥ कथा कीर्तन मगन महोत्सव, करे संतनकी भीर । कबहुँ न काज बिगरे नर तेरो, सतगुरु कहै कवीर ॥

धमार २७-मन रंगी राजा खेलै धमार ॥ काहूको पाताल पठावै, काहूको देत अकाश । काहूको बैकुंठ पठावै, फिर फिर नरकमें वास ॥ ब्रह्मा विष्णु महेश्वर बांधे, माया रसरी डार । सुर नर मुनि सबहीको बांधे, कोइ न सके निरवार ॥ जोगी जती

(७१४)

कवीरपंथी—

तपी संन्यासी, दिगंबर दरबेस । सनक सनंदन सबही बांधे, काहु न पायो भेश ॥ तेंतिस कोटि देवता बांधे, माया रसरी डार । कहैं कवीर तेई जन बांचे, चीन्हा शब्द हमार ॥

शब्द चाचर ।

चाचर मची अब हो हो खेल जिन चाचर माहीं ॥ टेक ॥ चाचर खेलें दोय जने एक मन औ माया । पंथ चलन नहिं पावै बहु द्रन्द्व मचाय ॥ लोभ मोहकी पिचकारी मारो चतुरा ज्ञानी । सुर नर सुनि सबही छले जेते अभिमानी ॥ डफ कपटही बाजे सही बहु जग भरमाई । तृष्णा लागे खेलई सम्हरा नहीं कोई ॥ काम क्रोधकी अरगजा सब अंग लगीई । आशा तो चहुँ दिशि फिरे सब सुधि बुधि खोई ॥ नाना रंग बनायके नाचे मन माया । ठांव ठांव फंदा रचे कोई जान न पाया ॥ अंग अनेक दिखायके सबही जग खाया । मचे खेलके आंधरे काहु मरम न पाया ॥ षट् दरशन सब खेलहीं बहु भेष बनाई । मन रंगीके खेलमें सबही बिलमाई ॥ पंडित वेद पुरानको पढ पढ अरथावैं । शेष सहस मुख गावहीं कछु भेद न पावैं ॥ तीर्थ व्रत जग लागिया धावै चहुँ ओरा । देवी देवल देवता खेलैं सब ठौरा ॥ सुख संपतिके कारने अरुझा सब कोई । अंतकाल औसर परे कोई संग न होई ॥ पछा पछी सब खेलहा बहु भरम झुलाने । वार पारकी सुधि नहीं कथनी लपटाने ॥ जाके जो कछु मन बसे वह वाही माने । सत शब्द चीन्हें नहीं बहु झगरा ठाने ॥ सांचेको माने नहीं जिह्वाके लपटी । वादिनकी कछु सुधि नहीं जम मारे झपटी ॥ मन मायाके रंगमें सबही ये भूले । चौरासीके खेलमें सदा जोनी झूले ॥ सतगुरु शब्द पुकारिया खेलै जो कोई । भौसागरके भय नहीं फिर

शब्दावली

(७१५)

जन्म न होई ॥ कहैं कवीर विचारिके खेलो तुम साधो । न्यारा सबही खेलते जाको अवराधो ॥ १ ॥

सत्यनाम ।

अथ कहरा प्रारम्भः ।

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कहरा १-मतसुन मानिक मतसुनु मानिक मतसुनु मानिक सब धारैरे । मगन हुआ जब घर उठिचाला गुरुके चरण चित तुव धारैरे ॥ बगला पक उछारी मच्छी सो धिमरा कैसे पावैरे ॥ वंसी टूटि पड़ी पानीमें है कोई गांठ जुरावैरे ॥ तीन लोक धिमरा फिरि आया सिमरीके अन्त न पावैरे ॥ चारी चरण सिमरीके कहिये नो पंखुरी पखानारे ॥ नाका तोड़ि बैठ उर अंतर सतगुरु जुगति लखानारे ॥ दो मुख शब्द पडे टकसारा बूझै संत सुजानारे ॥ सुर नर मुनि और औलिया ब्रह्मा विष्णु महेसा रे ॥ कहै कवीर शब्द विन परखै पार न पाया सेसा रे ॥

कहरा २-अरे मन मिहरा करहु तयारी विलंब करे भल नाहि रे ॥ बेगहि सुरति करो तुम धुरकी दिन सब वीते जाहिरे ॥ पांच कोटि और नौ हैं नारे वे सब वेगि मुखैहैरे ॥ यह तन नदी झर हुइ जैहै मंछा हाथ न ऐहैं रे ॥ धीरज करी तुम डारौ वंशी इस विधि मंछा ऐहैरे ॥ नातर तो मगरा हरि खैहैं जीव अकारथ जैहैरे ॥ निरति सुरति करि धागा बांटो शब्द सुई पहिरावोरे ॥ अंतर कबहुं रहन न पावै ऐसा जाल बनावोरे ॥ शब्दकी डोरि तहां गहि राखो इस विधि जाल पसारोरे ॥ पांच पञ्चीसो सिमरी भमरी सोई वेगि धरि मारौरे ॥ ए मन मिहरा वेगि मथौ तुम पवन महर ले साथारे ॥ इक मत हुईकै चढोना उपर सिमरी आवै हाथारे ॥ वा सिमरीको लखै न कोई जहां मनसा जाई रे ॥

(७१६)

कबीरपंथी—

पिछले महरा जहाँ लग होते खोजत रहे भुलाईरे ॥ नौ दरवाजे हैं सिमरीके जे सबहि तुम रोकोरे ॥ पिछली प्रीति बिना कर जोरे दास पठावै छेकारे ॥ जिस सिमरीके रूप न रेखा नहि बरन नहि मेषारे ॥ जा खोजत सुरनर सुनि थूले कोई विरले पेखारे । झिलमिल नीर तिरवेनी संगम तहाँ ब्रह्मका बासारे ॥ कहै कबीर सुनो तुम साधो एक नामकी आशारे ॥

कहरा ३—नाम सुमिर मन नाम सुमिरि मन नाम सुमिर मन मेरारे ॥ आवत जात बहुत दुख पैहो धरि धरि तन बहु तेरारे ॥ बालापनके गुनह करम सब प्रगट कहौ सुनिहौरे ॥ सुखसे भेट भयी नहि कबहूँ बहु दुख दारुण कीयारे ॥ सरवन कथा सुनी नहि कबहूँ वचन सुचि मानारे ॥ नयना सुंदर रूप लुभाना यही करत मन माहिरे ॥ जीभ्या तेरी षड्दर राती है अंतर रस मानीरे ॥ नासा तेरी वासकी बासे विशेष विशेषारे ॥ सरवन तेरे रागके भीने अनहद शब्द न परेखारे ॥ कामी पड़े कामके वशमें छीतज दिन औ रातीरे ॥ एक घडीके सुखके काजै खोवे कुल और जातीरे ॥ संगी तुम्हरे गुता महरम लाजत नहि लबारारे ॥ राग बाग तन कस करि बांधो शब्द गहो हथियारारे ॥ गहि हथियार खेत मत छांडो रहियो खेत मंझारारे ॥ सूरा पनकी गति है न्यारी जाने संत कोई सुरारे ॥ पांच पचीस पकड़ि वश कीने जूझे गगन दुवारारे ॥ शूरा होयसो सम्मुख जूझै दरसै अलख अपारारे ॥ समष्टिको सतगुरु दर्शे परसे अपरम पारारे ॥ ऐसी रहन रहै कोइ हंसा आवै लोक हमारारे ॥ कहै कबीर नाम को कहरा परख शब्द टकसारारे ॥

कहरा ४—निहुरि नाच मन निहुरि नाचमें तेरी दुलहिनियारे ॥ निहुरे नाचे शब्द विचारै चित्र विचित्र रहिनियारे ॥ कुंवटा एक

शब्दावली

(७१७)

पांच पनिहरियाँ पनियां भरे पतलवारे ॥ बात सखीनसों चित गगरी सो चित सों गगरी न छूटे रे ॥ चित छुटे तो गगरी फूटे पनियां खिर गगरी फूटे रे ॥ पानीके प्यासे पीरेवा उर बैठि शब्दकी छहिरे रे ॥ आगि लगे तेरी मथुरा नगरीया कान्ह पियासे जैहैरे ॥ ज्ञान धनुईयां सुमति तीरले तृष्णासों विधि मारे रे ॥ कहै कवीर नामको कहरा महरम कोई विचारैरे ॥

कहरा ५-सूल छाँडि ते डारन लागा ते नर परम अभागारे ॥ सोइ सोइ सब रैन गँवाई भोर भये नहिं जागारे ॥ शब्द पुकारत जागत नाहीं जनम जनमके सुतारे ॥ बांधे गरे रहटकीसी घडिया आवत जात विगूतारे ॥ पूरब जाऊँ तो राम बखाना पश्चिम अल्लाह मकानारे ॥ दोनों दिन खोजि हम देखे सतनाम मन मानारे ॥ देवल जाऊँ तो पत्थर पूजा तीरथ जाऊँ तो पानीरे ॥ आसपास पकिमा दीनी पत्थर न बोला बानीरे ॥ ओछी बुद्धि अगोचर बानी सो गति विरले जानीरे ॥ गुरुका सबद बसे जिस घरमें सोई सतब्रह्म जानीरे ॥ तुरक मसीत देहरा हिन्दू दो बिच राम खुदाईरे ॥ तहां मसीत देहरा नाहिं जहां अगम ठकुराईरे ॥ विन गुरु ज्ञान भरोसा किसका सरनो किसके रहियेरे ॥ कहैं कवीर एक तरवर फूला उपजी अनहद बानीरे ॥

कहरा ६-पंछी एक चौँच विन पगका विन पंख उडि आवैरे ॥ अलष अलेष लषै तन मनमें जोरे तनक डुई जावैरे ॥ गगन मंडलमें उसका वासा अनहद नाद बजावैरे ॥ डुइकै बीच ब्रह्मका वासा सतगुरु होय लषावैरे ॥ मांको मारि बापको बांधे घरमें अगिन लगावैरे ॥ काम क्रोधका करै पियाला निरत सुरत ठहरावैरे ॥ सलिल न्हाई देखि जमुना कौं भंवर फाकौं धावैरे ॥ नाम कमलकौं समकरि राखै अठसठ चार मिलावैरे ॥ बंक

(७१८)

कबीरपंथी—

नालकों गहि कर पकरै सुषमन सिखर चढावैरे ॥ घरके घेरि घेरि घरही में उलटि उलटि परचावैरे ॥ अनहद बाजै मधुर धुनि गाजै आपा सब विसरावैरे ॥ परम हंस जहाँ केल करत हैं सत-गुरु सहज लषावैरे ॥ हुइ निहचंत चिंता सब तजिके सब अल-मस्त कहावैरे ॥ कहैं कबीर ज्ञान गुरगमसैं अटल हुआ लौला-वैरे ॥

कहरा ७—अगम अगोचर ऐसारे । मैं कहि बतलाऊँ कैसारे ॥ जो कहिये सो हइयै नाही है सो कहा न जाईरे ॥ सैना बैना कासौ कहिये गूँगेका गुठ भाईरे ॥ दिष्ट न आवै सुष्ट न आवै विनसैं होइ न न्यारारे ॥ ऐसा ग्यान कथौ गुर गरूए पंडित करौ विचारारे ॥ काजी हाथ कितेब न बाँचै पंडित वेद पुरानारे ॥ वह तो अक्षर लिखा न जावै मात्रा लगे न कानारे ॥ कोई धावै निराकारको कोई धावै अकारारे ॥ वह तो सत दोउन तैं न्यारा जाने जाननहारारे ॥ समझा होइ सो सबद विचारै अचरज है अनजानारे ॥ समझ न परै ग्यान मतहीना आवागमन समा-नारे ॥ रागी वाणी पठना गुनना बहु चतुराई भीनारे ॥ उतपत्त परलै कबहुँ न आवै सो सत विरले चीन्हारे ॥ जिन चीन्हा सो लोक समाने अमरलोक निज सूझैरे ॥ कहैं कबीर नामको कहिरा महिरा होइ सो बूझैरे ॥

कहरा ८—ऐसा मंदिल रचा विनानी सो गत विरले जानीरे॥ अष्टधातका किया गिलावा दरज अन्तूठी ठानीरे ॥ दोनों खंभ दसौ दरवाजा चौका सचौक पुरायारे ॥ पाँचो करी पचीसौ की रचना ऐस । महल बनायारे ॥ दस दिगपाल देहके माहीं जिनकी दस दस नारीरे ॥ निस दिन केल करे घट भी इच्छा सकलर विचारीरे ॥ नौके परै निरंतर शोभा तहां सरस इक छाजारे ॥

शब्दावली

(७१९)

द्विष्ट मुष्ट तँ अगम अगोचर ऐसा गढका राजारे ॥ कोट गियान सबद तहाँ उचरै सुनौ सत परवानीरे ॥ कहैं कवीर बद्र नहि चीन्है बादकी करावे ग्यानीरे ॥

कहरा ९-संसा मेटि लगे गुरचरनौ सतनाम मुख बोलौरे ॥ या तरवर एक बसे पखेरु आ चुगत जुगन लिये डोलैरे ॥ यह पंछी कोई मोहि बतावे जो घट माहीं बोलैरे ॥ याकी संधि लखै जन कोई कौन ठमहि बोलैरे ॥ आवै संझ उडि जाइ सवेरा गम न काहू देवैरे ॥ दरमत छाँड अनंद घर छावै पंछी बसेरा लेवैरे ॥ दूइ फल चाखि नषर वह आगै और नहि दस दीसारे ॥ कहै कवीर साध कोई जाने सतनामकी आशारे ॥

कहरा १०-सुनो संत इक निरगुन कहरा महरा होय सो बूझैरे ॥ तनसे न्यारा मनहुसे न्यारा देउ द्विष्ट होइ सूझैरे ॥ विन नैनन जहाँ सब कछु दीखै विन सरवन सुनै वानीरे । विना नाशिका वास सुवासा घट रस पावै ग्यानीरे ॥ विना जिभ्या जहाँ अमृत भोजन विन इंद्दी संजोगारे । पांच पचीस जहाँ हैं नाहिंनहीं संजोग बिजोगारे ॥ रूपरेख विन निरगुननामा सत गुरु लखावैरे । कहैं कवीर नामकी महिमा ग्यानी होय सो पावैरे ॥

कहरा ११-वा घरकौ कोई मोहि बतावो जा घरसैं ब्रह्म आयारे ॥ काया छाँडि चले जब हंसा तब ब्रह्म कहाँ समायारे ॥ मैं मेरी ममताके काजैं बारहिबार ठगायारे । समझ न परत ग्यान मति हीना फिरि फिरि भटका खायारे ॥ अब मेरी प्रीति नामसौं लागी उलटि निरंतर धायारे ॥ सहजै सुषुमनि पाउ पलौटे निज धनी अपनायारे ॥ नहीं जहाँ चंद्र नहीं जहाँ सुरा जहाँ जाइ मठ छायारे ॥ कहैं कवीर ग्यान धुनि माहीं सहजै सहज समायारे ॥

(७२०)

कवीरपंथी-

कहरा १२-जोरा जोर रचा जुग ऊपर संतौ करौ विचारारे॥ एक ओर सुरनर मुनि ठाढे एक अकेली मायारे ॥ पाराखिको पानपटारी सिर ब्रह्मोको झाहीरे ॥ नाथ मछंदर पीठि दै भागे गोरख पैज सम्हारिरे ॥ नारद केरि निशान ठवाये हनमत हांक इकारिरे ॥ ऋषि से वनमें लूटे शंकर नेजा धारीरे ॥ वृन्दावनकी कुंज गलिनमें लूटे कुंज विहारीरे ॥ कहैं कवीर पाषरिया लूटे रइयत कौन विचारिरे ॥

कहरा १३-मन मतवारा नाम रस पीवै गगन मँडल गुन गावैरे । नाम सुधा रस भर भर पीवै सुषुमन सुरति मिलावैरे ॥ ग्यान सुराही भरे कलवरिया छकि २ मोहि छकावैरे । साध संत मिलि पीवन लागै अनहद धुनि मुनि पावैरे ॥ सतगुरु दया बहु कीनी घट घट अलख लखावैरे । दास कवीर कहरा गावै महरा होय सो पावैरे ॥

कहरा १४-चुनरी हमारी पियने सुधारी ओढेगी पिय की प्यारीरे । हूठ पैडकी बनी चुनरियां या चौपाट अपारीरे ॥ बिनहीं ताना बनी है चुनिरिया बहु विधि रूप सम्हारिरे । चांद सूरज दोऊ अबलां लगाये जगमग जोति उज्यारीरे ॥ पांच पचीस वाके पैबंद लागे ओढेगी री ज्ञनवारीरे । कहैं कवीर साधु भल सोई एक नाम व्रत धारीरे ॥

कहरा १५-गगन युफामें पैठि क्यों न देखो जहां पुरुष इक ऐसारे । दिष्ट न सुष्ट न अगम अगोचर जाने जो तैसारे ॥ तामैं हम सोई हम मांही पकरि देहुं क्या भैंसारे । सतगुर सबद परष जब आवै परषन कौं क्या पैसारे ॥ समझे सबद समझ घट आवै वह जैसेका तैसारे । कहैं कवीर सुनो तुम साधो है हम मैं हमहै सारे ॥