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भारतकोश
कबीरपंथी शब्दावली

कबीरपंथी शब्दावली

Kabirpanthi Shabdavali

स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा

स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)

Devanagarihipublished968 पृष्ठ

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पृष्ठ 719

शब्दावली

(७०५)

जवानीमें जोवन जोर ॥ यह मन भल कहो नहि माने । सांझ गिने नहीं भोर ॥ सनकसनंदन सुखदेव खेले । खेले शेष महेश ॥ कुलकुँ छाड़ि विभीषण खेले । कीन्हे हैं लंक नरेश ॥ अविनाशी संग विनसत नाहिं । जिनकी कथा अपार ॥ साधु ससुझि मूल गहि बैठे । सब जग लाग्यो डारि ॥ विरघ भयो कोइ नाम लैहै । ससुझि देख मन क्रूर ॥ निर्भय होरी खेल कवीर जी । घटहीमें हाल हजूर ॥

धमार ८—ऐसे खेलको कहा खेलिये हो । अहो मेरे साधो जामें आवागमन बसेर ॥ टे० ॥ निशि वासर जहाँ मिरतक व्यापे । भवसागरमें वास ॥ पांचों चोर छठो मन राजा । निश दिन करत विनास ॥ घर माटीको भीत झाँझरी । अष्ट धातको जडाव ॥ नव दरवाजे रहत मलीने । काहेको करत उपाव ॥ प्रकृति पचीसों संग जंजाली । काम क्रोध कोटवाल ॥ इतने कटकमें राजा भूलो । खेलत भरमको ख्याल ॥ भरम छोंड़ि अजहूँ किन चेतै । कहैं कवीर ससुझाय ॥ कहा हमारा जो कोइ माने । आवागवन नसाय ॥

धमार ९—अविनाशी दुलहा कवीर कब मिलिहो । अहो मेरो साधो सब संतनके रक्षपाल ॥ टेक ॥ जल उपजी जलसों नहि नेहा । रटत प्यास प्यास ॥ मैं विरहिनि ठाढी मग जोहूँ । राम तुम्हारी आस ॥ दिवस न भूख रैन नहीं निद्रा । गृह आँगन न सुहाय ॥ सेजरिया वैरन भई हमको । जागत रैन विहाय ॥ छांडया गेह नेह लाग्यो तुमसो । भयी चरन लवलीन ॥ तुम विनु जियरा यूँ तलफतु है । जैसे जल विनु मीन ॥ हमतो तुम्हारी दासीहो प्रभुजी । तुम हमरे भरतार ॥ दीन दयाल दयाकर आवो । साहिब सिरजन हार ॥ कै तो प्रान तजति हूँ साहेब । कै अपनी कर लेव ॥ दास कवीर विरह अति बाढी । हमको दर्शन देव ॥

कवीरपंथी शब्दावली २३