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भारतकोश
कबीरपंथी शब्दावली

कबीरपंथी शब्दावली

Kabirpanthi Shabdavali

स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा

स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)

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पृष्ठ 718

(७०४)

कवीरपंथी—

धमार ५—सतगुरुह संग होरी खेलिये हो । अहो मेरो साधो जाते जरा मरण भरमजाये॥ टेक॥ ध्यान जुगतकी करि पिचकारी । छमा चलावन हार ॥ आत्म ब्रह्म जो खेलन लागे । पांच पचीस मंझारि ॥ ज्ञान गलीमें होरी खेले । मची प्रेमकी कीच ॥ लोभ मोह दोऊ कटि भागे । सुनि सुनि शब्द अजीत ॥ त्रिकुटी महलमें बाजा बाजे । होत छतीसों राग ॥ सुरति सखी जहां देख तमाशा । सतगुरु खेलत फाग ॥ इंगला पिंगला सुषुम्ना हो । सुरति निरति दोउ नारि ॥ अपने पिया संग होरी खेलों । लज्जा कानि निवारि ॥ शुन्य शहरमें होत कुतूहल । करै राग अनुराग ॥ अपने पुरुषका दर्शन पावे । पूरन प्रेम सुहाग ॥ सतगुरु मिलि फगवा निज पायो । मारग दियो है लखाय ॥ कहै कवीर जो ये तत पावे । सो जीव लोक सिधाय ॥

धमार ६—ऐसे निर्गुण होली खेलिये हो । अहो मेरे साधो जहां पुरुष विसराम ॥ टेक ॥ मूल शब्दका बजै नगारा सहज उठे झन्कार ॥ असंख्य पाखंडीको लोक रच्यो है । बहु शोभा विस्तार ॥ वाकी आभा कायामें रहियो । गगन मंडलमें वास ॥ ताही सुमिरि हंसा पग धरिहो । काल न आवे पास ॥ निःअच्छर विहंगम जुग कीन्हा । वास धरै अस्थूल ॥ सब जीवन पर दया जु आई । प्रगट पुकारे मूल ॥ धरमदास तुम निज करि मानौ । यहि घर रहन हमार ॥ ऐसा मूल प्रताप जोरावर । चलत होय उजियार ॥ यहि प्रताप लोक पहुंचावै । सुरति निरति लिया साथ ॥ कहै कवीर सोई भल वंचै । मूल लेखा जिन हाथ ॥

धमार ७—ऐसे प्रभु संग होरी खेलिये हो । अहो मेरे साधो जैसे खेले हैं भुव प्रह्लाद ॥ टेक ॥ बालापन खेल खेलहि खोयो ।