कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
(७०४)
कवीरपंथी—
धमार ५—सतगुरुह संग होरी खेलिये हो । अहो मेरो साधो जाते जरा मरण भरमजाये॥ टेक॥ ध्यान जुगतकी करि पिचकारी । छमा चलावन हार ॥ आत्म ब्रह्म जो खेलन लागे । पांच पचीस मंझारि ॥ ज्ञान गलीमें होरी खेले । मची प्रेमकी कीच ॥ लोभ मोह दोऊ कटि भागे । सुनि सुनि शब्द अजीत ॥ त्रिकुटी महलमें बाजा बाजे । होत छतीसों राग ॥ सुरति सखी जहां देख तमाशा । सतगुरु खेलत फाग ॥ इंगला पिंगला सुषुम्ना हो । सुरति निरति दोउ नारि ॥ अपने पिया संग होरी खेलों । लज्जा कानि निवारि ॥ शुन्य शहरमें होत कुतूहल । करै राग अनुराग ॥ अपने पुरुषका दर्शन पावे । पूरन प्रेम सुहाग ॥ सतगुरु मिलि फगवा निज पायो । मारग दियो है लखाय ॥ कहै कवीर जो ये तत पावे । सो जीव लोक सिधाय ॥
धमार ६—ऐसे निर्गुण होली खेलिये हो । अहो मेरे साधो जहां पुरुष विसराम ॥ टेक ॥ मूल शब्दका बजै नगारा सहज उठे झन्कार ॥ असंख्य पाखंडीको लोक रच्यो है । बहु शोभा विस्तार ॥ वाकी आभा कायामें रहियो । गगन मंडलमें वास ॥ ताही सुमिरि हंसा पग धरिहो । काल न आवे पास ॥ निःअच्छर विहंगम जुग कीन्हा । वास धरै अस्थूल ॥ सब जीवन पर दया जु आई । प्रगट पुकारे मूल ॥ धरमदास तुम निज करि मानौ । यहि घर रहन हमार ॥ ऐसा मूल प्रताप जोरावर । चलत होय उजियार ॥ यहि प्रताप लोक पहुंचावै । सुरति निरति लिया साथ ॥ कहै कवीर सोई भल वंचै । मूल लेखा जिन हाथ ॥
धमार ७—ऐसे प्रभु संग होरी खेलिये हो । अहो मेरे साधो जैसे खेले हैं भुव प्रह्लाद ॥ टेक ॥ बालापन खेल खेलहि खोयो ।
शब्दावली
(७०५)
जवानीमें जोवन जोर ॥ यह मन भल कहो नहि माने । सांझ गिने नहीं भोर ॥ सनकसनंदन सुखदेव खेले । खेले शेष महेश ॥ कुलकुँ छाड़ि विभीषण खेले । कीन्हे हैं लंक नरेश ॥ अविनाशी संग विनसत नाहिं । जिनकी कथा अपार ॥ साधु ससुझि मूल गहि बैठे । सब जग लाग्यो डारि ॥ विरघ भयो कोइ नाम लैहै । ससुझि देख मन क्रूर ॥ निर्भय होरी खेल कवीर जी । घटहीमें हाल हजूर ॥
धमार ८—ऐसे खेलको कहा खेलिये हो । अहो मेरे साधो जामें आवागमन बसेर ॥ टे० ॥ निशि वासर जहाँ मिरतक व्यापे । भवसागरमें वास ॥ पांचों चोर छठो मन राजा । निश दिन करत विनास ॥ घर माटीको भीत झाँझरी । अष्ट धातको जडाव ॥ नव दरवाजे रहत मलीने । काहेको करत उपाव ॥ प्रकृति पचीसों संग जंजाली । काम क्रोध कोटवाल ॥ इतने कटकमें राजा भूलो । खेलत भरमको ख्याल ॥ भरम छोंड़ि अजहूँ किन चेतै । कहैं कवीर ससुझाय ॥ कहा हमारा जो कोइ माने । आवागवन नसाय ॥
धमार ९—अविनाशी दुलहा कवीर कब मिलिहो । अहो मेरो साधो सब संतनके रक्षपाल ॥ टेक ॥ जल उपजी जलसों नहि नेहा । रटत प्यास प्यास ॥ मैं विरहिनि ठाढी मग जोहूँ । राम तुम्हारी आस ॥ दिवस न भूख रैन नहीं निद्रा । गृह आँगन न सुहाय ॥ सेजरिया वैरन भई हमको । जागत रैन विहाय ॥ छांडया गेह नेह लाग्यो तुमसो । भयी चरन लवलीन ॥ तुम विनु जियरा यूँ तलफतु है । जैसे जल विनु मीन ॥ हमतो तुम्हारी दासीहो प्रभुजी । तुम हमरे भरतार ॥ दीन दयाल दयाकर आवो । साहिब सिरजन हार ॥ कै तो प्रान तजति हूँ साहेब । कै अपनी कर लेव ॥ दास कवीर विरह अति बाढी । हमको दर्शन देव ॥
कवीरपंथी शब्दावली २३
(७०६)
कवीरपंथी--
धमार १०—कैसे जीवेगी विरहनी पिया विनु हो । अहो मेरा साधो कीजे हो कौन उपाय ॥ टेक ॥ दिवस न भूख रैन नहीं सुख है । जैसे कलिजुग जाँम ॥ खेलत फाग छाड़ि चलि सुंदर । तजि चलि धन अरु धाम ॥ बन खंड जाय नाम लव लावो । मिलि पिया सुख पाय ॥ तलफत मीन विना जल जैसे । दर्शन दीजे हो धाम ॥ विना अकार रूप नहीं रेखा । कौन मिलेगा आय ॥ आपन पुरुष समुझिले सुन्दरी । देखो तन निरताय ॥ शब्दसरूपी जब पिया बुझो । छाड़ो भरमकी टेक ॥ कहै कवीर आन नहीं पूजा । जुग जुग हम तुम एक ॥
धमार ११—खेले तेरी माया मोहिनी हो । अहो मेरे साधो जिन जेर कियो संसार ॥ टेक ॥ चंद्र वदन मृगलोचनी माया । विद्वैलो दियो है लिलार ॥ जती सती सब मोहि लियो है । गज गति वाकी है चाल ॥ हरे रंगकी चूँदरी हो । माया पहिरे ताही ॥ शोभा अद्भुत रूपकी हो । महिमा वरनि न जाय ॥ जेते तेते लिये हो । घँघुट माँहि समाय ॥ आजन वाकी रेख हो । अदग गयो नहीं कोय ॥ छिड़कत थोथे प्रेम सुमाया । भरि पिचकारी गात ॥ सनकसनंदन कहत है । औरकी केती बात ॥ अनहद ध्वनि बाजा बाजे हो । सरवन सुनत भयो चाव ॥ खेलन हारे खेलिहै हो । बहुरि न ऐसो दाव ॥ ज्ञान डगा षग रोपिया हो । टारचो टरत न पांव ॥ बाँस लिये कर आपने हो । फिरि फिरि झूत जाय ॥ ब्रह्मा शंकर वश कियो माया । दोऊ पकडे जाय ॥ फगुवा लीन्हो आपनो हो । बहुरि दियो छिटकाय ॥ नारदको सुख मोरिकै । माया लीन्हो बसन छुटाय ॥ गर्व गहेली गरबते हो । बहुरि चली मुसकाय ॥ सुर नर मुनि एक ओर भये हैं । एक अकेली आप ॥ सन्मुख कोऊ ना रहै हो । मारि लियो एक धाप ॥ इन्द्र सकुच
शब्दावली
(७०७)
ठाढे गढौ भयो हो । लोचन ललित अंजाय ॥ हरि अविनाशी उबरे हो । कहै कवीर गुण गाय ॥
धमार १२-भरम भुली माया जग मोहै हो । अहो मेरो साधो खेलत भ्रमको ख्याल ॥ टेका ॥ कटि केहरि गज गामिनी माया । संशय कियो सिंगार ॥ राखे रोकि सब मोह नदीमें कोऊ न उतरचो पार ॥ ब्रह्माको चित्त चोर लियोहै । शिवको लीन्हों साथ ॥ बस किय विष्णु विश्वके ठाकुर इंद्र नवायो माथ ॥ तैंतीस कोटि छले सुनि देवा । डारचो भरम गुलाल ॥ बरन फेरि अवरन होय नाची । ऐसी अलबेली नारि ॥ पंडित आविन आँजन आँज्यो । मूरख आँखिन धूरि ॥ जती सती सब बाँसन मारे सुरनर सुनि किय चूर । गोपीचंद भरथरी गोरख । खेलन आये फाग ॥ शृंगी ऋषि पाराशर लुटे ॥ छांडि छांडि वैराग ॥ सात दीप नौखंड तिहुपुर । फगवा सब सो लीन ॥ ठाढी विनती करै कबीरसों, हम तुमरे आधीन ॥
धमार १३-तुम दीन दस खेलों साजना हो । अहो मेरो सेतो बहुरि न ऐसो दाव ॥ टेक ॥ रिनु वसंत माया संजोरी । कछुक करो अनुराग ॥ फिरि पीछे पछतावगे संतो बीति जायगी फाग ॥ ग्यान डगा तुम रोपि हो । सन्मुख रहो सम्हारि ॥ मारेगी चित्त चोरकै हो । मोहिनि चंचल नारि ॥ हरि सुभिरनकी गारी दीजै । गुरुकै वचन संम्हारि ॥ साधु संगति तुम जोरिकै हो । कबहुं न आवेगी हारि ॥ अनहद बाजा बाजे सखीरी । नौतम प्रीतम ठाय ॥ केशरि चरचो प्रेमकी हो । जुग जुग रंग न जाये ॥ कहै कवीर ऐसी होरी खेलो । तीन तीसको मारि ॥ नाम गहेते परम पद पड़ये । आवागमन निवारि ॥
धमार १४-कर मन संग भरमत केई जुग गये । अहो मेरो
(७०८)
कवीरपंथी-
साधो उपज्यो न केवल ज्ञान ॥ टेक ॥ कबहुँक बन चर तुम भये हो । कबहुँक तिन चर रूप ॥ कबहुँक सिंह दहारत वनमें । कबहुँक मीड़क कूप ॥ कबहुँक नरपति तुम भए हो । कबहुँक मांगत भीख ॥ कबहुँक गज होय घूमंत डोले । कबहुँक मस्तक लीख ॥ कबहुँक विकत तुम भयो हो । कबहुँक गये फँदे जंगल ॥ कबहुँक उड़िकै गये गगनकूँ । कबहुँ गये पाताल ॥ कबहुँक सुरपति तुम भये है । कबहुँक नरक निदान ॥ कहै कवीर ऐसे भरम डोले । जैसे सूकर स्वान ॥
धमार १५-ऐसे पिया संग होरी खेलिये हो । अहा मेरो साधो सुरति सुहागिन नारि ॥ टेक ॥ पांच पचीस सखियनकी संगति तत मत सखी लिया साथ ॥ अरस परस पियाके संग राची । सहज लकुटिया हाथ ॥ गगन मंडलमें होत कुलाहल । उठत राग अनुराग ॥ बाजत ताल मृदंग झांझि डफ । बहु विधि भयो सुहाग ॥ ग्यान गुलाल अनहद अरगजा । चित चोवां मन लाय ॥ कर-करनी केशरि रंग भीनी । विन रसना गुन गाथ ॥ धन सतगुरु धन साधुकी संगति । धन हमारे भाग ॥ सांची फाग भगति सतगुरुकी । कहै कवीर सुहाग ॥
धमार १६-अभि अंतर अनहद सुरली बाजे । अहो मेरो साधो चलो न देखन जाय ॥ टेक ॥ काया कुंज गली वृन्दावन । अनुभव जमुना नीर बैन वजाई बीचमें मोहन नाभि कमलके तीर ॥ सुधि बुधि विसार गई सब श्यामा । सुनि सुरलीकी टेरे ॥ उलटी सिंगार कियो है आतम । पहरचो है अम्बर फेर ॥ सुरलीको शब्द सुनत सब गोपी । भूलि गई परिवार ॥ पांच पचीस ॥ सखी संग राधो । भेटन चली है सुरार ॥ आस पास गोपियनको मंडप । विचि विचि परमानन्द ॥ भयो उछाह प्रेम अति
शब्दावली
(७०९)
वाटचो । ज्ञान उदय जिमि चंद ॥ थाके चंद सुरगुन मारुत । वहै न जमना नीर ॥ सुनि सुनिवरको ध्यान डिग्यो है । बछा न पीवै क्षीर ॥ घट घट रास रच्यो वृन्दावन । घट घट गोपी कान्ह ॥ घट घट राम रमे अविनाशी । जाने कोई संत सुजान ॥ सतगुरुके प्रताप सखीरी । वरनि सुनायो रास ॥ मानुष जन्म सुफल भयो साधो । विं धनि धरमदास ॥
धमार १७—अहो अविनाशी दूलहा कब मिलिहो हो ॥ हो भाई साधो मिलिहो सनेही आय ॥ टेक ॥ जल उपजे जलसो नहिं नेहा, रटत पियास पियास । मैं विरहिन ठाढी मग जोहों, पिया मिलनकी आस ॥ दिन नहिं चैन रैन नहिं निद्रा, घर अंगना न सोहाय । सेजरिया बैरन भइ हमको, जागत रैन बिहाय ॥ हूं तो तुम्हरी दासी साहब, तुम हमरे भरतार । दीन दयाल दया करो जन पर, साहब सिरजन हार ॥ आमिनकी बिनती सुन साहब, रहूं चरन लौ लीन ॥ तुम बिन जियरा ऐसे तलफे, जैसे जल बिन मीन ॥ की हम प्रान तजत हों साहब, की आपन कर लेव । साहब कवीर बिरह रस भोगी हमहूं को दर्शन देव ॥ १ ॥
धमार १८—अहो ऐसे गुरु संग, होरी खेलिये हो हो ॥ हो भाई साधो हो, जरा मरन भ्रम जाय ॥ ज्ञान जुगतकी कर पिचकारी, छमा चलावन हार । आतम ब्रह्म संग खेलन लागे, पांच पचीस मंझार ॥ ज्ञान गलीमें खेलैं होरी, मची प्रेमकी कीच । लोभ मोह दोउ कुटि कुटि मैं, सुनि सुनि शब्द अजीत ॥ त्रिकुट महलमें बाजा बाजे, हौ छतीसो राग । ज्ञान ध्यान दोउ देखै तमाशा, सतगुरु खेलैं फाग ॥ ईगला पिंगला सुषुमन रोको, सुरति निरति दोउ नार । अपने पिया संगहोरी खेलो, लजा कान निवार ॥ सुन्न महलमें होत कुतूहल, करहिं राग
(७१०)
कवीरपंथी—
अनुराग । अपने पियाके दरशन पाऊँ, पूरन प्रेम सुहाग ॥ सत-गुरु फगुवा पाइया हो, मारग दियो बताय । कहैं कवीर जो यह तत्त्व पावे, सो जन लोकहि जाय ॥
धमार १९—अहो साहब संग होरी खेलिये हो ॥ हो भाई साधो हो खेलो तन मन वार ॥ टेक ॥ धोखेकी एक होरी बनाई, भवको डाँढो गाड़ । दुबधा की जार लाय इत उतसों, लब्बाको देउंगी जार ॥ प्रेम पावक ले होरी दागों, कर्म बरूला डार । भावर दे दे मंगल गावों, त्रिगुण फंद निरवार ॥ ससुझकी झोरी सुमतिने पकरी, होरीकी भस्म लई झार । जित कित धूर उड़ाय जगत पै, कुल पर डारोंगी छार ॥ करनी को केशर घटमें घोरों, रहन करो पिचकार । परख पतंगके रङ्ग उतारों, देउंगी मन पर डार ॥ दया अबीर गुलाल धर्म कर, चित चंदन लेह गार । सतगुरु मुख पर डारों, प्रीतिसों, पाँचौ चोरन मार ॥ जो कछु चाल होय गुरु सप्रथ, पहिले देहु तिस्वार । आमिनकी बिनती सुन साहब, फगुवा देहु हमार ॥ कहैं कवीर सुन धर्मनि नागर, अब है राह बिचार । अमी अंक परवाना पावै, पहुंचे पुरुष दुआर ॥
धमार २०—अहो बैरागी नागर होरी खेलिये हो हो ॥ हो भाई साधो हो, खेलो निरगुन नाह ॥ गढ बांधोंमें चाचर खेलै, निरगुन नाम विचार । संगन सनेह, हंस परबोधो, जमसो जीव उबार ॥ सूर सनेह गहो निशि बासर, सुषुप्त वेद टकसार । निरगुन नाम निअच्छर गावो, जुग जुग शब्द पुकार ॥ मंदिर-सों निकसी एक सुंदर, कर पग शीश न छंद । बिन नेनन देखिये वाकी सुरत, दिन दिन परम अनंद ॥ बिन जुगबंध काल छोड़े, बहु विधी भेष बनाय । जब लग जमकों चिरे न कागद,
शब्दावली
(७११)
काल धरी धरखाय ॥ पिंड न प्रान देह नहि सुंदर, विन रसना गुन गाय । ऋग यजु साम अथर्वण थाके, विन गुरु कौन लखाय ॥ जोजन तीन चले विन चरनो, करपलो परमान । सुर नर मुनि जाको मर्म न जाने, निरगुन चतुर सुजान ॥ तैंतीस कोटि देव नहि जाने, निरगुन भेद नियार । कहैं कवीर मुक्तिके दाता, परख परख टकसार ॥
धमार २१—अहो करनाटक नागर होरी खेलैं हो हो ॥ हो भाई साधो हो खेलैं जो राय बंकेज ॥ टेक ॥ एक समय गज अस्थल आये, करनाटकके लोग । बिहँसि बिहँसि सब मंगल गावैं, बहुत करहिं सुख भोग ॥ राय बंकेज हंसनके राजा, गज अस्थल कडिहार । हंसन पार उतारहीं, परख परख टकसार ॥ हंस हंस युग बांधहीं, जम सों जीव छोडाय । सत्य शब्द दे लोक पठावैं, अभय निशान बजाय ॥ ज्ञान सुगंध धरो घट भीतर, कुबुधि अबीर उडाय । सुरति शब्द जीवनको दीन्हे, हंस लिये सुकताय ॥ भये लवलीन हंस सुकताहल, सतगुरु बांह चढाय । कहैं कवीर मुक्तिके दाता, तबहिं अभय पद पाय ॥
धमार २२—अहो भर्म भारी माया जग मोहे हो हो ॥ हो भाई साधो हो जेर कियो संसार ॥ टेक ॥ कटि केहरि गजगामिनि माया, संशय कियो सिंगार । रोक रही सब मोह नदी में, कोई न उतरे पार ॥ ब्रह्माके चित चोरी माया, शिवको लीन्ही साथ । बस कीन्ही बसुधाके ठाकुर, इंद्र नवावै माथ ॥ तैंतिस कोटि छले मुनि देवा, डारी बिरह गुलाल । बरन फेर अबरन होय नाचे, ऐसी अबला नार ॥ पंडित आंखिन अंजन दीन्हे, मूरखके सुख धूर । जती सती सब बांसन मारे, सुर नर मुनि किये चूर ॥ गोरख गोपीचंद भरथरी, आये खेलन फाग । शृंगीऋषि पाराशर
(७१२)
कवीरपंथी-
आये, छांड़ छांड़ बैराग ॥ सात द्रौप नौ खंड तिहुंपुर, सो सो फगुवा लीन्ह । साहब कवीरसों अरजी करत हैं, तुम मोहिं कछू न दीन्ह ॥ ६ ॥
धमार २३—अहो गुरुगम सों होरी खेलिय हो हो ॥ हो भाई साधो हो शब्द सुरति लौ लाय ॥ टेक ॥ कोई एक नाम निरंजन ध्यावे, कोई कहे निरधार । जोत सुरूपी अलख कहत है, राँचि रहौ संसार ॥ कोई दुर्गा शिवको जाने, कोई जाने भूत । कोई यंत्र मंत्रसों राचे, मूल विसारो सूत ॥ कोईक नवली कर्महिं साधे, पवना देह चढाय । बिंदहिं साध भगन होय फूले, सतगुरु शब्द न पाय ॥ अजपा सुन्न जपे सब कोई, छर अच्छर लग दौर । मारग भूल फिरे भटकाना, मन आवत नहिं ठौर ॥ कोई ओहं कोई सोहं ध्यावे, कोई एक नहिं ठहराय । घटमें ज्ञान कथे सब ज्ञानी, तन छूटे कहं जाय ॥ पूरन ब्रह्म कहे सब कोई, सो जग करे अहार । तन छूटे कहु मिले ब्रह्मको, जनम जु होत खुवार ॥ ऊर्ध तपे बन खण्ड जात है, खात वृच्छके पात । जोगी जंगम औ दरवेसा, भेष धरे संसात ॥ कथनी बकनी पार न पावे, सतगुरु शब्द अकाल । अच्छरमें निःअच्छर दरशे, सतगुरु होहिं दयाल ॥ युक्ति जान खेले जो कोई, शब्द डोर चढ जाय । अमर लोकमें पुरुष विदेही, सत कवीर लौ लाय ॥ ७ ॥
धमार २४—अहो कोई नाम रंगीला सतसंगी हो हो ॥ हो भाई साधो हो गहो शब्द टकसार ॥ टेक ॥ प्रेमसो गगन पखावज बाजे, बिन कर बाजे ताल । रुनक झुनक अनहद धुनि बाजे, उठत छतीसों राग ॥ अरुन बरुन गुलाल बहुरंग । बहुरूपी पांचौ राव । इन पांचौं विश्वास न लीन्ह, खेले त्रिकुटी भाव ॥ प्रेमके रंग सींचत रहै, अष्ट कमल परकास । ज्ञान गली छूटे पिचकारी,
शब्दावली
(७१३)
भँवर गुफा निज वास ॥ गगन मंडलमें होरी खेलैँ, तत्त्व मता गलतान । फगुवा नाम लिये बन आवै, पावै मुक्ति फलदान ॥ कहै कवीर ऐसी होरी खेलो, तीनों तापको मार । निगम ये जावो परमपद पावो, पूरन जन्म निवार ॥
धमार २५-अहो सतगुरु संग होरी खेलिये हो हो ॥ भाई साधो हो बहुर न ऐसो दाव ॥ टेक ॥ खेलत हंस बंस कर लीन्है, मित गये विषय विकार । भाव रचेउ रंग संग निज पायो, खुलगये दशाहु दुवार ॥ गगन गुलाल उड़ाव रैन दिन, भर पिचकारी शील । खेलत हंस परमपद पावै, बिमल हंसनकी भीर ॥ गगन मंडलमें हंसा खेलै, चढे सवाया नूर । खेलै हंस सोहंगम डोरी, वर पाये भरपूर ॥ सोरह सुतका एक तत्त्व है, जासों न्यारा बीज । कहै कवीर हम निश दिन खेलैँ, सतगुरु दीन्हा चीज ॥
धमार २६-अहो नित मंगल होरी खेलिये हो हो ॥ हो भाई साधो हो, नितही बसंत नित फाग ॥ दया धरमकी केशर घोरो, प्रेम प्रीति पिचकार । भाव भक्ति भर भर सतगुरु सो, सुफल जनम नर नार ॥ छमा अगर छिरक चित चन्दन, सुमिरन ध्यान धमार ॥ ज्ञान गुलाल अगर कस्तूरी, उमँग उमँग रंग डार । चरनामृत प्रसाद चरन रज, अपने शीश चढाय । लोक लाज कुल कान तोरके, निरभय निशान बजाय ॥ कथा कीर्तन मगन महोत्सव, करे संतनकी भीर । कबहुँ न काज बिगरे नर तेरो, सतगुरु कहै कवीर ॥
धमार २७-मन रंगी राजा खेलै धमार ॥ काहूको पाताल पठावै, काहूको देत अकाश । काहूको बैकुंठ पठावै, फिर फिर नरकमें वास ॥ ब्रह्मा विष्णु महेश्वर बांधे, माया रसरी डार । सुर नर मुनि सबहीको बांधे, कोइ न सके निरवार ॥ जोगी जती
(७१४)
कवीरपंथी—
तपी संन्यासी, दिगंबर दरबेस । सनक सनंदन सबही बांधे, काहु न पायो भेश ॥ तेंतिस कोटि देवता बांधे, माया रसरी डार । कहैं कवीर तेई जन बांचे, चीन्हा शब्द हमार ॥
शब्द चाचर ।
चाचर मची अब हो हो खेल जिन चाचर माहीं ॥ टेक ॥ चाचर खेलें दोय जने एक मन औ माया । पंथ चलन नहिं पावै बहु द्रन्द्व मचाय ॥ लोभ मोहकी पिचकारी मारो चतुरा ज्ञानी । सुर नर सुनि सबही छले जेते अभिमानी ॥ डफ कपटही बाजे सही बहु जग भरमाई । तृष्णा लागे खेलई सम्हरा नहीं कोई ॥ काम क्रोधकी अरगजा सब अंग लगीई । आशा तो चहुँ दिशि फिरे सब सुधि बुधि खोई ॥ नाना रंग बनायके नाचे मन माया । ठांव ठांव फंदा रचे कोई जान न पाया ॥ अंग अनेक दिखायके सबही जग खाया । मचे खेलके आंधरे काहु मरम न पाया ॥ षट् दरशन सब खेलहीं बहु भेष बनाई । मन रंगीके खेलमें सबही बिलमाई ॥ पंडित वेद पुरानको पढ पढ अरथावैं । शेष सहस मुख गावहीं कछु भेद न पावैं ॥ तीर्थ व्रत जग लागिया धावै चहुँ ओरा । देवी देवल देवता खेलैं सब ठौरा ॥ सुख संपतिके कारने अरुझा सब कोई । अंतकाल औसर परे कोई संग न होई ॥ पछा पछी सब खेलहा बहु भरम झुलाने । वार पारकी सुधि नहीं कथनी लपटाने ॥ जाके जो कछु मन बसे वह वाही माने । सत शब्द चीन्हें नहीं बहु झगरा ठाने ॥ सांचेको माने नहीं जिह्वाके लपटी । वादिनकी कछु सुधि नहीं जम मारे झपटी ॥ मन मायाके रंगमें सबही ये भूले । चौरासीके खेलमें सदा जोनी झूले ॥ सतगुरु शब्द पुकारिया खेलै जो कोई । भौसागरके भय नहीं फिर
शब्दावली
(७१५)
जन्म न होई ॥ कहैं कवीर विचारिके खेलो तुम साधो । न्यारा सबही खेलते जाको अवराधो ॥ १ ॥
सत्यनाम ।
अथ कहरा प्रारम्भः ।
**~
कहरा १-मतसुन मानिक मतसुनु मानिक मतसुनु मानिक सब धारैरे । मगन हुआ जब घर उठिचाला गुरुके चरण चित तुव धारैरे ॥ बगला पक उछारी मच्छी सो धिमरा कैसे पावैरे ॥ वंसी टूटि पड़ी पानीमें है कोई गांठ जुरावैरे ॥ तीन लोक धिमरा फिरि आया सिमरीके अन्त न पावैरे ॥ चारी चरण सिमरीके कहिये नो पंखुरी पखानारे ॥ नाका तोड़ि बैठ उर अंतर सतगुरु जुगति लखानारे ॥ दो मुख शब्द पडे टकसारा बूझै संत सुजानारे ॥ सुर नर मुनि और औलिया ब्रह्मा विष्णु महेसा रे ॥ कहै कवीर शब्द विन परखै पार न पाया सेसा रे ॥
कहरा २-अरे मन मिहरा करहु तयारी विलंब करे भल नाहि रे ॥ बेगहि सुरति करो तुम धुरकी दिन सब वीते जाहिरे ॥ पांच कोटि और नौ हैं नारे वे सब वेगि मुखैहैरे ॥ यह तन नदी झर हुइ जैहै मंछा हाथ न ऐहैं रे ॥ धीरज करी तुम डारौ वंशी इस विधि मंछा ऐहैरे ॥ नातर तो मगरा हरि खैहैं जीव अकारथ जैहैरे ॥ निरति सुरति करि धागा बांटो शब्द सुई पहिरावोरे ॥ अंतर कबहुं रहन न पावै ऐसा जाल बनावोरे ॥ शब्दकी डोरि तहां गहि राखो इस विधि जाल पसारोरे ॥ पांच पञ्चीसो सिमरी भमरी सोई वेगि धरि मारौरे ॥ ए मन मिहरा वेगि मथौ तुम पवन महर ले साथारे ॥ इक मत हुईकै चढोना उपर सिमरी आवै हाथारे ॥ वा सिमरीको लखै न कोई जहां मनसा जाई रे ॥
(७१६)
कबीरपंथी—
पिछले महरा जहाँ लग होते खोजत रहे भुलाईरे ॥ नौ दरवाजे हैं सिमरीके जे सबहि तुम रोकोरे ॥ पिछली प्रीति बिना कर जोरे दास पठावै छेकारे ॥ जिस सिमरीके रूप न रेखा नहि बरन नहि मेषारे ॥ जा खोजत सुरनर सुनि थूले कोई विरले पेखारे । झिलमिल नीर तिरवेनी संगम तहाँ ब्रह्मका बासारे ॥ कहै कबीर सुनो तुम साधो एक नामकी आशारे ॥
कहरा ३—नाम सुमिर मन नाम सुमिरि मन नाम सुमिर मन मेरारे ॥ आवत जात बहुत दुख पैहो धरि धरि तन बहु तेरारे ॥ बालापनके गुनह करम सब प्रगट कहौ सुनिहौरे ॥ सुखसे भेट भयी नहि कबहूँ बहु दुख दारुण कीयारे ॥ सरवन कथा सुनी नहि कबहूँ वचन सुचि मानारे ॥ नयना सुंदर रूप लुभाना यही करत मन माहिरे ॥ जीभ्या तेरी षड्दर राती है अंतर रस मानीरे ॥ नासा तेरी वासकी बासे विशेष विशेषारे ॥ सरवन तेरे रागके भीने अनहद शब्द न परेखारे ॥ कामी पड़े कामके वशमें छीतज दिन औ रातीरे ॥ एक घडीके सुखके काजै खोवे कुल और जातीरे ॥ संगी तुम्हरे गुता महरम लाजत नहि लबारारे ॥ राग बाग तन कस करि बांधो शब्द गहो हथियारारे ॥ गहि हथियार खेत मत छांडो रहियो खेत मंझारारे ॥ सूरा पनकी गति है न्यारी जाने संत कोई सुरारे ॥ पांच पचीस पकड़ि वश कीने जूझे गगन दुवारारे ॥ शूरा होयसो सम्मुख जूझै दरसै अलख अपारारे ॥ समष्टिको सतगुरु दर्शे परसे अपरम पारारे ॥ ऐसी रहन रहै कोइ हंसा आवै लोक हमारारे ॥ कहै कबीर नाम को कहरा परख शब्द टकसारारे ॥
कहरा ४—निहुरि नाच मन निहुरि नाचमें तेरी दुलहिनियारे ॥ निहुरे नाचे शब्द विचारै चित्र विचित्र रहिनियारे ॥ कुंवटा एक
शब्दावली
(७१७)
पांच पनिहरियाँ पनियां भरे पतलवारे ॥ बात सखीनसों चित गगरी सो चित सों गगरी न छूटे रे ॥ चित छुटे तो गगरी फूटे पनियां खिर गगरी फूटे रे ॥ पानीके प्यासे पीरेवा उर बैठि शब्दकी छहिरे रे ॥ आगि लगे तेरी मथुरा नगरीया कान्ह पियासे जैहैरे ॥ ज्ञान धनुईयां सुमति तीरले तृष्णासों विधि मारे रे ॥ कहै कवीर नामको कहरा महरम कोई विचारैरे ॥
कहरा ५-सूल छाँडि ते डारन लागा ते नर परम अभागारे ॥ सोइ सोइ सब रैन गँवाई भोर भये नहिं जागारे ॥ शब्द पुकारत जागत नाहीं जनम जनमके सुतारे ॥ बांधे गरे रहटकीसी घडिया आवत जात विगूतारे ॥ पूरब जाऊँ तो राम बखाना पश्चिम अल्लाह मकानारे ॥ दोनों दिन खोजि हम देखे सतनाम मन मानारे ॥ देवल जाऊँ तो पत्थर पूजा तीरथ जाऊँ तो पानीरे ॥ आसपास पकिमा दीनी पत्थर न बोला बानीरे ॥ ओछी बुद्धि अगोचर बानी सो गति विरले जानीरे ॥ गुरुका सबद बसे जिस घरमें सोई सतब्रह्म जानीरे ॥ तुरक मसीत देहरा हिन्दू दो बिच राम खुदाईरे ॥ तहां मसीत देहरा नाहिं जहां अगम ठकुराईरे ॥ विन गुरु ज्ञान भरोसा किसका सरनो किसके रहियेरे ॥ कहैं कवीर एक तरवर फूला उपजी अनहद बानीरे ॥
कहरा ६-पंछी एक चौँच विन पगका विन पंख उडि आवैरे ॥ अलष अलेष लषै तन मनमें जोरे तनक डुई जावैरे ॥ गगन मंडलमें उसका वासा अनहद नाद बजावैरे ॥ डुइकै बीच ब्रह्मका वासा सतगुरु होय लषावैरे ॥ मांको मारि बापको बांधे घरमें अगिन लगावैरे ॥ काम क्रोधका करै पियाला निरत सुरत ठहरावैरे ॥ सलिल न्हाई देखि जमुना कौं भंवर फाकौं धावैरे ॥ नाम कमलकौं समकरि राखै अठसठ चार मिलावैरे ॥ बंक
(७१८)
कबीरपंथी—
नालकों गहि कर पकरै सुषमन सिखर चढावैरे ॥ घरके घेरि घेरि घरही में उलटि उलटि परचावैरे ॥ अनहद बाजै मधुर धुनि गाजै आपा सब विसरावैरे ॥ परम हंस जहाँ केल करत हैं सत-गुरु सहज लषावैरे ॥ हुइ निहचंत चिंता सब तजिके सब अल-मस्त कहावैरे ॥ कहैं कबीर ज्ञान गुरगमसैं अटल हुआ लौला-वैरे ॥
कहरा ७—अगम अगोचर ऐसारे । मैं कहि बतलाऊँ कैसारे ॥ जो कहिये सो हइयै नाही है सो कहा न जाईरे ॥ सैना बैना कासौ कहिये गूँगेका गुठ भाईरे ॥ दिष्ट न आवै सुष्ट न आवै विनसैं होइ न न्यारारे ॥ ऐसा ग्यान कथौ गुर गरूए पंडित करौ विचारारे ॥ काजी हाथ कितेब न बाँचै पंडित वेद पुरानारे ॥ वह तो अक्षर लिखा न जावै मात्रा लगे न कानारे ॥ कोई धावै निराकारको कोई धावै अकारारे ॥ वह तो सत दोउन तैं न्यारा जाने जाननहारारे ॥ समझा होइ सो सबद विचारै अचरज है अनजानारे ॥ समझ न परै ग्यान मतहीना आवागमन समा-नारे ॥ रागी वाणी पठना गुनना बहु चतुराई भीनारे ॥ उतपत्त परलै कबहुँ न आवै सो सत विरले चीन्हारे ॥ जिन चीन्हा सो लोक समाने अमरलोक निज सूझैरे ॥ कहैं कबीर नामको कहिरा महिरा होइ सो बूझैरे ॥
कहरा ८—ऐसा मंदिल रचा विनानी सो गत विरले जानीरे॥ अष्टधातका किया गिलावा दरज अन्तूठी ठानीरे ॥ दोनों खंभ दसौ दरवाजा चौका सचौक पुरायारे ॥ पाँचो करी पचीसौ की रचना ऐस । महल बनायारे ॥ दस दिगपाल देहके माहीं जिनकी दस दस नारीरे ॥ निस दिन केल करे घट भी इच्छा सकलर विचारीरे ॥ नौके परै निरंतर शोभा तहां सरस इक छाजारे ॥
शब्दावली
(७१९)
द्विष्ट मुष्ट तँ अगम अगोचर ऐसा गढका राजारे ॥ कोट गियान सबद तहाँ उचरै सुनौ सत परवानीरे ॥ कहैं कवीर बद्र नहि चीन्है बादकी करावे ग्यानीरे ॥
कहरा ९-संसा मेटि लगे गुरचरनौ सतनाम मुख बोलौरे ॥ या तरवर एक बसे पखेरु आ चुगत जुगन लिये डोलैरे ॥ यह पंछी कोई मोहि बतावे जो घट माहीं बोलैरे ॥ याकी संधि लखै जन कोई कौन ठमहि बोलैरे ॥ आवै संझ उडि जाइ सवेरा गम न काहू देवैरे ॥ दरमत छाँड अनंद घर छावै पंछी बसेरा लेवैरे ॥ दूइ फल चाखि नषर वह आगै और नहि दस दीसारे ॥ कहै कवीर साध कोई जाने सतनामकी आशारे ॥
कहरा १०-सुनो संत इक निरगुन कहरा महरा होय सो बूझैरे ॥ तनसे न्यारा मनहुसे न्यारा देउ द्विष्ट होइ सूझैरे ॥ विन नैनन जहाँ सब कछु दीखै विन सरवन सुनै वानीरे । विना नाशिका वास सुवासा घट रस पावै ग्यानीरे ॥ विना जिभ्या जहाँ अमृत भोजन विन इंद्दी संजोगारे । पांच पचीस जहाँ हैं नाहिंनहीं संजोग बिजोगारे ॥ रूपरेख विन निरगुननामा सत गुरु लखावैरे । कहैं कवीर नामकी महिमा ग्यानी होय सो पावैरे ॥
कहरा ११-वा घरकौ कोई मोहि बतावो जा घरसैं ब्रह्म आयारे ॥ काया छाँडि चले जब हंसा तब ब्रह्म कहाँ समायारे ॥ मैं मेरी ममताके काजैं बारहिबार ठगायारे । समझ न परत ग्यान मति हीना फिरि फिरि भटका खायारे ॥ अब मेरी प्रीति नामसौं लागी उलटि निरंतर धायारे ॥ सहजै सुषुमनि पाउ पलौटे निज धनी अपनायारे ॥ नहीं जहाँ चंद्र नहीं जहाँ सुरा जहाँ जाइ मठ छायारे ॥ कहैं कवीर ग्यान धुनि माहीं सहजै सहज समायारे ॥
(७२०)
कवीरपंथी-
कहरा १२-जोरा जोर रचा जुग ऊपर संतौ करौ विचारारे॥ एक ओर सुरनर मुनि ठाढे एक अकेली मायारे ॥ पाराखिको पानपटारी सिर ब्रह्मोको झाहीरे ॥ नाथ मछंदर पीठि दै भागे गोरख पैज सम्हारिरे ॥ नारद केरि निशान ठवाये हनमत हांक इकारिरे ॥ ऋषि से वनमें लूटे शंकर नेजा धारीरे ॥ वृन्दावनकी कुंज गलिनमें लूटे कुंज विहारीरे ॥ कहैं कवीर पाषरिया लूटे रइयत कौन विचारिरे ॥
कहरा १३-मन मतवारा नाम रस पीवै गगन मँडल गुन गावैरे । नाम सुधा रस भर भर पीवै सुषुमन सुरति मिलावैरे ॥ ग्यान सुराही भरे कलवरिया छकि २ मोहि छकावैरे । साध संत मिलि पीवन लागै अनहद धुनि मुनि पावैरे ॥ सतगुरु दया बहु कीनी घट घट अलख लखावैरे । दास कवीर कहरा गावै महरा होय सो पावैरे ॥
कहरा १४-चुनरी हमारी पियने सुधारी ओढेगी पिय की प्यारीरे । हूठ पैडकी बनी चुनरियां या चौपाट अपारीरे ॥ बिनहीं ताना बनी है चुनिरिया बहु विधि रूप सम्हारिरे । चांद सूरज दोऊ अबलां लगाये जगमग जोति उज्यारीरे ॥ पांच पचीस वाके पैबंद लागे ओढेगी री ज्ञनवारीरे । कहैं कवीर साधु भल सोई एक नाम व्रत धारीरे ॥
कहरा १५-गगन युफामें पैठि क्यों न देखो जहां पुरुष इक ऐसारे । दिष्ट न सुष्ट न अगम अगोचर जाने जो तैसारे ॥ तामैं हम सोई हम मांही पकरि देहुं क्या भैंसारे । सतगुर सबद परष जब आवै परषन कौं क्या पैसारे ॥ समझे सबद समझ घट आवै वह जैसेका तैसारे । कहैं कवीर सुनो तुम साधो है हम मैं हमहै सारे ॥
शब्दावली
(७२१)
कहरा १६-अबगत नगर बसौं भाई हंसा आवागवन मिटा-ईरे । काल अकाल जंजाल न व्यापै तिहि पुरवतन कराईरे ॥ उदै नहिं अस्त दिवस नहीं रजनी पाप पुत्र नहीं दोईरे । मोक्ष न सुकति जनम नहिं बंधन उपजे मरे न कोईरे ॥ ब्रह्म सहर जहां निर आलम है अलष पुरुष किंछु होईरे । कहैं कवीर अमरपुर वासा इह सुख जाने सोईरे ॥
कहरा १७-जिनके सुभाग भाग बड़ पियासौ सोईं नारि सुहागिनरे । जो तूं पियकी आज्ञा मानै कबहु न होत दुहागिनरे ॥ जो पिय मारे पाऊं न टारे सहई कठिन कसौटीरे । जो पिय मारे गहि झिझकारै पियके चरन पलोटेरे ॥ उलटि घटा अनहद घहरानी बाजत अनहद तूरारे । सरग उडि कागदकी गुडिया सुरत डोर कर पूरारे ॥ जो कबहुं छुटि जाई हाथसौं तो सब होत बिगारारे । उर अन्तर निरबान पुरुष है पुहुष दीप उजियारारे । ताहि लचै कोई संत विवेकी सुषमन सुरति लगावैरे । दास कवीरका निरगुन कहि रामहि रम होई सो पावैरे ॥
कहरा १८-पुरुष पुरातम वसै अपारा ताहीं सै नेह लगावौरे । पुदगल रूप दियो करतानै शील कंकन पहिरावौरे ॥ भाउ भगतका करौ चोलना ग्यान भूत रमावौरे । या घट भीतर ब्रह्म विचारौ खोज अगमका पावौरे । शील संतोष ग्यान धुनि लागी अधिक नेह नहीं छूटेरे । जो कहूं छूटि परै भै माहीं पकरि जम तब लूटेरे ॥ चांद सूरजकी बनी पलकिया चढ़ि चलो देश हमारारे । अमर लोक हंसनका वासा दरसै दूरस अपारारे ॥ अमृत फलका भोजन पावे हुइहै मगन दिवानारे । कहैं कवीर नामको कहिरा बूझे संत सुजानारे ॥
कहरा १९-तेरे तो कारन मेरे मन मोहन ढूँढा देश विदेशारे ।
(७२२)
कवीरपंथी-
सब फिरि आया कहुँ न पाया किनी तपसी की भेसारे ॥ तीरथ वरत बहु विधि कीना धूप शीत तन गारारे । तेरे कारने मेरे मन मोहन पांचो इंद्री जारारे ॥ सरवन सुनले विषकी बातें अब इम- रत चितधारारे । नाहीं विषकी वास सुहाती अब सत सबद सुवासारे ॥ नैन विषै रस माते फिरते अब निज रूप निहारारे । जिभ्या षट रससे लुभानी अब तो नाम रस पीयारे ॥ पांचो इन्द्री विषै रस मानी लाज कान नहीं कायारे ॥ त्रिपति भई सब पांच पचीसौ घरही बैठे आयारे ॥ गुर गम नाम अमीरस प्याया पियत परमपद पायारे । दास कवीर सुषमना वासी गगन पयाना दीयारे ॥
कहरा २०-धागा टूटा गगन विनसि गया हंसा कहाँ समाई रे । इह अचरज मोहि निसि दिन व्यापै कोई न कहै समझाईरे ॥ धर नाहीं घरन नाहीं धरावन हारा नाहीरे । इंगला पिंगला सुषमन नाहीं यह गुन कहाँ समाहीरे ॥ सबद अतीत रहै संग रमता यह गुन कहाँ समाईरे । टूटी जुरै जुरी फिरि टूटै जब तब होइ विनासारे । तबको साहिब अबको सब कहु काको बिसवासारे । सीषै सुनै कहै कहा होई जो नहि पढ़िँ समानारे । कहैं कवीर गगन नहि विनसै यौ धागा उन मानारे ॥
कहरा २१-सुनौ सियानी अकथ कहानी पिय अपनेका लेवो रे । जो धन तुमको पियने सौंपा सो धन बाद न पौवो रे ॥ गहि मारै और धरि झिझकारै कैसे सहो कसौटीरे ॥ जो मारौ तो पाउ न टारौ अबै सुरति लौ लाऊरे ॥ घरमै रहौ कै आँगन ठाढी सतसौ नेह न छांडौरे ॥ कागद गुडिया सरग उडानी सुरति डोरि मति डांडौरे ॥ जो कबहुँ छुटि जाइ हाथसौ तो सुख नींद न सोवौरे ॥ एक सतवंती पिय संग गवना रहत पियाके संगारे ॥
शब्दावली
(७२३)
एक सतवंती पिय संग जरई झरत न मोरै अंगा रे॥ पांच पचीस संगके रोवै वह सुख मंगल गावै रे॥ पूरवको सूरज पछिम दिस ऊगे सतिया सत न छाँडे रे॥ बूढी बैस सुहागन सोहै बालम हाथ न आवै रे॥ दास कवीर पढे यह कहिरा महिरम होइ सो पावै रे॥
कहरा विलरी २२-विलरी विलोह तंत मथ हंसा आगे करौ पयाना हो। झंड़ा रोपि गमन कर हंसा पावौ अगम निसाना हो॥ सूरजका द्वार उलटि गहु हंसा चंद लगन गहु बाटा हो। दुइ विलरी दुइ दिसा समनिया निरपै इक घाटा हो॥ इस विधि विलरी सधि चल हंसा सुरति कमलकी जोटा हो। बजर सीला जब उघरै हंसा निकसि जाइ सब षोटा हो॥ मध्य अकार धरमका आसन बाजन बजै अपारा हो। उठै धूम जहां तुरही बाजै नरसिंघा झनकारा हो॥ उठै तरंग जहां नौबत बाजै भांति भांतिके रागा हो। जहां बैठे हैं हंस वरन वरनके अति अनूप सब वागा हो॥ सात सुन्न पर सत्रह बाजा कँगुरा कँगुरा छाजा हो। जिहि सब करी पसारा चीन्ह चलौ हंसा राजा हो॥ आदि पुरुष जहाँ बैठे विदेही जगमग जोति अपारा हो। वामैं यह निज हंस उबारन धरि मन करहु विचारा हो॥ यही सबद तुम निज करि चीन्हौ उत्तरो भौजल पारा हो। कहैं कवीर त्रिवाचा पालौ सांचा सबद अपारा हो॥
कहरा विलरी २३-सब संतन मिलि सुरति विचारी सतसैं प्रीति लगाई हो। अमृत गहिके अमृत सुधारे डुरमति दूर विहाई हो॥ चित्त चौका संतोष बैठका प्रीतिकी पातुरि लावौ हो। ग्यानै गारि छान पट गाढ़े भावको भात बनावौ हो॥ प्रेमकी खांड परोसौ हितकै ततको तंत मथावौ हो। लौकौं लेवौ जुगतकौं जेवो सब संतन मिल पावौ हो॥ मानकी कपटी दीन दही कर जोरो संग छगावौ हो। निहनो नोन पीसकर लावौ तामैं तुरत मिलावौ हो॥