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भारतकोश
कबीरपंथी शब्दावली

कबीरपंथी शब्दावली

Kabirpanthi Shabdavali

स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा

स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)

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पृष्ठ 734

(७२०)

कवीरपंथी-

कहरा १२-जोरा जोर रचा जुग ऊपर संतौ करौ विचारारे॥ एक ओर सुरनर मुनि ठाढे एक अकेली मायारे ॥ पाराखिको पानपटारी सिर ब्रह्मोको झाहीरे ॥ नाथ मछंदर पीठि दै भागे गोरख पैज सम्हारिरे ॥ नारद केरि निशान ठवाये हनमत हांक इकारिरे ॥ ऋषि से वनमें लूटे शंकर नेजा धारीरे ॥ वृन्दावनकी कुंज गलिनमें लूटे कुंज विहारीरे ॥ कहैं कवीर पाषरिया लूटे रइयत कौन विचारिरे ॥

कहरा १३-मन मतवारा नाम रस पीवै गगन मँडल गुन गावैरे । नाम सुधा रस भर भर पीवै सुषुमन सुरति मिलावैरे ॥ ग्यान सुराही भरे कलवरिया छकि २ मोहि छकावैरे । साध संत मिलि पीवन लागै अनहद धुनि मुनि पावैरे ॥ सतगुरु दया बहु कीनी घट घट अलख लखावैरे । दास कवीर कहरा गावै महरा होय सो पावैरे ॥

कहरा १४-चुनरी हमारी पियने सुधारी ओढेगी पिय की प्यारीरे । हूठ पैडकी बनी चुनरियां या चौपाट अपारीरे ॥ बिनहीं ताना बनी है चुनिरिया बहु विधि रूप सम्हारिरे । चांद सूरज दोऊ अबलां लगाये जगमग जोति उज्यारीरे ॥ पांच पचीस वाके पैबंद लागे ओढेगी री ज्ञनवारीरे । कहैं कवीर साधु भल सोई एक नाम व्रत धारीरे ॥

कहरा १५-गगन युफामें पैठि क्यों न देखो जहां पुरुष इक ऐसारे । दिष्ट न सुष्ट न अगम अगोचर जाने जो तैसारे ॥ तामैं हम सोई हम मांही पकरि देहुं क्या भैंसारे । सतगुर सबद परष जब आवै परषन कौं क्या पैसारे ॥ समझे सबद समझ घट आवै वह जैसेका तैसारे । कहैं कवीर सुनो तुम साधो है हम मैं हमहै सारे ॥