कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
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कहरा १६-अबगत नगर बसौं भाई हंसा आवागवन मिटा-ईरे । काल अकाल जंजाल न व्यापै तिहि पुरवतन कराईरे ॥ उदै नहिं अस्त दिवस नहीं रजनी पाप पुत्र नहीं दोईरे । मोक्ष न सुकति जनम नहिं बंधन उपजे मरे न कोईरे ॥ ब्रह्म सहर जहां निर आलम है अलष पुरुष किंछु होईरे । कहैं कवीर अमरपुर वासा इह सुख जाने सोईरे ॥
कहरा १७-जिनके सुभाग भाग बड़ पियासौ सोईं नारि सुहागिनरे । जो तूं पियकी आज्ञा मानै कबहु न होत दुहागिनरे ॥ जो पिय मारे पाऊं न टारे सहई कठिन कसौटीरे । जो पिय मारे गहि झिझकारै पियके चरन पलोटेरे ॥ उलटि घटा अनहद घहरानी बाजत अनहद तूरारे । सरग उडि कागदकी गुडिया सुरत डोर कर पूरारे ॥ जो कबहुं छुटि जाई हाथसौं तो सब होत बिगारारे । उर अन्तर निरबान पुरुष है पुहुष दीप उजियारारे । ताहि लचै कोई संत विवेकी सुषमन सुरति लगावैरे । दास कवीरका निरगुन कहि रामहि रम होई सो पावैरे ॥
कहरा १८-पुरुष पुरातम वसै अपारा ताहीं सै नेह लगावौरे । पुदगल रूप दियो करतानै शील कंकन पहिरावौरे ॥ भाउ भगतका करौ चोलना ग्यान भूत रमावौरे । या घट भीतर ब्रह्म विचारौ खोज अगमका पावौरे । शील संतोष ग्यान धुनि लागी अधिक नेह नहीं छूटेरे । जो कहूं छूटि परै भै माहीं पकरि जम तब लूटेरे ॥ चांद सूरजकी बनी पलकिया चढ़ि चलो देश हमारारे । अमर लोक हंसनका वासा दरसै दूरस अपारारे ॥ अमृत फलका भोजन पावे हुइहै मगन दिवानारे । कहैं कवीर नामको कहिरा बूझे संत सुजानारे ॥
कहरा १९-तेरे तो कारन मेरे मन मोहन ढूँढा देश विदेशारे ।