सामग्री पर जाएँ
भारतकोश
कबीरपंथी शब्दावली

कबीरपंथी शब्दावली

Kabirpanthi Shabdavali

स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा

स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)

Devanagarihipublished968 पृष्ठ

पृष्ठ 736, कुल 968 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 736

(७२२)

कवीरपंथी-

सब फिरि आया कहुँ न पाया किनी तपसी की भेसारे ॥ तीरथ वरत बहु विधि कीना धूप शीत तन गारारे । तेरे कारने मेरे मन मोहन पांचो इंद्री जारारे ॥ सरवन सुनले विषकी बातें अब इम- रत चितधारारे । नाहीं विषकी वास सुहाती अब सत सबद सुवासारे ॥ नैन विषै रस माते फिरते अब निज रूप निहारारे । जिभ्या षट रससे लुभानी अब तो नाम रस पीयारे ॥ पांचो इन्द्री विषै रस मानी लाज कान नहीं कायारे ॥ त्रिपति भई सब पांच पचीसौ घरही बैठे आयारे ॥ गुर गम नाम अमीरस प्याया पियत परमपद पायारे । दास कवीर सुषमना वासी गगन पयाना दीयारे ॥

कहरा २०-धागा टूटा गगन विनसि गया हंसा कहाँ समाई रे । इह अचरज मोहि निसि दिन व्यापै कोई न कहै समझाईरे ॥ धर नाहीं घरन नाहीं धरावन हारा नाहीरे । इंगला पिंगला सुषमन नाहीं यह गुन कहाँ समाहीरे ॥ सबद अतीत रहै संग रमता यह गुन कहाँ समाईरे । टूटी जुरै जुरी फिरि टूटै जब तब होइ विनासारे । तबको साहिब अबको सब कहु काको बिसवासारे । सीषै सुनै कहै कहा होई जो नहि पढ़िँ समानारे । कहैं कवीर गगन नहि विनसै यौ धागा उन मानारे ॥

कहरा २१-सुनौ सियानी अकथ कहानी पिय अपनेका लेवो रे । जो धन तुमको पियने सौंपा सो धन बाद न पौवो रे ॥ गहि मारै और धरि झिझकारै कैसे सहो कसौटीरे ॥ जो मारौ तो पाउ न टारौ अबै सुरति लौ लाऊरे ॥ घरमै रहौ कै आँगन ठाढी सतसौ नेह न छांडौरे ॥ कागद गुडिया सरग उडानी सुरति डोरि मति डांडौरे ॥ जो कबहुँ छुटि जाइ हाथसौ तो सुख नींद न सोवौरे ॥ एक सतवंती पिय संग गवना रहत पियाके संगारे ॥