भारतकोश
कबीरपंथी शब्दावली

कबीरपंथी शब्दावली

Kabirpanthi Shabdavali

स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा

स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)

Devanagarihipublished968 पृष्ठ

पृष्ठ 737, कुल 968 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 737

शब्दावली

(७२३)

एक सतवंती पिय संग जरई झरत न मोरै अंगा रे॥ पांच पचीस संगके रोवै वह सुख मंगल गावै रे॥ पूरवको सूरज पछिम दिस ऊगे सतिया सत न छाँडे रे॥ बूढी बैस सुहागन सोहै बालम हाथ न आवै रे॥ दास कवीर पढे यह कहिरा महिरम होइ सो पावै रे॥

कहरा विलरी २२-विलरी विलोह तंत मथ हंसा आगे करौ पयाना हो। झंड़ा रोपि गमन कर हंसा पावौ अगम निसाना हो॥ सूरजका द्वार उलटि गहु हंसा चंद लगन गहु बाटा हो। दुइ विलरी दुइ दिसा समनिया निरपै इक घाटा हो॥ इस विधि विलरी सधि चल हंसा सुरति कमलकी जोटा हो। बजर सीला जब उघरै हंसा निकसि जाइ सब षोटा हो॥ मध्य अकार धरमका आसन बाजन बजै अपारा हो। उठै धूम जहां तुरही बाजै नरसिंघा झनकारा हो॥ उठै तरंग जहां नौबत बाजै भांति भांतिके रागा हो। जहां बैठे हैं हंस वरन वरनके अति अनूप सब वागा हो॥ सात सुन्न पर सत्रह बाजा कँगुरा कँगुरा छाजा हो। जिहि सब करी पसारा चीन्ह चलौ हंसा राजा हो॥ आदि पुरुष जहाँ बैठे विदेही जगमग जोति अपारा हो। वामैं यह निज हंस उबारन धरि मन करहु विचारा हो॥ यही सबद तुम निज करि चीन्हौ उत्तरो भौजल पारा हो। कहैं कवीर त्रिवाचा पालौ सांचा सबद अपारा हो॥

कहरा विलरी २३-सब संतन मिलि सुरति विचारी सतसैं प्रीति लगाई हो। अमृत गहिके अमृत सुधारे डुरमति दूर विहाई हो॥ चित्त चौका संतोष बैठका प्रीतिकी पातुरि लावौ हो। ग्यानै गारि छान पट गाढ़े भावको भात बनावौ हो॥ प्रेमकी खांड परोसौ हितकै ततको तंत मथावौ हो। लौकौं लेवौ जुगतकौं जेवो सब संतन मिल पावौ हो॥ मानकी कपटी दीन दही कर जोरो संग छगावौ हो। निहनो नोन पीसकर लावौ तामैं तुरत मिलावौ हो॥