भारतकोश
कबीरपंथी शब्दावली

कबीरपंथी शब्दावली

Kabirpanthi Shabdavali

स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा

स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)

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(७२४)

कवीरपंथी—

बिरहको बरा बनाइ जतन सौं पानी पूरन भिजावौं हो । हित करि हेत हिये हिरदेसौं नीको बरा जिमावौं हो ॥ वकनाल सूधा कर बौरी जिन इह बरा बनावौं हो । भाव कर भेटा शील कर सेमी पापर आवा लावो हो ॥ याही तंतसैं हंसा आवै पहुचै लोक हमारो हो । कहैं कवीर सुनो तुम साधो यह निज तंत समारो हो ॥

कहरा २४—अब नहीं तजौ भजौं नहीं कबहुँ जो था सो पहिचानैरे । करी करम भरम गति पाई भरम बिझका फूटा रे ॥ पाप पुत्रतैं रहौ निरंतर करनी संसै छूटा रे । थाके जतन गये छुटि बंधन विधि निषेध परिहरिया रे ॥ उत्तम मध्यम कासौं कहियै तत अखंडित भरिया रे । चंचल अचल चलाचल थाके सुषमनि सुरति समानी रे ॥ कहैं कवीर स्थिर पद दरसे मिटिगइ आवा जानीरे ॥

कहरा २५—ना मैं धर्मी ना मैं अधर्मी ना मैं कामी अकामीरे ॥ ना मैं श्रोता ना मैं वक्ता ना मैं सेवक स्वामीरे ॥ ना मैं गुपता ना मैं सुक्ता ना निरबंधी सरबंधीरे । ना हम काहुते न्यारे रहते ना काहुके संगीरे ॥ ना हम सुरग लोकको जाते ना हम नरक सिधारै रे ॥ सबै करम हमहीने कीने हम करमनतैं न्यारैरे ॥ इह विवेक कोई विरला बूझै जो सतगुरुको भेटैरे । मत कवीर काहुको थापै मत काहुको भेटैरे ॥

कहरा २६—दिष्ट परैसौं मायारे दिष्ट परै सो मायारे ॥ वह तो अचल अलेष एक है दिव्य दिष्टि मैं आयारे ॥ सतगुरु दियो लखाई आपमें है माही सत सोईरे । दूजो किरतम थापि लियौ है मुक्ति कहांते होईरे ॥ काया पराई त्रिगुन ततकी विनसि जाई छिन माहीरे । निरगुन ब्रह्म लखौ घट अंतर जो विनसनमें नाहीरे ॥ ऐसे सदा देहगति सबकी महरम कोई उचारैरे । आपही होइ न्यायी करि न्यारो इहि विधि माया विचारैरे ॥