कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
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कबीरपंथी—
नालकों गहि कर पकरै सुषमन सिखर चढावैरे ॥ घरके घेरि घेरि घरही में उलटि उलटि परचावैरे ॥ अनहद बाजै मधुर धुनि गाजै आपा सब विसरावैरे ॥ परम हंस जहाँ केल करत हैं सत-गुरु सहज लषावैरे ॥ हुइ निहचंत चिंता सब तजिके सब अल-मस्त कहावैरे ॥ कहैं कबीर ज्ञान गुरगमसैं अटल हुआ लौला-वैरे ॥
कहरा ७—अगम अगोचर ऐसारे । मैं कहि बतलाऊँ कैसारे ॥ जो कहिये सो हइयै नाही है सो कहा न जाईरे ॥ सैना बैना कासौ कहिये गूँगेका गुठ भाईरे ॥ दिष्ट न आवै सुष्ट न आवै विनसैं होइ न न्यारारे ॥ ऐसा ग्यान कथौ गुर गरूए पंडित करौ विचारारे ॥ काजी हाथ कितेब न बाँचै पंडित वेद पुरानारे ॥ वह तो अक्षर लिखा न जावै मात्रा लगे न कानारे ॥ कोई धावै निराकारको कोई धावै अकारारे ॥ वह तो सत दोउन तैं न्यारा जाने जाननहारारे ॥ समझा होइ सो सबद विचारै अचरज है अनजानारे ॥ समझ न परै ग्यान मतहीना आवागमन समा-नारे ॥ रागी वाणी पठना गुनना बहु चतुराई भीनारे ॥ उतपत्त परलै कबहुँ न आवै सो सत विरले चीन्हारे ॥ जिन चीन्हा सो लोक समाने अमरलोक निज सूझैरे ॥ कहैं कबीर नामको कहिरा महिरा होइ सो बूझैरे ॥
कहरा ८—ऐसा मंदिल रचा विनानी सो गत विरले जानीरे॥ अष्टधातका किया गिलावा दरज अन्तूठी ठानीरे ॥ दोनों खंभ दसौ दरवाजा चौका सचौक पुरायारे ॥ पाँचो करी पचीसौ की रचना ऐस । महल बनायारे ॥ दस दिगपाल देहके माहीं जिनकी दस दस नारीरे ॥ निस दिन केल करे घट भी इच्छा सकलर विचारीरे ॥ नौके परै निरंतर शोभा तहां सरस इक छाजारे ॥