कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
(७१८)
कबीरपंथी—
नालकों गहि कर पकरै सुषमन सिखर चढावैरे ॥ घरके घेरि घेरि घरही में उलटि उलटि परचावैरे ॥ अनहद बाजै मधुर धुनि गाजै आपा सब विसरावैरे ॥ परम हंस जहाँ केल करत हैं सत-गुरु सहज लषावैरे ॥ हुइ निहचंत चिंता सब तजिके सब अल-मस्त कहावैरे ॥ कहैं कबीर ज्ञान गुरगमसैं अटल हुआ लौला-वैरे ॥
कहरा ७—अगम अगोचर ऐसारे । मैं कहि बतलाऊँ कैसारे ॥ जो कहिये सो हइयै नाही है सो कहा न जाईरे ॥ सैना बैना कासौ कहिये गूँगेका गुठ भाईरे ॥ दिष्ट न आवै सुष्ट न आवै विनसैं होइ न न्यारारे ॥ ऐसा ग्यान कथौ गुर गरूए पंडित करौ विचारारे ॥ काजी हाथ कितेब न बाँचै पंडित वेद पुरानारे ॥ वह तो अक्षर लिखा न जावै मात्रा लगे न कानारे ॥ कोई धावै निराकारको कोई धावै अकारारे ॥ वह तो सत दोउन तैं न्यारा जाने जाननहारारे ॥ समझा होइ सो सबद विचारै अचरज है अनजानारे ॥ समझ न परै ग्यान मतहीना आवागमन समा-नारे ॥ रागी वाणी पठना गुनना बहु चतुराई भीनारे ॥ उतपत्त परलै कबहुँ न आवै सो सत विरले चीन्हारे ॥ जिन चीन्हा सो लोक समाने अमरलोक निज सूझैरे ॥ कहैं कबीर नामको कहिरा महिरा होइ सो बूझैरे ॥
कहरा ८—ऐसा मंदिल रचा विनानी सो गत विरले जानीरे॥ अष्टधातका किया गिलावा दरज अन्तूठी ठानीरे ॥ दोनों खंभ दसौ दरवाजा चौका सचौक पुरायारे ॥ पाँचो करी पचीसौ की रचना ऐस । महल बनायारे ॥ दस दिगपाल देहके माहीं जिनकी दस दस नारीरे ॥ निस दिन केल करे घट भी इच्छा सकलर विचारीरे ॥ नौके परै निरंतर शोभा तहां सरस इक छाजारे ॥
शब्दावली
(७१९)
द्विष्ट मुष्ट तँ अगम अगोचर ऐसा गढका राजारे ॥ कोट गियान सबद तहाँ उचरै सुनौ सत परवानीरे ॥ कहैं कवीर बद्र नहि चीन्है बादकी करावे ग्यानीरे ॥
कहरा ९-संसा मेटि लगे गुरचरनौ सतनाम मुख बोलौरे ॥ या तरवर एक बसे पखेरु आ चुगत जुगन लिये डोलैरे ॥ यह पंछी कोई मोहि बतावे जो घट माहीं बोलैरे ॥ याकी संधि लखै जन कोई कौन ठमहि बोलैरे ॥ आवै संझ उडि जाइ सवेरा गम न काहू देवैरे ॥ दरमत छाँड अनंद घर छावै पंछी बसेरा लेवैरे ॥ दूइ फल चाखि नषर वह आगै और नहि दस दीसारे ॥ कहै कवीर साध कोई जाने सतनामकी आशारे ॥
कहरा १०-सुनो संत इक निरगुन कहरा महरा होय सो बूझैरे ॥ तनसे न्यारा मनहुसे न्यारा देउ द्विष्ट होइ सूझैरे ॥ विन नैनन जहाँ सब कछु दीखै विन सरवन सुनै वानीरे । विना नाशिका वास सुवासा घट रस पावै ग्यानीरे ॥ विना जिभ्या जहाँ अमृत भोजन विन इंद्दी संजोगारे । पांच पचीस जहाँ हैं नाहिंनहीं संजोग बिजोगारे ॥ रूपरेख विन निरगुननामा सत गुरु लखावैरे । कहैं कवीर नामकी महिमा ग्यानी होय सो पावैरे ॥
कहरा ११-वा घरकौ कोई मोहि बतावो जा घरसैं ब्रह्म आयारे ॥ काया छाँडि चले जब हंसा तब ब्रह्म कहाँ समायारे ॥ मैं मेरी ममताके काजैं बारहिबार ठगायारे । समझ न परत ग्यान मति हीना फिरि फिरि भटका खायारे ॥ अब मेरी प्रीति नामसौं लागी उलटि निरंतर धायारे ॥ सहजै सुषुमनि पाउ पलौटे निज धनी अपनायारे ॥ नहीं जहाँ चंद्र नहीं जहाँ सुरा जहाँ जाइ मठ छायारे ॥ कहैं कवीर ग्यान धुनि माहीं सहजै सहज समायारे ॥
(७२०)
कवीरपंथी-
कहरा १२-जोरा जोर रचा जुग ऊपर संतौ करौ विचारारे॥ एक ओर सुरनर मुनि ठाढे एक अकेली मायारे ॥ पाराखिको पानपटारी सिर ब्रह्मोको झाहीरे ॥ नाथ मछंदर पीठि दै भागे गोरख पैज सम्हारिरे ॥ नारद केरि निशान ठवाये हनमत हांक इकारिरे ॥ ऋषि से वनमें लूटे शंकर नेजा धारीरे ॥ वृन्दावनकी कुंज गलिनमें लूटे कुंज विहारीरे ॥ कहैं कवीर पाषरिया लूटे रइयत कौन विचारिरे ॥
कहरा १३-मन मतवारा नाम रस पीवै गगन मँडल गुन गावैरे । नाम सुधा रस भर भर पीवै सुषुमन सुरति मिलावैरे ॥ ग्यान सुराही भरे कलवरिया छकि २ मोहि छकावैरे । साध संत मिलि पीवन लागै अनहद धुनि मुनि पावैरे ॥ सतगुरु दया बहु कीनी घट घट अलख लखावैरे । दास कवीर कहरा गावै महरा होय सो पावैरे ॥
कहरा १४-चुनरी हमारी पियने सुधारी ओढेगी पिय की प्यारीरे । हूठ पैडकी बनी चुनरियां या चौपाट अपारीरे ॥ बिनहीं ताना बनी है चुनिरिया बहु विधि रूप सम्हारिरे । चांद सूरज दोऊ अबलां लगाये जगमग जोति उज्यारीरे ॥ पांच पचीस वाके पैबंद लागे ओढेगी री ज्ञनवारीरे । कहैं कवीर साधु भल सोई एक नाम व्रत धारीरे ॥
कहरा १५-गगन युफामें पैठि क्यों न देखो जहां पुरुष इक ऐसारे । दिष्ट न सुष्ट न अगम अगोचर जाने जो तैसारे ॥ तामैं हम सोई हम मांही पकरि देहुं क्या भैंसारे । सतगुर सबद परष जब आवै परषन कौं क्या पैसारे ॥ समझे सबद समझ घट आवै वह जैसेका तैसारे । कहैं कवीर सुनो तुम साधो है हम मैं हमहै सारे ॥
शब्दावली
(७२१)
कहरा १६-अबगत नगर बसौं भाई हंसा आवागवन मिटा-ईरे । काल अकाल जंजाल न व्यापै तिहि पुरवतन कराईरे ॥ उदै नहिं अस्त दिवस नहीं रजनी पाप पुत्र नहीं दोईरे । मोक्ष न सुकति जनम नहिं बंधन उपजे मरे न कोईरे ॥ ब्रह्म सहर जहां निर आलम है अलष पुरुष किंछु होईरे । कहैं कवीर अमरपुर वासा इह सुख जाने सोईरे ॥
कहरा १७-जिनके सुभाग भाग बड़ पियासौ सोईं नारि सुहागिनरे । जो तूं पियकी आज्ञा मानै कबहु न होत दुहागिनरे ॥ जो पिय मारे पाऊं न टारे सहई कठिन कसौटीरे । जो पिय मारे गहि झिझकारै पियके चरन पलोटेरे ॥ उलटि घटा अनहद घहरानी बाजत अनहद तूरारे । सरग उडि कागदकी गुडिया सुरत डोर कर पूरारे ॥ जो कबहुं छुटि जाई हाथसौं तो सब होत बिगारारे । उर अन्तर निरबान पुरुष है पुहुष दीप उजियारारे । ताहि लचै कोई संत विवेकी सुषमन सुरति लगावैरे । दास कवीरका निरगुन कहि रामहि रम होई सो पावैरे ॥
कहरा १८-पुरुष पुरातम वसै अपारा ताहीं सै नेह लगावौरे । पुदगल रूप दियो करतानै शील कंकन पहिरावौरे ॥ भाउ भगतका करौ चोलना ग्यान भूत रमावौरे । या घट भीतर ब्रह्म विचारौ खोज अगमका पावौरे । शील संतोष ग्यान धुनि लागी अधिक नेह नहीं छूटेरे । जो कहूं छूटि परै भै माहीं पकरि जम तब लूटेरे ॥ चांद सूरजकी बनी पलकिया चढ़ि चलो देश हमारारे । अमर लोक हंसनका वासा दरसै दूरस अपारारे ॥ अमृत फलका भोजन पावे हुइहै मगन दिवानारे । कहैं कवीर नामको कहिरा बूझे संत सुजानारे ॥
कहरा १९-तेरे तो कारन मेरे मन मोहन ढूँढा देश विदेशारे ।
(७२२)
कवीरपंथी-
सब फिरि आया कहुँ न पाया किनी तपसी की भेसारे ॥ तीरथ वरत बहु विधि कीना धूप शीत तन गारारे । तेरे कारने मेरे मन मोहन पांचो इंद्री जारारे ॥ सरवन सुनले विषकी बातें अब इम- रत चितधारारे । नाहीं विषकी वास सुहाती अब सत सबद सुवासारे ॥ नैन विषै रस माते फिरते अब निज रूप निहारारे । जिभ्या षट रससे लुभानी अब तो नाम रस पीयारे ॥ पांचो इन्द्री विषै रस मानी लाज कान नहीं कायारे ॥ त्रिपति भई सब पांच पचीसौ घरही बैठे आयारे ॥ गुर गम नाम अमीरस प्याया पियत परमपद पायारे । दास कवीर सुषमना वासी गगन पयाना दीयारे ॥
कहरा २०-धागा टूटा गगन विनसि गया हंसा कहाँ समाई रे । इह अचरज मोहि निसि दिन व्यापै कोई न कहै समझाईरे ॥ धर नाहीं घरन नाहीं धरावन हारा नाहीरे । इंगला पिंगला सुषमन नाहीं यह गुन कहाँ समाहीरे ॥ सबद अतीत रहै संग रमता यह गुन कहाँ समाईरे । टूटी जुरै जुरी फिरि टूटै जब तब होइ विनासारे । तबको साहिब अबको सब कहु काको बिसवासारे । सीषै सुनै कहै कहा होई जो नहि पढ़िँ समानारे । कहैं कवीर गगन नहि विनसै यौ धागा उन मानारे ॥
कहरा २१-सुनौ सियानी अकथ कहानी पिय अपनेका लेवो रे । जो धन तुमको पियने सौंपा सो धन बाद न पौवो रे ॥ गहि मारै और धरि झिझकारै कैसे सहो कसौटीरे ॥ जो मारौ तो पाउ न टारौ अबै सुरति लौ लाऊरे ॥ घरमै रहौ कै आँगन ठाढी सतसौ नेह न छांडौरे ॥ कागद गुडिया सरग उडानी सुरति डोरि मति डांडौरे ॥ जो कबहुँ छुटि जाइ हाथसौ तो सुख नींद न सोवौरे ॥ एक सतवंती पिय संग गवना रहत पियाके संगारे ॥
शब्दावली
(७२३)
एक सतवंती पिय संग जरई झरत न मोरै अंगा रे॥ पांच पचीस संगके रोवै वह सुख मंगल गावै रे॥ पूरवको सूरज पछिम दिस ऊगे सतिया सत न छाँडे रे॥ बूढी बैस सुहागन सोहै बालम हाथ न आवै रे॥ दास कवीर पढे यह कहिरा महिरम होइ सो पावै रे॥
कहरा विलरी २२-विलरी विलोह तंत मथ हंसा आगे करौ पयाना हो। झंड़ा रोपि गमन कर हंसा पावौ अगम निसाना हो॥ सूरजका द्वार उलटि गहु हंसा चंद लगन गहु बाटा हो। दुइ विलरी दुइ दिसा समनिया निरपै इक घाटा हो॥ इस विधि विलरी सधि चल हंसा सुरति कमलकी जोटा हो। बजर सीला जब उघरै हंसा निकसि जाइ सब षोटा हो॥ मध्य अकार धरमका आसन बाजन बजै अपारा हो। उठै धूम जहां तुरही बाजै नरसिंघा झनकारा हो॥ उठै तरंग जहां नौबत बाजै भांति भांतिके रागा हो। जहां बैठे हैं हंस वरन वरनके अति अनूप सब वागा हो॥ सात सुन्न पर सत्रह बाजा कँगुरा कँगुरा छाजा हो। जिहि सब करी पसारा चीन्ह चलौ हंसा राजा हो॥ आदि पुरुष जहाँ बैठे विदेही जगमग जोति अपारा हो। वामैं यह निज हंस उबारन धरि मन करहु विचारा हो॥ यही सबद तुम निज करि चीन्हौ उत्तरो भौजल पारा हो। कहैं कवीर त्रिवाचा पालौ सांचा सबद अपारा हो॥
कहरा विलरी २३-सब संतन मिलि सुरति विचारी सतसैं प्रीति लगाई हो। अमृत गहिके अमृत सुधारे डुरमति दूर विहाई हो॥ चित्त चौका संतोष बैठका प्रीतिकी पातुरि लावौ हो। ग्यानै गारि छान पट गाढ़े भावको भात बनावौ हो॥ प्रेमकी खांड परोसौ हितकै ततको तंत मथावौ हो। लौकौं लेवौ जुगतकौं जेवो सब संतन मिल पावौ हो॥ मानकी कपटी दीन दही कर जोरो संग छगावौ हो। निहनो नोन पीसकर लावौ तामैं तुरत मिलावौ हो॥
(७२४)
कवीरपंथी—
बिरहको बरा बनाइ जतन सौं पानी पूरन भिजावौं हो । हित करि हेत हिये हिरदेसौं नीको बरा जिमावौं हो ॥ वकनाल सूधा कर बौरी जिन इह बरा बनावौं हो । भाव कर भेटा शील कर सेमी पापर आवा लावो हो ॥ याही तंतसैं हंसा आवै पहुचै लोक हमारो हो । कहैं कवीर सुनो तुम साधो यह निज तंत समारो हो ॥
कहरा २४—अब नहीं तजौ भजौं नहीं कबहुँ जो था सो पहिचानैरे । करी करम भरम गति पाई भरम बिझका फूटा रे ॥ पाप पुत्रतैं रहौ निरंतर करनी संसै छूटा रे । थाके जतन गये छुटि बंधन विधि निषेध परिहरिया रे ॥ उत्तम मध्यम कासौं कहियै तत अखंडित भरिया रे । चंचल अचल चलाचल थाके सुषमनि सुरति समानी रे ॥ कहैं कवीर स्थिर पद दरसे मिटिगइ आवा जानीरे ॥
कहरा २५—ना मैं धर्मी ना मैं अधर्मी ना मैं कामी अकामीरे ॥ ना मैं श्रोता ना मैं वक्ता ना मैं सेवक स्वामीरे ॥ ना मैं गुपता ना मैं सुक्ता ना निरबंधी सरबंधीरे । ना हम काहुते न्यारे रहते ना काहुके संगीरे ॥ ना हम सुरग लोकको जाते ना हम नरक सिधारै रे ॥ सबै करम हमहीने कीने हम करमनतैं न्यारैरे ॥ इह विवेक कोई विरला बूझै जो सतगुरुको भेटैरे । मत कवीर काहुको थापै मत काहुको भेटैरे ॥
कहरा २६—दिष्ट परैसौं मायारे दिष्ट परै सो मायारे ॥ वह तो अचल अलेष एक है दिव्य दिष्टि मैं आयारे ॥ सतगुरु दियो लखाई आपमें है माही सत सोईरे । दूजो किरतम थापि लियौ है मुक्ति कहांते होईरे ॥ काया पराई त्रिगुन ततकी विनसि जाई छिन माहीरे । निरगुन ब्रह्म लखौ घट अंतर जो विनसनमें नाहीरे ॥ ऐसे सदा देहगति सबकी महरम कोई उचारैरे । आपही होइ न्यायी करि न्यारो इहि विधि माया विचारैरे ॥
शब्दावली
(७२५)
सहजै रहै समाइ सब रूपैना कहूं जाइ न आवैरे । धरे न ध्यान करे नहिं जप तप राम रहौम न गावैरे ॥ तीरथ वरत दोऊ फल त्यागे सुन्न दौरि नहीं धावैरे । यह संसै जब समझ परैगी पूजै काहि पूजावैरे ॥ जोग जुगतिसौं करम न छूटे जो पै आपा आपन सूझैरे ॥ कहैं कवीर ते जन गहये जे कोई समझै बूझैरे ॥
कहरा २७-मनषा जनम सुधारौ संतो धोखै कहा विगावोरे ॥ गुड गुडीका ख्याल छांडि देहु आतम तत लौ लावैरे । जब लग घटमें परचै नाहीं तब लग कछु न पावैरे ॥ नेम वरत और जप तप संजम यह करनी मति भूलौरे ॥ करम फन्द जुग जुग गल पहिरे फिरि फिरि जोनी झूलौरे ॥ ना कुछ नहाये ना कुछ धोये ना कछु घंट बजायैरे । ना कुछ नेती ना कुछ धोती ना कछु नाचे गायैरे ॥ से लीन सिंगी जटुआ न बटुआ आप स्वांग से न्यारारे । कहैं कवीर मुक्ति तब पावौ गहौ जु सबद हमारारे ॥
कहरा २८-वंझा एक सुपनमें सूती पूत जना अति लोनारे ॥ बहुतक दान दिये विपरनकौं बहु रूपा बहु सोनारे ॥ फिरि सुपनेमें सुपना देखा व्याहि पूत घर आनारे । आवत ही मरिगया पूत हूआ रोवन पीटन ठारीरे ॥ यह संसार सुपनसम देखा कहैं कवीर विचारीरे ॥
कहरा २९-अरे मन महरा करहु सिताबी बिलम किये भल नाहीरे । एक नवरिया पांच खिवटिया घरमराइको साहीपीरे ॥ पहिली धारा वेद कितेबा हिंदू तुरुक मिलि धाईरे । दूजी धारा काम किरोधा ओहीमें बहि जाईरे ॥ तीसरी धारा कर्मकी फांसी जाइ लगा संसारा रे । चौथी धारा नौ औतारा राम किसन गुनवारारे ॥ पचवीं धारा जोतिसरूपा हिंदू तुरुक मिलि धायारे ॥
(७२६)
कवीरपंथी—
घटवरिया मोहि जान न देसी घाटहीमें लेख चुकायारे ॥ कहैं कवीर मेरा साथ विवेकीषी धारासे रहा हुइ न्यारारे ॥
कहरा ३०—वा घरकी कोइ मोहि बतावौ जा घरसैं ब्रह्म आया रे ॥ काया छाँडि चले तब हंसा तब ब्रह्म कहाँ समायारे ॥ ब्रह्मा विष्णु महेश न होते आदि न होती मायारे । रज वीरज दोनों नहीं होते तब ब्रह्म कहाँ रहायारे ॥ पवन पानी मिलि दही जमाया अग्निका जामन दीयारे । चंद सूरज दोनों करत षवासी घोर मथन घृत कीयारे ॥ मैं मेरी ममताके कारन बारहौं बार ठगायारे । अजहुँ समझि ग्यान मति हीना फिरि फिरि भटका खायारे ॥ सुरति सुहागिन चरन पलौटे धनी आपना पायारे ॥ जिनकी सुरति लगी सत सबदे उलटि निरंतर धायारे ॥ चांदौ सूरज दिवस नहीं रजनी जहाँ सुरति लौलायारे ॥ कहैं कवीर ग्यान धुनि उपजी सहजै सबद समायारे ॥
कहरा ३१—आपही आप इच्छना धारी इच्छा बेल पसारिरे ॥ आप अपारु इच्छा धारु बहु विधि रूप सम्हारीरे ॥ इच्छा माँहि बीज विस्तारा मूल पत्र ओ डालीरे । पेड और डाल फूल फल सबही वा माहीं है सारीरे ॥ चौंसठ चौक पूर जब करकै ले आपुन आप माहीरे । कहैं कवीर यह एकम एका और दूसरा नाहीरे ॥
कहरा ३२—अविगत अगम अपार अशेषा रूप वरन नहीं भेषारे दिष्ट न सुष्ट लषा नहीं जाई न काहुन पेषारे ॥ वाकी महिमा कहाँलौ वरनौ मो पै वरनि न जाईरे ॥ ऐसा अलष लषै नहिं कोई ना काहु दिया दिखाईरे ॥ अपरमपार अपार अखंडा घटमें रहा समाईरे ॥ जिन कछु खोज पिंडका कीया सेनहि सेन बताईरे ॥ ब्रह्मंड नौ षडपिंड माँहि पूरि रहा गुर पूराये ॥ कहैं कवीर गगन धुनि माहीं बाजत अनहद तुरारे ॥
शब्दावली
(७२७)
कहरा ३३-तन धरि सुषिया कोई न देखा जो देखा सो दुखियारे ॥ ऊगन आथनकी बात कहत हौ सबका किया विवे- षारे ॥ ब्रह्मा विष्णु महादेव दुखिया जिन यह राह चलाईरे ॥ सुखदेव आचारी दुखके कारन गरभहि माहि छपाईरे ॥ राजा दुषिया रानी दुषिया एक दुषी धनहीनारे ॥ जोगि दुखी और जंगम दुखिया कपटीको दुख दूनारे ॥ आशा तूष्णा सब घट व्यापै कोइ महल नहीं सूनारे ॥ घाट वाट तो सब जग दुखिया क्या गेही पटगीतारे ॥ कहे कवीर यह सब जग दुखिया कोई संत सुखी मन जीतारे ॥
कहरा ३४-सतगुरु आइ करी निज दाया अब हम आया चीन्हारे ॥ निज बुध रूप पिरापत नितही अचरज सहीछु कीन्हारे ॥ ना हम मनुष देवता नाहीं ना गेही वन पंड़ीरे ॥ ब्राह्मन छत्री वेसहू नाहीं ना हम सूदर डंडीरे ॥ ना हम जोगी ना हस जंगम ना हम तपी सन्यासी रे ॥ ना वैरागी ना ब्रह्मचारी ना हम जपी उदासीरे ॥ ना हम ज्ञानी चतुर न मूरख ना पंडित न पोथीरे ॥ ना हम शायर ना मरजीवा ना हम सीप न मोतीरे ॥ ना हम गगन सुन्न भी नाहीं ना हम तेज न पानीरे ॥ मन बुधि चित अहंकार भी नाहीं ना हम वेद न वानीरे ॥ ना हम अमर मरै नहिं कबहुँ हम कवीर ज्योंका त्योंहीरे ॥ व्यास कपिल और वामदेव ऋषि सबकी अनुभव यौहीरे ॥
कहरा ३५-ग्यान विचारन ग्यान विचारन ग्यान विचारन जोगीरे ॥ रहै उदास सबसे सबहुनमें सुषमनि सुरति संजोगीरे ॥ जैसे कमल रहै जल भीतर जलसे रहत निनारारे ॥ ऐसे साधु रहै जगमाहीं परम तत्व निखारारे ॥ जैसे धाइ बालको पोषै अपनो जानत नाहीरे । करम करै करता न कहावै यौ साधु जग
(७२८)
कबीरपंथी—
माँहोरे ॥ उदैं भयो तिमर सब खोया अंधकार सब नासारे । कहैं कबीर विचार अभै पद निहतत निजवासारे ॥
कहरा ३६—हम तो भरम विसारि डारिकै एक एक करि जानारे । दूजा कहै गहीकै दूजा जिन नाही पहिचानारे ॥ एकै पवन पावक औ पानी और पानी एकै जुत संसारारे ॥ एक खाख गढे बहु भांडे एकै सिरजन हारारे ॥ जैसा बढई काठे काटै अगिनि न काटै कोईरे ॥ ऐसे व्यापि रह्यो अभिअंतर धरैं सरूपा सोईरे ॥ माया मोहकरि जगत भुलाना अर्थ देखि पतियाना रे ॥ होइ निरशंक कछू नहीं व्यापै कहैं कबीर गियानारे ॥
गौरी प्रारम्भ ।
गौरी १—संतो मन चीन्हो रे भाई । मन चिन्है विना परलैतर जैहौ जीवको जमले जाई ॥ टे० ॥ मन चिन्है ते हंस हमारा । तजे खलककी आस ॥ छूटै पिंड काल नहि पावै । पावै मुक्ति निवास ॥ मूल लेखामैं जीव जो आवै । दुविधा दूर बहाइ ॥ पुरुष नामको सुमिरन करिकै । अगर डोरि चढ़ि जाइ ॥ निशि दिन सुरति करै साहिबसों । सबद हेत लिय बोले ॥ कहैं कबीर सुनो भाई संतो । सो जीव कबहुँ न डोले ॥
गौरी २—जा दिन मन पंछी उड़ि जैहै । तेरो नाम न कोईलैहै ॥ ॥टेका॥ सूखै ताल नीरकै निबडै सूखै कमल कुंमलैहै ॥ सूखै पुरइन सरकी शोभा । जित तित धूर उडैहै ॥ जब लग तेल दीप में बाती । दिष्ट पडे सब कोई ॥ निपटै तेल बीत गइ बाती । जग अंधियारा होई ॥ जा प्रीतमसो प्रीति करत हैं । ताहीको अंग डरिहै ॥ दूर करो मंदिरसों बाहिर । प्रेत भया धरिखैहै ॥
शब्दावली
(७२९)
दिन दोय चार नाम भजि लेहू । काल अचानक खेहै ॥ कहैं कवीर जगतका वासी । निकस पयाना देहै ॥
गौरी ३-मन रे जागत रहिये भाई । गाफल होय वस्तु मत खोवै ॥ चोर सुसे घर जाई ॥ टे० ॥ षड् चक्रकी कनक कोठरी वस्तु भाव है सोई ॥ ताला कुंजी कुलफ कर लागे उघड़त बार न होई ॥ पांच पहरवा सोय गया है वस्ती जगवा जागी ॥ जरा मरन व्यापै कछु नाहिं गगन मंडल लव लागी ॥ कर विचार मन ही मन उपजी ना कहूँ गया न आया ॥ कहै कवीर संशय जब छूटे नाम रतन धन पाया ॥
गौरी ४-डग मग छाड़ि दें मन बौरा ॥ अबतो जै बिन आवै लीन्हो हाथ सिधौरा ॥ टे० ॥ पहिर जंजीर पैठि रन भीतर जूझ मरे नहीं भागे ॥ जन्म मरनकी आशा छोड़ै सो पग धारे आगे ॥ होय निःशंक मग्न होय नाचो लोभ मोह भरम छाड़ो ॥ सूर कहाँ मरन सो डरपै सती न सांचौ मांडौ ॥ अग्नि जै सो सती न कहावे जूझ मरे नहीं सूर ॥ ब्रह्म अग्निमें यह तन होमैं सो पद पावे पूरा ॥ लोक लाज कुलकी मरजादा येही गलेमें फांसी ॥ आगे होय पग पीछे धरि हैं होय जगतमें हांसी ॥ ये संसार सकल जग मैला नाम भजे ते सूचा ॥ कहैं कवीर हरि भक्ति न छांडो गिरत परत चढ़ि उंचा ॥
गौरी ५-नट होय नाच रे मन मेरा जो रीझै साहिब तेरा ॥ टेक ॥ ज्ञानको ढोल बजाय रैन दिन शब्द सुने सब कोई ॥ राह केत गह जब कोपै जम घर बंधन होई ॥ द्वादश तिलक बनाये बांस चढ़ि जग तजि होय रहो न्यारा ॥ सहस्र कला होय नाचे मन मोरा रीझैगा साहेब प्यारा ॥ जो रीझै जगदीश जगतगुरु देगा दान बुलाई ॥ भरी सभामें चोला बकसे फाटि कबू नहिं
(७३०)
कवीरपंथी—
जाई ॥ जो तू कूदि जाये भवसागर कला बता दूँगा तेरी ॥ कहैं कवीर सत ब्रत साधो, नव निधि होय रहै चेरी ॥
गौरी ६—जगमें काहु न मन वश कीन्ह। भारत खंडमें भरतसे ग्यानी भ्रुग सुत मन हर लीन्ह। ॥ टे० ॥ भृंगी ऋषि सो वनमें रहते, विषय विकार न जाने ॥ पठई नारि भूप दसरथने, पकड़ि अजोध्या आने ॥ सूखे पत्र पवन भस्त्रि रहते पाराशरसे ज्ञानी ॥ भरमें रूप देखिकै गनिकाको काम कंदला वानी ॥ जमदग्निकी नारि रेनुका, गयी यमुना जल लेने ॥ भरमि देखि भूपको मन्दिर, थकित भये दो नेने ॥ सोई सुरपति जाके नारी सुचीसी, निश दिनही संग राखी ॥ गौतम घर काम निहोर वसि, निगम कहत है साखी ॥ पार्वतीसी पत्नी जाके, ताके मन क्यों डोले ॥ खलित भये छबि देखि मोहिनी, हाहा कह कह बोले ॥ येक ही नाल कमल हित ब्रह्मा, जग उपराज कहावैं ॥ कहैं कवीर एक मन जीते विना, जीव विसराम न पावे ॥
गौरी ७—मनसा बिन दौड़े न रहैरे । जो मैं राखों जग जुगति सो, छिन छिन मोहि दहैरे ॥ टे० ॥ यह गयंद पांचों मद माते, आँकुशको न सहैरे ॥ नाम सुने रंग राते नाही, विषकी वेल गहैरे ॥ समझत नाहि मूठ मारगको, उबट राह बहैरे ॥ अरध मास भादोंकी नदिया, वे मरजाद बहैरे ॥ सीखे सुने गावे बहु तेरे, कोई यक राह न रहैरे ॥ कहैं कवीर यह भगत दुहेली, विरला जन निबहैरे ॥
गौरी ८—मन तू थकत थकत थकि जाइ । विन थाके तेरा काज ना सरिहै, फिर पाछे पछिताई ॥ टे० ॥ जब लग तू सरजीव रहत है, तब लग परदा भाई ॥ टूटि जाये ओट तिनकाकी, जो मन शिखर दह जाई ॥ सकल तेज तजि होय नपुंसक, या मति
शब्दावली
(७३१)
सुनि तू मेरी ॥ जीवन मृतक दशा विचारे, पावे वस्तु घनेरी ॥ याके परै और कछु नाहिं, यह मत सबसँ पूरा ॥ कहै कवीर मारि मन मैंगल, होय रहै जस धूरा ॥
गौरी ९-मन तू चेतन होरे भाई। जाते काल फांस मिटिजाई ॥ टे० ॥ घटमें सिन्धु सिन्धुमें जल है। तामें कमल विराजे ॥ तामें जोति प्रगट परमेश्वर। सिखर घरावर बाजै ॥ रवि शशि और सकल तारायन। गंगा जमुना दो धारा ॥ तामें जोति करे पावककी। त्रिभुवन भया उजियारा ॥ सात अरु पांच चतुर्दश तामें और बहतर थाना। ज्ञानी गुनी जानि जिव अपना। घटमें सिंधु समाना ॥ तैंतीस तीन चार ताहि खोजै। शंकर पार न पावै ॥ कहैं कवीर बलि बलि सतगुरुकी। घटही माहिं लखावै ॥
गौरी १०-मन तू पार उतारि कहाँ जैहै। आगे पंथी पंथ न कोई, कुछ सुकाम न पैहै ॥ टेक ॥ नहिं तहाँ नीर नाव नहीं खेवट, ना गुन खैचनहारा ॥ धरनि गगन कल्प कछु नाहिं, ना कछु वार न पारा ॥ नहिं तन नहिं मन नहिं अपनपौ, सुन्यमें सुधि न पैहै ॥ विलैमान होय जाय फूटि घट, याहू ठौर विन होयहो ॥ बार बार विचार देखि मन, अन्त कहूँ नहिं जैहो ॥ कहैं कवीर सब छौड़ि कल्पना, ज्योंका त्यों ठहरैहो ॥
गौरी ११-या मनको खोजोरै भाई। तन छूटे मन कहाँ समाई ॥ टे० ॥ शिव विरंचि नारद सुनि ज्ञानी। मनकी गति उन्हुँ नहिं जानी ॥ ध्रुव प्रहलाद विभीषण शेषा। तन भीतर मन उन्हुँ न देशा ॥ सनक सनंदन जय देव नामा। भक्ति करि मन उन्हु न जाना ॥ या मनका कोइ लहै न भेव। रंचक लीन भया मुखदेव ॥ गोरख भरथरी गोपीचंदा। या मनसौ मिलि करै अनंदा ॥ एकलि निरञ्जन सकल शरीरा। या मनसौ मिलि रहा कवीरा ॥
(७३२)
कवीरपंथी—
गौरी १२—है कोई भूला मन समझावे । यह मन चंचल चोर पाहरू छूटा हाथ न आवे ॥ ८० ॥ जोड़ि जोड़ि धन औदे गादे, जहां कोई लेन न पावे ॥ कंठ कपोल आनि जम घेरै, दे दे सैन बतावे ॥ खोटा दाम गांठि लिय डोलै, बडी बडी वस्तु मुलावे ॥ बोवै बबूल दाख फल चाहै, सो फल कैसे पावे ॥ गुरूकी दया साधुकी संगति, ये दोउ मति विसरावे ॥ कहैं कवीर सुनो भाई साधो, बहुरि न भौजल आवे ॥
गौरी १३—मन तू क्यों भूला रे भाई, तेरी सुधि बुधि कहाँ हेराई ॥ ८० ॥ जैसे पंछी रैन वसेरा, बसे वृच्छ में आई ॥ भोर भये सब आप आपको, जहां तहां उठि जाई ॥ सुमामें तोहि राज मिल्यो तहाँ है, हाकिम डुकुम दुहाई ॥ जागि पञ्चो जब लावन लसकर, पलक खुले सुधि आई ॥ मात पिता सुत बंधु तिरिया, नाती सगो सगाई ॥ यह तो सब स्वारथके संगी, झूठी लोक बढाई ॥ सागर माहिं लहरि उठत है, गिनती गिनी न जाई ॥ कहैं कवीर सुनो भाई साधो, दरिया लहरि समाई ॥
गौरी १४—मनुवा नाहिं मानत मोरा । बार बार मैं कह समझायो, जगमें जीवन थोडा ॥ ८० ॥ या कायाका गर्व न कीजे क्या श्यामल क्या गोरा ॥ भजन विना तन काम न आवे, कोटि सुगन्ध चहोरा ॥ या माया जनि देखत भूलो, क्या हस्ती क्या घोडा ॥ जोड़ि जोड़ि धन बहुत विश्वचै, कोटिक लाख करोड़ा ॥ उवध्या उरमति और चतुराई, जन्म गमायो बौरा ॥ लेत उपाय गिरत भव परियो, जैसे बालक भौरा ॥ अजहुं आय करो सत्संगति, हरि भजि मानि निहोरा ॥ कहैं कवीर मन चितराखो, ज्यों रे सुई बिच डोरा ॥
शब्दावली
(७३३)
गौरी १५—मन तू मानत क्यों न मना रे । कौन कहनको कौन सुननको, दूजा कौन जनारे ॥ टे० ॥ दर्पनमें प्रतिबिंब जु भासे, आप चहुँ दिशि सोई । धोखा मेटि एक जब होवे, जो लखि पावे कोई ॥ जैसे जलते हेम बंधत है, हेम धूम जल सोई ॥ तैसे या तत वा तत सो, फेरि यह अरु वह सोई ॥ जे समझे ते खरी कठिन है, ना समझे तो खोटी ॥ कहैं कवीर दो उपाधि त्यागे, ताकी मति है मोटी ॥
गौरी १६—साधो भाई आत्म सत प्रगासा । ज्यों सूरजमें नहीं अंधेरी, ऐसे सत्य उजासा ॥ टेक ॥ ज्ञान स्वरूप महा अति सूच्छम, करन कहै विज्ञाना ॥ अंधाको सूरज नहीं सुझे, भूल्यो सकल जहाना ॥ बदलीमें सूरज जिमि छिप जाई, माया ब्रह्मलुकाना ॥ ऐसे आत्म सत प्रकाशा विरले साधू जाना ॥ आपहिँ एक अनंत पुनि आपही, नरक स्वर्ग तहां नाही ॥ कौन तरे कौन काको तारे, भूलि रह्यो बाहिर माही ॥ करता काल कर्म नहीं माया, आपही है सब जागा ॥ जन्म मरण नाहिं कछु धोखा, आप चीन्ह अम भागा ॥ विन चीन्है कौनसो कहिये, दुतिया होये बताऊँ ॥ जाकी वस्तु गई सो ढूँढे, गई नहीं क्या पाऊँ ॥ आदि अनादि पार के पारा, वार पार सब एका ॥ कहैं कवीर बूझिये भाई, साधू करै विवेका ॥
गौरी १७—जब ते आत्म तत्त्व विचारा । तब निवैर भया सबहीते, काम कोध गहि डारा ॥ टेक ॥ सबमें आपमें आपमें सबहीं, आप आपमें मेला । नाना भांति घड़े बहु भांजन, रूप धरे धरि खेला ॥ पूरन ब्रह्मा सकल घट कहिये, को पंडित को जोगी । राजा रंक कौनसों कहिये, कौन वैद कौन रोगी ॥ चारहुँ दिशा
(७३४)
कवीरपंथी—
हूँटि हम आये, निरगुन कोइ न बतावे । कहैं कवीर कोई दास निज निर्गुनी, और सब लीला गावे ॥
गौरी १८—आपन पौ आपनहींमें पायो । शब्दही शब्द भयो उजियारा, सतगुरु भेद बतायो ॥ टे० ॥ जैसे सुंदरी सुत लै सुती, स्वप्ने गयो हेराय ॥ जाग परी पलंगपै पायो, ना कहूँ गयो ना आय ॥ जैसे कुँवरि कंठ मनि हीरा, आभूषण विसरायो ॥ संगकी सखी मिलि भेद बतायो, जिवको भरम मिटायो ॥ जैसे मृग नाभि कस्तूरी, हूँदत बन बन धायो । नासा स्वाद भयो जब वाके, उलटि निरंतर आयो ॥ कहा कहूँ वा सुखकी महिमा, ज्यों गुंऐ गुड खायो । कहै कवीर सुनो भाई साधो, ज्योंका त्यों ठहरायो ॥
गौरी १९—राम विना कहु नाहिं साधो, राम विना कहु नाहिं ॥ रामहिं आगे रामहि पीछे, रामहिं बोले माहिं ॥ टे० ॥ उत्तर राम दक्षिण राम, पूर्व राम पश्चिम रामा ॥ स्वर्ग पताल महीतल रामा, राम सकल विसरामा ॥ ऊठत राम बैठत राम, जागत सोवत रामा ॥ राम विना कहु और न दरसे, सकल राम के कामा ॥ सब चराचर सम्पूर्ण रामा, निरखो शब्द सनेहि ॥ कायम सदा कदेहूँ नहि विनासै, बोलन हारा एहि ॥ एक रामको भजे निरंतर, येक राम मिलि गावे ॥ कहैं कवीर रामके परसे, आपा ठौर न पावे ॥
गौरी २०—आये राम भतारा, हम घर आये राम भतारा । ढुलहिन गावो मंगल चारा ॥ टे० ॥ तन रति करहु मन रति करिहु पांचों तत्त्व बराती । राम हमारे पाहुन आये हम जोबन मद माती ॥ शरीर सरोवर वेदी रचिहूँ ब्रह्मा वेद उचारा । राम देव संग भावर फिरहु धनि बड़ भाग हमारा ॥ सुर तैंतीसों
शब्दावली
(७३५)
कौतुक आये मुनि जन कोटि अठासी । कहै कवीर हम व्याह चले हैं पुरुष एक अविनाशी ॥
गौरी २१-आनन्दके घर पायो, अब हम आनंद घर पायो । जबते दया भई सतगुरुकी, अभय निशान बजायो ॥ टेक ॥ काम क्रोधकी गागरि फूटी, ममता मोह बहायो ॥ तजि प्रपंच विविध बिधि किया, चरन कमल चित लायो ॥ प्रेम प्रीति किया तन गुदडी, सुरतिको टोप बनायो ॥ हृद घर छाडि वेहद घर आसन, गगन मंडल मठ छायो ॥ चंद न सूर दिवस नहीं रजनी, जहां जाय लाड-लड़ालाहायो ॥ कहै कवीर कोइ पियाकी प्यारी, पिया पिया रट लायो ॥
गौरी २२-बात लगे मोहि नीकी प्यारी, तेरी बात लगे मो नीकी । जो कोई कोटि भांति सखुझावे, सबही लगे मोहि फीकी ॥ टेक ॥ जलको मीन पलंग ले राख्यो, ले अमृत जल सींची । तलफ तलफ तजत पलंगपै, सुधि बुधि विसरचो जिवकी ॥ स्वातीको स्वाद पपीहा जाने, को जाने वाके जिवकी ॥ पियाको मरम सोइ भल जाने, जाके चोट विरहकी ॥ हीराकी परख जौहरी जाने, चोट सहे सिर घनकी ॥ कहैं कवीर जहैं प्रेम वसतु है, छिपी न रहै वा जनकी ॥
गौरी २३-संतो बोलनहारा राम रजा । पिंड ब्रह्मांड रहे भर पूरा, आप अकेला बांधि धजा ॥ टेक ॥ जैसे बुंद परी जल माही, जलहीते बुद बुद उपजा ॥ मिट गया बुद बुद जलही समाना, होय गया एक सरूप सजा ॥ कोटिक कुम्भ भरे जल झलके, तामैं दीसे चंद सजा ॥ विनशे कुम्भ चंद नहीं विनशे, शब्द स्वरूपी अमर अजा ॥ जामैं हम सोई हम माहीं, मैं ते ते मैं
(७३६)
कवीरपंथी—
गगन गजा ॥ कहैं कवीर कछु संशय नाहिं, तत्त्व लखा जब भ्रम भजा ॥
गौरी २४-संतो भाई हरिसा हीरा लाधा, देखत ही मन मगन भयो है, गिन गिन गांठी बांधा ॥ टेक ॥ पल पल परखों छिन छिन निरखों, राखूं छानै छानै ॥ भेद काहुपै मानू नाहिं, परचो रंककै पानै ॥ तोल न मोल अमोलक कहिये, फोरेहु नहिं फूटे ॥ कहैं कवीर यह खुल गइ गठरी, खोले नहिं खूटे ॥
गौरी २५-जप जप अजपा जाप भला । सुरति न विसहं एक पला ॥ टे० ॥ येही राह वहै सतगुरुकी, पंछी मारग मीन चला ॥ हंसा मारग सोध चले हैं, जा खोजत जम मान दला ॥ सतलोक सतगुरुका आसन, सुरति निरतिकी बांधि कला ॥ अगम डोरि नगरीके निरंतर, मकर तार तहां सोधि चला ॥ भया मुचेत सुरति लव लागी, कहैं कवीर जब होय भला ॥ सतगुरु शब्द विलोय कह्यो है, मन छाडै जब नाम मिला ॥
गौरी २६-साधो भाई नाम ध्वजा फहराई । लोक वेदकी चाल मिटाई, सो निज देखो आई ॥ टे० ॥ कहा पढै पंडित वेद पुराना, भेद न हिरदे समाई ॥ खसम छोड़ि भयी बिबचारिनी, बातें करत बनाई ॥ वेद पढै पुनि भेद न पावे, फिर फिर भटका खाई ॥ कोइ कोइ संत विवेकी विरला, रहै राम लव लाई ॥ नाम प्रताप सदा सिर ऊपर, दर्शन पाय नसाई ॥ जाको काल सदा सिर नावे, दूरि दूरि होय जाई ॥ कहूँ कहा कछु कहत न आवै, सब घट रह्यो समाई ॥ नाम प्रतीति भई जाजनको कहैं कवीर समझाई ॥
गौरी २७-गुनका भेद न्यारा न्यारा, जानगो जानन हारा ॥ टे० ॥ सोई राज राजकुल मंडन, जाके मस्तक मोती ॥ और सकल ये भार लदनियां मैहका सुतके गोती ॥ सोइ भुवंग जाके मस्तक
शब्दावली
(७३७)
मणि हैं, जोति उजारे खेले॥ और सकल सावनका कीड़ा, जगत पावतरि पेलै॥ सोई सुमेर जो उदय उजागर, जामें धातु निवासा॥ और सकल पाषाण बराबर, टांकी अग्नि प्रकासा॥ सोई पतिव्रता पियाव्रत साधे, आज्ञा कानि न लौपे॥ और सकल ये स्वान सूकरी, सुंदर नाम न औपे॥ कहैं कवीर सोई जन गुरुवा, नाम भजन अधिकारी॥ और सकल साहिबको बाना, देख्यो तत्त्व विचारी॥
गौरी २८-देखे एक सतगुरु संत सिपाई । प्रेम प्रीतिका पटा लिखाया, अभय जगीरी पाई॥ टे० ॥ सुरति सिगड़ी साज समझको, तनकी तुबक बनायी॥ दारू दम सहजका सीसा, ज्ञानको गज ठहकायी । शील सोपता प्रेमकी पथरी, चित चकमक चमकाई । जुगति जाम बुधिका मंदिरा, प्रीति पियालै पाई॥ सतनामका उठत पलीता, हरि ही होत हवाई॥ गम गोला गढ़ भीतर लागा, भरमकी बुरज दहवाई॥ सतसमसेर जुगति जम धर, छमाकी ढाल बनाई॥ मोह मोरचा पहले तोडा, माया भाग नशाई॥ मन मैवासी गठपतिराजा, जाकी फिरत दुहवाई॥ शब्द स्वरूप सदा सिर ऊपर, सुरति सुरंग लगाई॥ अकल गरीबी दावा दीना, लिया विवेक गढ़ आई॥ संत सूरमा गढ़ मेरा डाका, पकड़े गढ़के रोई॥ पकड़ै खान जान नहीं पावे, पकड़ी ममता बाई॥ साहिब कवीर चढ़ै गढ़ ऊपर, जीति निशान बजाई॥
गौरी २९-पूछे कोई संत सुजान सन्देशा । सतगुरु दियो उपदेश सबनको, चलो अपने देसा॥ टे० ॥ अगम संदेश अगोचर महिमा, नहीं जहां रूप निशानी॥ जीवन ब्रह्म सुरति नहीं मन गति, ऐसा पद निरवानी॥ या नगरी कोई रहन न
कवीरपंथी शब्दावली २४