सामग्री पर जाएँ
भारतकोश
कबीरपंथी शब्दावली

कबीरपंथी शब्दावली

Kabirpanthi Shabdavali

स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा

स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)

Devanagarihipublished968 पृष्ठ

पृष्ठ 748, कुल 968 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 748

(७३४)

कवीरपंथी—

हूँटि हम आये, निरगुन कोइ न बतावे । कहैं कवीर कोई दास निज निर्गुनी, और सब लीला गावे ॥

गौरी १८—आपन पौ आपनहींमें पायो । शब्दही शब्द भयो उजियारा, सतगुरु भेद बतायो ॥ टे० ॥ जैसे सुंदरी सुत लै सुती, स्वप्ने गयो हेराय ॥ जाग परी पलंगपै पायो, ना कहूँ गयो ना आय ॥ जैसे कुँवरि कंठ मनि हीरा, आभूषण विसरायो ॥ संगकी सखी मिलि भेद बतायो, जिवको भरम मिटायो ॥ जैसे मृग नाभि कस्तूरी, हूँदत बन बन धायो । नासा स्वाद भयो जब वाके, उलटि निरंतर आयो ॥ कहा कहूँ वा सुखकी महिमा, ज्यों गुंऐ गुड खायो । कहै कवीर सुनो भाई साधो, ज्योंका त्यों ठहरायो ॥

गौरी १९—राम विना कहु नाहिं साधो, राम विना कहु नाहिं ॥ रामहिं आगे रामहि पीछे, रामहिं बोले माहिं ॥ टे० ॥ उत्तर राम दक्षिण राम, पूर्व राम पश्चिम रामा ॥ स्वर्ग पताल महीतल रामा, राम सकल विसरामा ॥ ऊठत राम बैठत राम, जागत सोवत रामा ॥ राम विना कहु और न दरसे, सकल राम के कामा ॥ सब चराचर सम्पूर्ण रामा, निरखो शब्द सनेहि ॥ कायम सदा कदेहूँ नहि विनासै, बोलन हारा एहि ॥ एक रामको भजे निरंतर, येक राम मिलि गावे ॥ कहैं कवीर रामके परसे, आपा ठौर न पावे ॥

गौरी २०—आये राम भतारा, हम घर आये राम भतारा । ढुलहिन गावो मंगल चारा ॥ टे० ॥ तन रति करहु मन रति करिहु पांचों तत्त्व बराती । राम हमारे पाहुन आये हम जोबन मद माती ॥ शरीर सरोवर वेदी रचिहूँ ब्रह्मा वेद उचारा । राम देव संग भावर फिरहु धनि बड़ भाग हमारा ॥ सुर तैंतीसों