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भारतकोश
कबीरपंथी शब्दावली

कबीरपंथी शब्दावली

Kabirpanthi Shabdavali

स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा

स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)

Devanagarihipublished968 पृष्ठ

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शब्दावली

(७३५)

कौतुक आये मुनि जन कोटि अठासी । कहै कवीर हम व्याह चले हैं पुरुष एक अविनाशी ॥

गौरी २१-आनन्दके घर पायो, अब हम आनंद घर पायो । जबते दया भई सतगुरुकी, अभय निशान बजायो ॥ टेक ॥ काम क्रोधकी गागरि फूटी, ममता मोह बहायो ॥ तजि प्रपंच विविध बिधि किया, चरन कमल चित लायो ॥ प्रेम प्रीति किया तन गुदडी, सुरतिको टोप बनायो ॥ हृद घर छाडि वेहद घर आसन, गगन मंडल मठ छायो ॥ चंद न सूर दिवस नहीं रजनी, जहां जाय लाड-लड़ालाहायो ॥ कहै कवीर कोइ पियाकी प्यारी, पिया पिया रट लायो ॥

गौरी २२-बात लगे मोहि नीकी प्यारी, तेरी बात लगे मो नीकी । जो कोई कोटि भांति सखुझावे, सबही लगे मोहि फीकी ॥ टेक ॥ जलको मीन पलंग ले राख्यो, ले अमृत जल सींची । तलफ तलफ तजत पलंगपै, सुधि बुधि विसरचो जिवकी ॥ स्वातीको स्वाद पपीहा जाने, को जाने वाके जिवकी ॥ पियाको मरम सोइ भल जाने, जाके चोट विरहकी ॥ हीराकी परख जौहरी जाने, चोट सहे सिर घनकी ॥ कहैं कवीर जहैं प्रेम वसतु है, छिपी न रहै वा जनकी ॥

गौरी २३-संतो बोलनहारा राम रजा । पिंड ब्रह्मांड रहे भर पूरा, आप अकेला बांधि धजा ॥ टेक ॥ जैसे बुंद परी जल माही, जलहीते बुद बुद उपजा ॥ मिट गया बुद बुद जलही समाना, होय गया एक सरूप सजा ॥ कोटिक कुम्भ भरे जल झलके, तामैं दीसे चंद सजा ॥ विनशे कुम्भ चंद नहीं विनशे, शब्द स्वरूपी अमर अजा ॥ जामैं हम सोई हम माहीं, मैं ते ते मैं