कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
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गौरी १५—मन तू मानत क्यों न मना रे । कौन कहनको कौन सुननको, दूजा कौन जनारे ॥ टे० ॥ दर्पनमें प्रतिबिंब जु भासे, आप चहुँ दिशि सोई । धोखा मेटि एक जब होवे, जो लखि पावे कोई ॥ जैसे जलते हेम बंधत है, हेम धूम जल सोई ॥ तैसे या तत वा तत सो, फेरि यह अरु वह सोई ॥ जे समझे ते खरी कठिन है, ना समझे तो खोटी ॥ कहैं कवीर दो उपाधि त्यागे, ताकी मति है मोटी ॥
गौरी १६—साधो भाई आत्म सत प्रगासा । ज्यों सूरजमें नहीं अंधेरी, ऐसे सत्य उजासा ॥ टेक ॥ ज्ञान स्वरूप महा अति सूच्छम, करन कहै विज्ञाना ॥ अंधाको सूरज नहीं सुझे, भूल्यो सकल जहाना ॥ बदलीमें सूरज जिमि छिप जाई, माया ब्रह्मलुकाना ॥ ऐसे आत्म सत प्रकाशा विरले साधू जाना ॥ आपहिँ एक अनंत पुनि आपही, नरक स्वर्ग तहां नाही ॥ कौन तरे कौन काको तारे, भूलि रह्यो बाहिर माही ॥ करता काल कर्म नहीं माया, आपही है सब जागा ॥ जन्म मरण नाहिं कछु धोखा, आप चीन्ह अम भागा ॥ विन चीन्है कौनसो कहिये, दुतिया होये बताऊँ ॥ जाकी वस्तु गई सो ढूँढे, गई नहीं क्या पाऊँ ॥ आदि अनादि पार के पारा, वार पार सब एका ॥ कहैं कवीर बूझिये भाई, साधू करै विवेका ॥
गौरी १७—जब ते आत्म तत्त्व विचारा । तब निवैर भया सबहीते, काम कोध गहि डारा ॥ टेक ॥ सबमें आपमें आपमें सबहीं, आप आपमें मेला । नाना भांति घड़े बहु भांजन, रूप धरे धरि खेला ॥ पूरन ब्रह्मा सकल घट कहिये, को पंडित को जोगी । राजा रंक कौनसों कहिये, कौन वैद कौन रोगी ॥ चारहुँ दिशा