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भारतकोश
कबीरपंथी शब्दावली

कबीरपंथी शब्दावली

Kabirpanthi Shabdavali

स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा

स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)

Devanagarihipublished968 पृष्ठ

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पृष्ठ 746

(७३२)

कवीरपंथी—

गौरी १२—है कोई भूला मन समझावे । यह मन चंचल चोर पाहरू छूटा हाथ न आवे ॥ ८० ॥ जोड़ि जोड़ि धन औदे गादे, जहां कोई लेन न पावे ॥ कंठ कपोल आनि जम घेरै, दे दे सैन बतावे ॥ खोटा दाम गांठि लिय डोलै, बडी बडी वस्तु मुलावे ॥ बोवै बबूल दाख फल चाहै, सो फल कैसे पावे ॥ गुरूकी दया साधुकी संगति, ये दोउ मति विसरावे ॥ कहैं कवीर सुनो भाई साधो, बहुरि न भौजल आवे ॥

गौरी १३—मन तू क्यों भूला रे भाई, तेरी सुधि बुधि कहाँ हेराई ॥ ८० ॥ जैसे पंछी रैन वसेरा, बसे वृच्छ में आई ॥ भोर भये सब आप आपको, जहां तहां उठि जाई ॥ सुमामें तोहि राज मिल्यो तहाँ है, हाकिम डुकुम दुहाई ॥ जागि पञ्चो जब लावन लसकर, पलक खुले सुधि आई ॥ मात पिता सुत बंधु तिरिया, नाती सगो सगाई ॥ यह तो सब स्वारथके संगी, झूठी लोक बढाई ॥ सागर माहिं लहरि उठत है, गिनती गिनी न जाई ॥ कहैं कवीर सुनो भाई साधो, दरिया लहरि समाई ॥

गौरी १४—मनुवा नाहिं मानत मोरा । बार बार मैं कह समझायो, जगमें जीवन थोडा ॥ ८० ॥ या कायाका गर्व न कीजे क्या श्यामल क्या गोरा ॥ भजन विना तन काम न आवे, कोटि सुगन्ध चहोरा ॥ या माया जनि देखत भूलो, क्या हस्ती क्या घोडा ॥ जोड़ि जोड़ि धन बहुत विश्वचै, कोटिक लाख करोड़ा ॥ उवध्या उरमति और चतुराई, जन्म गमायो बौरा ॥ लेत उपाय गिरत भव परियो, जैसे बालक भौरा ॥ अजहुं आय करो सत्संगति, हरि भजि मानि निहोरा ॥ कहैं कवीर मन चितराखो, ज्यों रे सुई बिच डोरा ॥