कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
(७३४)
कवीरपंथी—
हूँटि हम आये, निरगुन कोइ न बतावे । कहैं कवीर कोई दास निज निर्गुनी, और सब लीला गावे ॥
गौरी १८—आपन पौ आपनहींमें पायो । शब्दही शब्द भयो उजियारा, सतगुरु भेद बतायो ॥ टे० ॥ जैसे सुंदरी सुत लै सुती, स्वप्ने गयो हेराय ॥ जाग परी पलंगपै पायो, ना कहूँ गयो ना आय ॥ जैसे कुँवरि कंठ मनि हीरा, आभूषण विसरायो ॥ संगकी सखी मिलि भेद बतायो, जिवको भरम मिटायो ॥ जैसे मृग नाभि कस्तूरी, हूँदत बन बन धायो । नासा स्वाद भयो जब वाके, उलटि निरंतर आयो ॥ कहा कहूँ वा सुखकी महिमा, ज्यों गुंऐ गुड खायो । कहै कवीर सुनो भाई साधो, ज्योंका त्यों ठहरायो ॥
गौरी १९—राम विना कहु नाहिं साधो, राम विना कहु नाहिं ॥ रामहिं आगे रामहि पीछे, रामहिं बोले माहिं ॥ टे० ॥ उत्तर राम दक्षिण राम, पूर्व राम पश्चिम रामा ॥ स्वर्ग पताल महीतल रामा, राम सकल विसरामा ॥ ऊठत राम बैठत राम, जागत सोवत रामा ॥ राम विना कहु और न दरसे, सकल राम के कामा ॥ सब चराचर सम्पूर्ण रामा, निरखो शब्द सनेहि ॥ कायम सदा कदेहूँ नहि विनासै, बोलन हारा एहि ॥ एक रामको भजे निरंतर, येक राम मिलि गावे ॥ कहैं कवीर रामके परसे, आपा ठौर न पावे ॥
गौरी २०—आये राम भतारा, हम घर आये राम भतारा । ढुलहिन गावो मंगल चारा ॥ टे० ॥ तन रति करहु मन रति करिहु पांचों तत्त्व बराती । राम हमारे पाहुन आये हम जोबन मद माती ॥ शरीर सरोवर वेदी रचिहूँ ब्रह्मा वेद उचारा । राम देव संग भावर फिरहु धनि बड़ भाग हमारा ॥ सुर तैंतीसों
शब्दावली
(७३५)
कौतुक आये मुनि जन कोटि अठासी । कहै कवीर हम व्याह चले हैं पुरुष एक अविनाशी ॥
गौरी २१-आनन्दके घर पायो, अब हम आनंद घर पायो । जबते दया भई सतगुरुकी, अभय निशान बजायो ॥ टेक ॥ काम क्रोधकी गागरि फूटी, ममता मोह बहायो ॥ तजि प्रपंच विविध बिधि किया, चरन कमल चित लायो ॥ प्रेम प्रीति किया तन गुदडी, सुरतिको टोप बनायो ॥ हृद घर छाडि वेहद घर आसन, गगन मंडल मठ छायो ॥ चंद न सूर दिवस नहीं रजनी, जहां जाय लाड-लड़ालाहायो ॥ कहै कवीर कोइ पियाकी प्यारी, पिया पिया रट लायो ॥
गौरी २२-बात लगे मोहि नीकी प्यारी, तेरी बात लगे मो नीकी । जो कोई कोटि भांति सखुझावे, सबही लगे मोहि फीकी ॥ टेक ॥ जलको मीन पलंग ले राख्यो, ले अमृत जल सींची । तलफ तलफ तजत पलंगपै, सुधि बुधि विसरचो जिवकी ॥ स्वातीको स्वाद पपीहा जाने, को जाने वाके जिवकी ॥ पियाको मरम सोइ भल जाने, जाके चोट विरहकी ॥ हीराकी परख जौहरी जाने, चोट सहे सिर घनकी ॥ कहैं कवीर जहैं प्रेम वसतु है, छिपी न रहै वा जनकी ॥
गौरी २३-संतो बोलनहारा राम रजा । पिंड ब्रह्मांड रहे भर पूरा, आप अकेला बांधि धजा ॥ टेक ॥ जैसे बुंद परी जल माही, जलहीते बुद बुद उपजा ॥ मिट गया बुद बुद जलही समाना, होय गया एक सरूप सजा ॥ कोटिक कुम्भ भरे जल झलके, तामैं दीसे चंद सजा ॥ विनशे कुम्भ चंद नहीं विनशे, शब्द स्वरूपी अमर अजा ॥ जामैं हम सोई हम माहीं, मैं ते ते मैं
(७३६)
कवीरपंथी—
गगन गजा ॥ कहैं कवीर कछु संशय नाहिं, तत्त्व लखा जब भ्रम भजा ॥
गौरी २४-संतो भाई हरिसा हीरा लाधा, देखत ही मन मगन भयो है, गिन गिन गांठी बांधा ॥ टेक ॥ पल पल परखों छिन छिन निरखों, राखूं छानै छानै ॥ भेद काहुपै मानू नाहिं, परचो रंककै पानै ॥ तोल न मोल अमोलक कहिये, फोरेहु नहिं फूटे ॥ कहैं कवीर यह खुल गइ गठरी, खोले नहिं खूटे ॥
गौरी २५-जप जप अजपा जाप भला । सुरति न विसहं एक पला ॥ टे० ॥ येही राह वहै सतगुरुकी, पंछी मारग मीन चला ॥ हंसा मारग सोध चले हैं, जा खोजत जम मान दला ॥ सतलोक सतगुरुका आसन, सुरति निरतिकी बांधि कला ॥ अगम डोरि नगरीके निरंतर, मकर तार तहां सोधि चला ॥ भया मुचेत सुरति लव लागी, कहैं कवीर जब होय भला ॥ सतगुरु शब्द विलोय कह्यो है, मन छाडै जब नाम मिला ॥
गौरी २६-साधो भाई नाम ध्वजा फहराई । लोक वेदकी चाल मिटाई, सो निज देखो आई ॥ टे० ॥ कहा पढै पंडित वेद पुराना, भेद न हिरदे समाई ॥ खसम छोड़ि भयी बिबचारिनी, बातें करत बनाई ॥ वेद पढै पुनि भेद न पावे, फिर फिर भटका खाई ॥ कोइ कोइ संत विवेकी विरला, रहै राम लव लाई ॥ नाम प्रताप सदा सिर ऊपर, दर्शन पाय नसाई ॥ जाको काल सदा सिर नावे, दूरि दूरि होय जाई ॥ कहूँ कहा कछु कहत न आवै, सब घट रह्यो समाई ॥ नाम प्रतीति भई जाजनको कहैं कवीर समझाई ॥
गौरी २७-गुनका भेद न्यारा न्यारा, जानगो जानन हारा ॥ टे० ॥ सोई राज राजकुल मंडन, जाके मस्तक मोती ॥ और सकल ये भार लदनियां मैहका सुतके गोती ॥ सोइ भुवंग जाके मस्तक
शब्दावली
(७३७)
मणि हैं, जोति उजारे खेले॥ और सकल सावनका कीड़ा, जगत पावतरि पेलै॥ सोई सुमेर जो उदय उजागर, जामें धातु निवासा॥ और सकल पाषाण बराबर, टांकी अग्नि प्रकासा॥ सोई पतिव्रता पियाव्रत साधे, आज्ञा कानि न लौपे॥ और सकल ये स्वान सूकरी, सुंदर नाम न औपे॥ कहैं कवीर सोई जन गुरुवा, नाम भजन अधिकारी॥ और सकल साहिबको बाना, देख्यो तत्त्व विचारी॥
गौरी २८-देखे एक सतगुरु संत सिपाई । प्रेम प्रीतिका पटा लिखाया, अभय जगीरी पाई॥ टे० ॥ सुरति सिगड़ी साज समझको, तनकी तुबक बनायी॥ दारू दम सहजका सीसा, ज्ञानको गज ठहकायी । शील सोपता प्रेमकी पथरी, चित चकमक चमकाई । जुगति जाम बुधिका मंदिरा, प्रीति पियालै पाई॥ सतनामका उठत पलीता, हरि ही होत हवाई॥ गम गोला गढ़ भीतर लागा, भरमकी बुरज दहवाई॥ सतसमसेर जुगति जम धर, छमाकी ढाल बनाई॥ मोह मोरचा पहले तोडा, माया भाग नशाई॥ मन मैवासी गठपतिराजा, जाकी फिरत दुहवाई॥ शब्द स्वरूप सदा सिर ऊपर, सुरति सुरंग लगाई॥ अकल गरीबी दावा दीना, लिया विवेक गढ़ आई॥ संत सूरमा गढ़ मेरा डाका, पकड़े गढ़के रोई॥ पकड़ै खान जान नहीं पावे, पकड़ी ममता बाई॥ साहिब कवीर चढ़ै गढ़ ऊपर, जीति निशान बजाई॥
गौरी २९-पूछे कोई संत सुजान सन्देशा । सतगुरु दियो उपदेश सबनको, चलो अपने देसा॥ टे० ॥ अगम संदेश अगोचर महिमा, नहीं जहां रूप निशानी॥ जीवन ब्रह्म सुरति नहीं मन गति, ऐसा पद निरवानी॥ या नगरी कोई रहन न
कवीरपंथी शब्दावली २४
(७३८)
कवीरपंथी-
पावे, भय चिंता दुख खानी ॥ सुन्दर रूप देखि मत भूलो, छिनमे जात विलानी ॥ अब एक शब्द हमार सुनिये, निरखि परखि दिल दीजै ॥ सून्यके मिले सून्य होय जेहो, अजर अमर तहां जीजै ॥ जो कछु तुम्ह तुम बिन कछु नाहिं, सरजीव जमा संभारो ॥ कहैं कवीर एक हम तुमहिं, घट घट रूप निहारो ॥
गौरी ३०-मिलो प्यारे संत सुजान सनेही । बहु दिन बीते तुम विछुडे को, चेतो बेरिया एही ॥ टे० ॥ या अवसर जीव जमा संभालो, डुरलभ मनुखा देही ॥ अबही समझि रहो घट भीतर, जन्म सुफल कर लेही ॥ निरखो शब्द सदा सुखदाई, जुग जुग हम गोहराई ॥ दया सरूप रहो नितसंगही, अन्त कहूँ नाहिं जाई ॥ खोलो दिष्टि उघाडौ निर्मल, चीन्हो वचन हमारा । कहैं कवीर सुखसागर तजिकै, कहा मन लग्यो तुम्हारा ॥
गौरी ३१-सौदा राम निरंतर भाई ॥ टेक ॥ ज्ञानका गोन सुरति बनजारा, लौकी लार लगाई ॥ गमका बैल वालदी मनवा, हरि भजि हा हा हाई ॥ मनसा तोड़ि मोल करि महंगा, हित करि बेच विचाई ॥ जन जन सेती साटन करिये, गाहक लेगा आई ॥ पूरी "....." बनिके उत्तरि, शंका रही न काई ॥ कहैं कवीर सुनौ भाई साधो, सतगुरुकी शरनाई ॥
गौरी ३२-अवसर बहुत भलोरै भाई, मनुषा देह देवनको डुरलभ, सोई देह तैं पाई ॥ टेक ॥ तजि अभिमान झूठ प्रपंच-को, छाड़ु गुमान बडाई । मात-पिता स्वारथके संगी, माया जाल बंधाई ॥ जब लग जरा रोग नाहिं तेरे, ले गुरु ग्यान भलाई ॥ साधु संगति मिलि भजु सतगुरुको, सोई सकल सुख-दाई ॥ कहूँ पुकारि चेत नर अंधा, यह तन आन गवाई । कहैं कवीर देही कांचको रूप, विनशत बार न लाई ॥
शब्दावली
(७३९)
गौरी ३३-बन्दे नाम साहेबको लेरे । नाम विना तेरो काज न सरिहै फिर पीछे पछतैहै रे ॥ टेक ॥ एक लख पुत्र सवा लख नाती, संपति थिर न रहै रे ॥ लंकासे कोट विनसि गये, छिन्नमें ऐसी ब्यार वहै रे ॥ नदी नाव संजोग बनो है, ऐसे मिलना हैरे । ना कोई तेरा ना तू काहूका, पैडे खलक बहैरे ॥ ये तो सब स्वारथके गरजी, गुरु विन सुख न लहैरे ॥ छनिक माहिं तन विनसि जायगा फिर कछु कर न सकेरे ॥ ताते बेगि सम्हार अपनपौ, सत कवीर सत्य कहैरे ॥
गौरी ३४-जिवरा तू जायगो मैं जानी । आवेगी कोई लहर लोभकी, बूढेगो विन पानी ॥ टेक ॥ राजकरंते राजा जायगा, सेज संजती रानी । बेद पठनले पंडित जायगा, कथा सुननते ज्ञानी ॥ जोग करन्ते जोगी जायगा और जायगा अभिमानी । कहैं कवीर सत् भगति न जायगी, आदि अन्त ठहरानी ॥
गौरी ३५-अब तो ऐसेही बनि आई । भावे कोई निंदो भावे कोई वन्दो, छोड़ी लोक बढाई ॥ टेक ॥ कुलसे निकसि भई जब गनिका, बहुरि न कुलै समाई ॥ केहारे कोटि करै जु लंघन, भूखा घास न खाई ॥ भव सागर तरबेके कारन, नामकी नाव बनाई । हलके हलके पार उतारि गये, बूढे मान बढाई ॥ जैसे भृग नाद धुनि सुनिकै, प्रान तजत है आई । जैसे मीन मरै विन नीरा, जल विनु रह्यो न जाई ॥ परगयी छाप भक्ति अनुभवकी, उर अंतर लपटाई ॥ दास कवीर डिगै नहिं कबहुं, वाढी अमिट सगाई ॥
गौरी ३६-धोखा सबको मारे साधो, धोखा सबको मारे ॥ ऐसो है कोई संत विवेकी निरमल ज्ञान विचारे ॥ टेक ॥ कोई खोजै शिव सकतीको कोई खोजै काया ॥ कोई खोजै सून्य
(७४०)
कवीरपंथी—
मंडलको, ऐसे जग भरमाया ॥ कोई मुनिजन मनको खोजै, उलटी पवन चढावे । कोई खोजै भँवर गुफा, अजपा सो लौ लावे ॥ कोई सिद्ध होय आसन साधे, कोई सीख सयाना । कोई देश देशान्तर डोलै, तीरथ व्रत लपटाना ॥ करम भरमकी सांकर काटे, पार ब्रह्मको सेवे । कहैं कवीर सोई जन गुरुवा, सिरपै बोझ न लेवे ॥
गौरी ३७—साधो भाई मनका धोखा भागा । बहुत दिननका भमरत फिरिया, सोया था अब जागा ॥ टेक ॥ लोग कहैं यह काल बली है, सब काहूको खावे । हम जाने यह अलख पुरुष है, आपा माहिं समावे जैसे बेयार बगूरा होई, धूर उड़ावे भारी । खुली गाँठि जब पवन भई है, सो गति भई हमारी । जैसे लून भया जल सेती, सब कोई कहैं सारा । उलटि जु लून आप संग मिलिया, मिटिगा नाम विकारा ॥ ज्यों वहनी काष्ठमें होई, कर न सके परगासा । जब काष्ठ वहनीमें आया, छूटि गया भरम पास ॥ भरम छाड़ि निह भरम भया है, निज तत्त्वसो पहिचाना । कहैं कवीर सुनो भाई साधो, मिटिगा आवन जाना ॥
गौरी ३८—पंडित सत पद जपरे भाई । चरण कमल विन सब नर बुढे, नरक पडी चतुराई ॥ टेक ॥ ज्ञान न उपज्यो ब्रह्म न चीन्हो, आप कहाँसे आई ॥ एक बुंद सो चारि वरन मै, ब्रह्म देह कहैं पाई ॥ शूद्र शरीर ब्रह्म तेहि भीतर, भिन भाव जहाँ नाही । लख चौरासी जीव जो इनमें, वरत रह्यो सब मांही ॥ नौगुन सूत उरझि नहिं सरुझे, तीन गिरह दे आनी । ताको जनेऊ कबहुँ नहिं टूटे, दिन दिन बारह बानी ॥ ब्रह्म गायत्री गुरु अस्थाना, अजपा जाप थिर माहीं । संज्ञा तरपन तहवां कीजे, कुश पानी जहैं नाही ॥ रिग जजु ग्यान ध्यान धरि
शब्दावली
(७४१)
पशुवा, साम अर्थवन सोई ॥ सुसम वेदको भरम न जाने, कैसे ब्राह्मन होई ॥ कहैं कवीर निज ब्रह्मही चीन्हो, पास जनेऊ सोई । पाखंडकी गति सबही छूटे, तब निज ब्राह्मन होई ॥
गौरी ३९-पंडित अपनी अगिन बुझावो । हम तो अपनी राह चलत हैं, तुम काहे दुख पावो ॥ टे० ॥ को तुम कौन कहाँ से आये, अंत कहाँ तुम जाई । यहाँ तो तुम ब्रह्मन होइ बैठे, चौरासी बिसराई ॥ दशों मास औघें सुख रहिया, सप्त धातु रस पीया ॥ जहाँ तो तुम चौका करि जीमो, वहाँ चौका किन दीया ॥ ना मैं चीन्ह हारि मत चालो, अनंत अनूप उखाडो ॥ कोध चंडाल सदा संग व्यापे, ताको मूल उखाडो ॥ कुल अभिमाना आनकी पूजा, यहाँ विथा तोहि लागी । जो यह जाति बड़ी है पांडे, सुखदेवने क्यों त्यागी ॥ पांच तत्त्वको सकल पसारा, जहवाँ जीव दुख पावे ॥ कहैं कवीर सोई सत ब्राह्मन, उलटा ब्रह्म समावे ॥
गौरी ४०-पांडे बूझि पियो जल पानी, तोही छूति कहाँ लपटानी ॥ टेक ॥ जल सूतक थलभी सूतक, सूतक पवन रसोई ॥ जनम मरण दोऊ भी सूतक, सूचि कहाँते होई ॥ नहाय धोयके चौके बैठा, बहुत करी सुथराई ॥ उडि माखी चौकेमें बैठी, बूडि गई चतुराई ॥ मक्खी एक अखज भखि आयी, हसती ऊँट अरु घोडा ॥ उडि माखी पनवारे बैठी, ताको करो निबेडा ॥ पीर मुये पैगम्बर गाडे, सहस अठासी पांडे ॥ जलि बलि राख भये धरनीपर, उस माटीके भांडे ॥ पाँचो कपडा एक सूतका, जुलहे एक बनाया । कपडा लेकर अलगे राखो, धोती चौके लाया ॥ हाड़ झरे झर चाम झरेझर, दूध वहाँ सो आया ॥ सोई दूध तुम पीवन लागे, चपिया छूत लगाया ॥ नदी एक जो जल बहिआया,
(७४२)
कबीरपंथी—
एक रेत जल सरिया । मगर मच्छ जो जलमें न्याए, जल सूतक से भरिया ॥ तुमतो पहिरि जनेऊ बैठो, मेहरी को क्या पहिराया ॥ वहि कहिये बारैकी सूहर, उन परसी तुम खाया ॥ चार अचार छाडिदे पांडे, रहो तत्त्व लौ लाई । कहै कवीर सुनो हो पांडे, गहो संत सरनाई ॥
गौरी ४१—पांडे ना कर वाद विवाद । या देही विन सबद न स्वांद ॥ टेक ॥ खंड ब्रह्मांड पिंडभी माटी, माटी नय निधि काया । माटी खोजत सतगुरु भेटा, तिन कछु अलख लखाया ॥ जीवत माटी सुए भी माटी देखो ज्ञान विचारी । अंत काल माटीमें बासा, लोटे पांव पसारी ॥ माटीकी भीत पवनका थम्भा, बिंद संजोग उपाया । भांडे गोठे सँवारे सोई, या साहबकी माया ॥ माटीका मन्दिर ज्ञानका दीपक, बाती पवन उजियारी । जाहि जिया सब जग सूझे, कहै कवीर विचारी ॥
गौरी ४२—पंडित मिथ्या करत विचार । नहीं तहां सृष्टि न सिरजनहार ॥ टेक ॥ सुन्न अस्थूल पवन नहीं पावक, रवि शशि धरनि न नीरं । ज्योति स्वरूपी काल न तहिया, नाही वचन शरीरं । भरम करम वहां कछु नाहिं, नाही वेद विचारं । हरि हर ब्रह्मा शिव सकती नाहीं, नाहिं तीरथ आचारं ॥ गोरख राम वहां कछु नाहीं, नहीं मन्त्र नाहिं पूजा ॥ सज्जन असज्जन भावभी नाहीं, कौबू एककि दूजा ॥ माय बाप गुरु नाहिं वाके, ओ तो पुरुष अकेला ॥ कहै कवीर जो अबकी समझे, सो सतगुरुका चेला ॥
गौरी ४३—पंडित कहो मोसो समझाई । अरथ धर्म काम मोक्ष फल, कौन दिशि है भाई ॥ टेक ॥ उत्तर दच्छिन पूरब पच्छिम,
शब्दावली
(७४३)
सरग पाताल भूमाहीं । बिना ब्रह्म खाली नहीं कितहुँ, नरक पड़े सो काहीं ॥ अन समझे को नरक सरग है, ततदरसीको नाहीं । जा डरसो संसार डरत है, सो डर हमरे नाहीं ॥ पाप पून्यकी कहेँ न आशा, सरग नरक नहीं जाऊँ ॥ कहै कवीर सुनो भाई साधो, जहाँ पद तहाँ ठहराऊँ ॥
गौरी ४४-भगतकी हांसी करो मत कोई । जाको हँसे महा दुख होई ॥ टेक ॥ पहिली हांसी करी हिरनाकुश, नखसे उदर विदारो । बाँह पकड़ि भुजा उपाडी, ले धरतीमें डारो । दूजो हांसी रावन कीन्ही जनम तीन तिहिँ मारो । भगत विभीषण राज दियो है, अजहुँ टरत न टारो ॥ भीषम करन द्वैत दुयोधन, ये हांसी करि हारे । कौरव कुटुम्ब निकंदन कीन्हो, भगत चक्रसे मारे ॥ जिन जिन हांसी करी भगतकी, सो २ नर नरक सिधारे ॥ तिन पतितनको नरक दियो है, कहैं कवीर पुकारे ॥
गौरी ४५-हरितो भगतनके बस भाई । जाति वरन कुल रीझत नाहीं, ना रीझे चतुराई ॥ टेक ॥ सेवरी जाति भीलनी होती, वेर जूठले आई । प्रीति जानि वाके फल पाये, तीनों लोक बंढाई ॥ करमा कद आचार कियो थो, हरिसे प्रीति लगाई ॥ छप्पन भोग पाछे आरोगे, पहिले खिचडी खाई ॥ तिर लोचन और नामा पीपा, हरि पेठे विकराई । सेन रूप होय मर्दन कीन्हो आप भये हरि नाई ॥ सहस्र अठासी जग्यमें जीमें, तबहुँ घंट नहिरे बाज्यो । कहैं कवीर स्वप्नचके जीमे, संख मगन होय गाज्यो ॥
॥ इति गौरी ॥
(७४४)
कवीरपंथी-
राग कल्याण प्रारम्भः ।
राग कल्याण १-पल पलबलि मैं गुरुके जाऊँ, जिनरे किरपा करि नाम दियो है, गुरुकी पटतर काहि लगाऊँ ॥ टेक ॥ सुखदेव दियो वैकुंठ फेर । बिन गुरु नाहि भयो निवेर । जनकको जाय कियो गुरुदेव । ताहीते पायो अलख अभेव ॥ नारद निंदा गुरुकी कीन्ही । ताहीते चौरासी दीन्ही ॥ रंचक उन गुरु दया जु करी । गुरु प्रताप चौरासी टरी ॥ गुरु समान दाता नहि कोय । भगति दान गुरु दियो मोय ॥ कहैं कवीर सुनो नर लोई । गुरुको भगति विनु मुक्ति न होई ॥
राग कल्याण २-गुरु मेरे बुटिया अजब पिलाई । भया सचेत मिटी दुचित्ताई ॥ टे० ॥ नाम औषधि रसन कटोरी । ताहिके पीवत कुमति गढ़ मोरी ॥ सुषुमनिके घर भयो अनंदा । मिटि गई तिमिर उदय भौ चंदा ॥ सुरति सुहागिनि भरि भरि लाई । पीवत अमृत कबहुँ न अघाई ॥ सुषुमनि सुरति भई मतवारी । कबहुँ न लागे विषय सुमारी ॥ ब्रह्मा नारद रहे लुभाई । खोजत शम्भु ध्यान लगाई ॥ प्रेम प्रीति भरि पिया जु कोई । कहैं कवीर अमर भै सोई ॥
राग कल्याण ३-भाग बडे जाके संत पधारै । करि सुमिरन भवसागर तारे ॥ टे० ॥ आये संतको आदर कीजै चरन धोय चरनामृत लीजै ॥ येही संत हैं पर उपकारी । सरन आयेको लेत उबारी ॥ साहबको घर संतन माँहिं । साहेब संत कछु अन्तर नाहिं ॥ कहैं कवीर संतन भले पधारै । जनम जनमके कारज सारै ॥
राग कल्याण ४-जबते मन प्रतीति भयी । दिन दिन अवगुन छूटन लागे, बाढन लागी प्रीति नयी ॥ टे० ॥ सुखसागर सुख
शब्दावली
(७४५)
मंजन कीन्ही, स्वाती बूंद निज सीपलई । मानिकपुरमें मोती निपजे, हीरा हंसा भेट भई ॥ सुरति दोऊ ज्ञान जोहरी, निरखि परखि निज वस्तु लई । थोड़ा बनिजन वस्तु भइ भारी, उपजन लागी लाल मयी ॥ पायो दाव भाव बनि आयो, सतगुरु मिले बड साहु सही ॥ बाढ़ी बटे घटे नहि कबहुं परम तत्त्व ले मनो-तही ॥ अगम निगम तत खोज निरंतर, गुरु नाम निज मूल दयी । कहैं कवीर दया सतगुरुकी, हती कुमति सो दूर गयी ॥
राग कल्याण ५-सुमिरन सार साधो सुमिरन सार । सुमिरि सुमिरि जन उतरे पार ॥ टेक ॥ सुमिरनही शिव शंकर जोगी । सुमिरनही इंद्रादिक भोगी ॥ सुमिरनही प्रह्लाद उबारे । स्वप्न फाड़ि हिरनाकुश मारे ॥ सुमिरनही ध्रुव निहचल कियो । सुमिरन राज विभीषण दियो ॥ सुमिरन द्रोपदीचीर बढायो । गजकै काज पयादेइ धायो ॥ सुमिरन नाम देवकी छानि छवाई । मंदिर फेरचो गऊ जिवाई ॥ सुमिरन नामदेवकू दरशन दियो । बांह पकडी मंदिरमें लियो ॥ कहैं कवीर सुमिरन है ऐसा । अपनी करनी करो कोइ जैसा ॥
राग कल्याण ६-करन मतै सो करै करता । और सकलका झूठ मता ॥ टे० ॥ पूतना कहाँ कमाई कीन्ही, अघ मोचन जाँकी दूरि गता ॥ वाहि वैकुंठ पाताल पठायो, बलि राजामें कौन खता ॥ कबहुँक सैलपर सागर, कबहुँक सोखे सब सलिता ॥ कबहुँ भूपतितै करै भिषारी, तनहाँके सिर छत्र धरता ॥ एक रहै मायामों शीतल, एक फिरे माया जलता ॥ एकनके घर बैठेही आवे, एक फिरे घर २ मँगता ॥ एक पुत्रकौ नृप पचिहारे, जाके हती बहुत बनिता ॥ साठ पुत्र नारदकी दीन्हा, माया त्यागि फिरे विर-
(७४६)
कवीरपंथी—
कता ॥ पंच भरतारीकी लब्धा राखी, लंछन लगायो पति वरता॥ कहैं कवीर सुनो भाई साधो वा साहबकी अगम गता ॥
राग कल्याण ७—सब अवगुनके सिर अभिमान । दुरजोधनके मेवा त्यागी, दासी सुत घर आये, भगवान ॥ टे० ॥ याही चूक बलि गयो रसातल, मारचो बालि एकहि बान ॥ याही चूक गयो लंकापति, काटी शीश दसरथ सुत आन ॥ सुखदेव मुनिसे को बड होई, इन्द्री जीति बिष डारचो भान ॥ वैकुंठमें आदर नाहिं, कृपा भई गुरु लागे कान ॥ राजसू जग्य रच्यो पंडवनके, सुर नर मुनि कियो जलपान ॥ संख पंचायन जबहीं बाज्यो, स्वपच भगत रस लीयो सान ॥ जोग रु जग्य नेम व्रत संजम, चारिवेद अरु पढैं पुरान । कहैं कवीर जब लगि मैं मेरी, तब लगि भगति नहीं परमान ॥
राग कल्याण ८—जाहूँ मैं या जगकी चतुराई । प्रभुजीको नाम विसरजन कियो, जिन या जलसो जुगति बनायी ॥ टे० ॥ जोरत दाम काम अपनेको, हम खेहैं लडक व्योसायी । सो धन चोर हाकमा लोनो, रहो सहो ले जात जमाई । या माया कलवारिन कहिये, मद पिवाय राखे बौराई एक जे परो धूरिमें लेटे, एक कहैं चौका देरी माई ॥ या माया सुरनर मुनि बहके दयी देवता सब धरि खायी । कोइ कोइ लागि रहै गुरु चरना, तिनको माया फिरि पछिताई ॥ कहैं कवीर सुनो भाई साधो, ले फांसी हमहुँ पै आई । गुरु प्रताप साधुकी संगति, अब हम रहे निशान बजाई ॥
राग कल्याण ९—अजहूँ प्यारे चेत मना, समुझि विन जीवना कछु ना ॥ टे० ॥ धन जीवन द्वारा अरु बारा, ये तो रैनका है सुपना । तन सुन्दर छवि देख न भूलो, यह तन रहन न एक
शब्दावली
(७४७)
छिन्ना ॥ जेते तेते ध्यान लगावे, अँखियन देखा सरवन सुना ॥ युमिरन भजन कैरे सब कोई, विन दृश्शन सबही भरमना ॥ शब्द विचारि रहो तुम सन्मुख, अखंड स्वरूपी अजर घना । कहैं कवीर आप लखि आपे, जुग जुग शब्द स्रूप बना ॥
राग कल्याण १०-मैं बौरी मेरा राम भतार । जा कारन रचि कहूँ सिंगार ॥ टेक ॥ जैसे धोबिया रज मिलि धोवे, हमरा पाप थूँ निंदक खोवे ॥ निंदक मेरा प्रान अधार । विन वेगार चलावे भार ॥ निंदक मेरा माय अरु बाप । जनम जनमका काटे पाप ॥ कहैं कवीर निंदक बलिहारी । आप रहे जन पार उतारनी ॥
राग कल्याण ११-साधू घट शील संतोष विराजे ॥ दया स्वरूप सकल जीवपै, शब्द सरोतर गाजै ॥ टेक ॥ जहाँ जहाँ मनकी मनोरथ दौड़े, ताके संग न धावो । आसन अटल छिमा धीरज धरि, तन तजि अनत न जावो ॥ सत्यवादी सतगुरु पहिचाने, आतम दिष्टि परगासा ॥ निरमल दसा सरब सुख- दाई, आनंद घर रहिवासा ॥ सूधी चाल सदा शीतल गति, निसि दिन सबद विलासा । कहैं कवीर ऐसे संत विवेकी, जहाँ हमारा वासा ॥
राग कल्याण १२-जनको दीनता जो आवे । सौ पद देऊँ दास अपनेको, ब्रह्मादिक नहीं पावे ॥ टेक ॥ औरनको पूरा करि जाने, आपन बोझ कहावै । अवधू तुमसे सत्य कहत हौं, सो मेरे मन भावे ॥ एकै ब्रह्म सकल घट देखै, दुविधा दूरि कहावै ॥ इन पांचन तैं तोरि सनेहा, जब गोविंद गुन गावे ॥ होय आधीन प्रेम लवलीन, कुल अभिमान मिटावै ॥ सहज सुन्यमें रहै समाई पठि गुन सब विसरावै ॥ गुरुकी दया साधुकी संगति,
(७४८)
कबीरपंथी—
भाव भगति चित लावै । कहैं कवीर सुनो भाई साधो, क्यों न परम पद पावै ॥
राग कल्याण १३-भजनमें होत आनंद आनंद । बरसत शब्द अमीके बादल, भीजत है कोइ संत ॥ टे० ॥ अगर वरन जहाँ ततकी नदियां, मानो धारा गंग । करि अस्नान मगन होय बैठे, चढ़ तब शब्दको रंग ॥ रोम रोम जाके अमृत भीना, पारस परसत अंग । शब्द गहो जिव संशय नाहिं, साहेब है तेरे संग ॥ स्वासा सार रचो मेरे साहिब, जहाँ नहिं माया सोहंग । कहैं कवीर सुनो भाई साधो, जपो सोहंग सोहंग ॥
राग कल्याण १४-क्यों न हमारे आये केसो, क्यों न हमारे आये । षड्रस व्यंजन छाड़िरसोई, साग विडुर घर पाये ॥ टे० ॥ जहाँ अभिमान तहाँ हम नाहीं, वह व्यंजन विष लागे । सोई मुनिजन पूरा कहिये, जो अभिमानीको त्यागे ॥ जाति हीन जाके कुल नाहिं, है दासीको जायो । जाकी टपरिया तुम जइ बैठे, कहा बड़ापन पायो ॥ सत सत वचन कहो दुयौधन, सुन लो बात हमारी । विडुर हमारे प्रानसों प्यारे, तुम विषिया बेकारी ॥ पुरातन कथा तुम्हारी प्रभुजी, वनमें छाछ मंगाई ॥ ग्वालनके संग भोजन करते, सो मति तुम मैं आई ॥ प्रेम प्रीतिके हम हैं भूलें, अभिमानी नहिं भावै । कहैं कवीर साधुकी महिमा, हरि अपने मुख गावै ॥
राग कल्याण १५-कौन तुम्हारे आवै राजा, कौन तुम्हारे आवै । ऐसो हेतु विडुरको कहिये, सोई गरीब मोहि भावै ॥ टे० ॥ तुमरो दूध विडुरको पानी, अमृत करि करि जानी । तुमरी मेवा विडुरकी भाजी, रस भर एक न आनी ॥ भोजन तो दोऊ विधि राजा, विपत्ति परकी प्रीती । तुम्हारे प्रीति न हमरे
शब्दावली
(७४९)
आपदा, एही बड़ी अनरीती ॥ स्वीर समान साग हम पाये, गावत रैन बिहाई। कहैं कवीर दासकी महिमा, आप श्रीमुख गाई॥
राग कान्हरा आरम्भः ।
राग कान्हरा १—जा कुल भक्त भागवत होई। गिनिय न अवरन बरन रंक धन, विमल वंस मानिये निज सोई ॥ टेक ॥ ब्राह्मन छत्री वैश्य सूदलौ, नारि चंडाल मलेच्छ जो होई । होय पुनी तजे भगवंता, आप तरे तारे कुल दोई॥ धन वही गांव ठांव सोह पावन, होत पुनीत संगके लोई । सुर पंडित अरु निरपति पादसाह, भगत बरोबर तुले न कोई ॥ गहत सार पद पीवत ग्यान रस, तजि संसार जानि जस छोई । पुरइन पत्र समान रहत जल, कहैं कवीर जगमें जन सोई ॥
राग कान्हरा २—बहुत दिननसों प्रीतम पाये। भाग भले घर बैठिहिं आये ॥ टे० ॥ मंगल चारि मांहि मन राखूं । राम रसायन रसना चाखूं ॥ मंदिर माहिं भयो उजियारा । ले सूती पि्या अपना पि्यारा ॥ मैं जो निरासी जो निधि पाई । हमरो कहा पि्या तुमरी बड़ाई ॥ कहैं कवीर हम कछु नहिं कीनो । सहज सुहाग राम मोहि दीनों ॥
राग कान्हडा ३—अब तोहिं जान न देऊँ रामा प्यारे । ज्यों भावे त्यों रहो हमारे ॥ टे० ॥ बहुत दिननके बिछडे पाये । भाग भले घर बैठिहिं आये ॥ चरन लागि कहैं बरियाई । प्रेम प्रीति राखूं उरझाई ॥ आय बसो मन मंदिर चोखे । कहैं कवीर परो मति धोखे ॥
राग कान्हडा ४—अब मोहि राम भरोसो तोरा । को काहू का करै निहोरा ॥ टेक ॥ जाके हरि अस ठाकुर भाई । सो क्यों अनत पुकारन जाई ॥ तीन लोक जाके सिर भारा । क्यों न करे जनकी प्रतिपारा ॥ कहैं कवीर सेवो बनवारी । सींचो मूल फले सब डारी ॥
(७५०)
कवीरपंथी-
राग कान्हड़ा ५-चल मन हरि चटसाल पढाऊँ । जात कुमार मारग लाऊँ ॥ टे० ॥ पाटी प्रीति सुरतिकी लेखन, रराँ मम्मा दोय अंक लिखाऊँ ॥ गुरुकी साटि शब्दकी औपटि, बिच बिच सहज समाधि लगाऊँ ॥ बावन भित्र रहत जोइ अच्छर, सो पद परसि बहुरि नहिँ आऊँ ॥ कहैं कवीर सुनो भाइ साधो, हेलो मारि कहि समझाऊँ ॥
राग कान्हड़ा ६-नाम मोर पूंजी नाम मोर धना । या पूंजीसे लगो मेरो मना ॥ टेक ॥ या पूंजी है अगम अपारा । कोई इक बनिजे साहूकारा ॥ अगिन जरे न ईली खाय । राजा डंडे न चोर लेजाय ॥ खेती करै न बनिजन जाय । नाम खजीना वैठा खाय ॥ कागद चढै न कृता होय । कहैं कवीर धन पाया सोय ॥
राग कान्हड़ा ७-भजन विन तीनों पन विगडे । चेतो रे नर जीवन थोडा, काल करत नित झगडे ॥ टे० ॥ बालपना बालपन खोये, अरू तरुण पन टेडे । बिरध भयो तब काल गरासे, अंध होय निवेडे ॥ मन भुजंग मायाको मातो, बोलत है करडे । जबहिँ हंसा देत पयाना, मांढी होय निवडे ॥ मानुष देह धरि काहेको, पशु न भया कहुरे । कहैं कवीर सुनो भाई संतो, कोई संतहि ध्यान धरे ॥
राग कान्हड़ा ८-अब देखो विसरी गया इहाँ आय । अति मंद मस्त मोह तन छाकै, फिरत लटेम कराय ॥ टेक ॥ जननीके गरभ उरध मुख झूल्यो, तहाँ रहै दुख पाय ॥ अति संकट तहाँ भाठी औटे, मलमै मूँड गडाय ॥ ता दिन तेरे कौन संग था, खान पान पहुँचाय । जाको पिता प्रान पति कहिये, ताको क्यों विसराय ॥ अति मति हीन बुधि तुच्छ तनमै, सब विधि हाथ पराये । कहैं कवीर मृग सर लागा, वालि विषैके खाये ॥
शब्दावली
(७५१)
राग कान्हडा ९-जाय रे दिनहिं दिन देहा । करिले बावरे राम सनेहा ॥ टेक ॥ बालापन गयो जीवन जासी । जरा मरन भव संकट आसी ॥ पलटे केस नयन जल छावे । मुखर खेत बुढापो आवे ॥ राम कहत लज्जा नहिं कीजै । पल पल आयु घटै तन छीजै ॥ लज्जा कहै मैं जमकी दासी । एक हाथ सुदूर दूजे फांसी ॥ कहैं कवीर तिन सरबस हारा । राम नाम जिन मना विसारा ॥
राग कान्हडा १०-कहा मांगू कछु थिर न रहाई । देखत नैन चला जग जाई ॥ टे० ॥ एक लख पुत्र सवा लख नाती । ता रावन घर दिया न बाती ॥ लंका सो कोट समुद्रसी खाई । ता रावनकी खबर न पाई ॥ सोनेदा महल रूपेदा छाजा । छोड़ि चला नगरीका राजा ॥ को कर महल को कर टाटी । उड़ि गया हंस पड़ी रहि मांटी ॥ आवत संग न जात संवाती । कहा भयो द्वारे बांधे हाथी ॥ कहैं कवीर अन्तकी बारी । हाथ झारि जस चले जुआरी ॥
राग कान्हडा ११-सोइरे अजीत जो कालहिं जीते ॥ टेक ॥ निरख होय तो शब्दहिं पावे, शब्द कहै मोहि दिठ करि लीजै ॥ बहुरि नहिं कछु दोष हमारा, अपने अवगुन आपही छीजै ॥ जारसो रहै खसम सों हसे, कहो सुहागि कैसे कै दीजै ॥ जार रुठे तब जाय मनावे, हमहिं देखि कछु परदा दीजै ॥ सब कोइ साधु कहे चलनेको, चल न सके तेहि कैसे कीजै ॥ इन बातन सो अमर घर चाहे, कहो अमर घर कैसे दीजै ॥ यही उछाह कहै सब कोई, जानि बूझिकै अंतर भीजै ॥ कहैं कवीर सोई हंस निरखियो, शब्द हमारा हमहिं पतीजै ॥
राग कान्हडा १२-कहा भयो मुख राम कह्यो रे । ज्यों भुजंग मंत्रन वस कीनो, अन्तर्गत वाको विष न गयोरै ॥ टेक ॥ माला तिलक भेष धरि हरिको, मांगत मांगत जन्म गयोरै ॥ जैसे बधिक
(७५२)
कवीरपंथी—
ओट टाटी की, बहु जीवनको दाव दियोरे॥ अन्तर कपट बचन सुख शीतल, तन अधीन मन तऊ न नयोर॥ कहैं कवीर ताको सग न कीजे, विन विवेक जिन भेष लयोर॥
राग कान्हडा १३—जो तैं हिरदयमें राम न जान्यो। तसबी गहे कहा भौ भाई, कहा कितेब बखान्यो॥ टेक॥ स्याही गई सफेदी आई, दिल सफेद अजहुं न हुआ॥ हुजरे निमाज बांग क्या दीजै, हुजरे भीतर पैठि सुआ॥ आन्यो जीव पछाड्यो परबस, गला काटि सिर भार लिया॥ जीवता मारि मूदौर किया है, ताको कहै हलाल किया॥ अपना किया न बूझै सुगधा, कहै हमारो बडेन किया॥ उनकी स्नूत तुम्हारी गर्दन, जिन तुमको उपदेश दिया॥ जाहि मांसकुं तुम पाक कहत हो, ताकी उत्पत्ति सुन भाई॥ रज वीरजते मांस उत्पाने, मांस न पाक लखाई॥ वेद पठै पठि पंडित भूला, काजी पठि रहु कुराना॥ कहैं कवीर ते नर नरक पड़ेगे, जिन आतम राम न जाना॥
राग कान्हडा १४—कहा पंडिताई भूलोरे प्रानी। सतनाम जप अमृत वानी॥ टेक॥ घरही पंडित युधिष्ठिर केरा। काहे न घंट बज्यो तेहि वेरा॥ कोटिन विप्र जिमायो राजा। सुपच भगत विन घंट न बाजा॥ पठिलिय भारत चारिवों वेदा। विन सतगुरु नहिं पायो भेदा॥ सुपच भगत कीनी जिवनारा। बाज्यो घंट भई झनकारा॥ कहैं कवीर हम सब कहु जाना। देखत गनिका चढी विमाना॥
राग कान्हडा १५—सतगुरु अहरिन अजब बनाया। एक मठीके दस दरवाजा, सरब तत जहैं लपटाया॥ टे०॥ अहरन आनि अग्निमें पटकी, घनवां पांच लगाया॥ सुरति सँडासी हरष हथोडा, अकिल आँकडा लाया॥ स्वांस उस्वांसकी नाल बनाई, उलटा
शब्दावली
(७५३)
पवन चलाया ॥ करम काठका कोयला झोंक्यो, अकरम कीट जलाया ॥ मन लोहाको इस विधि ताया, ताव भला बनि आया ॥ सील साँचकी चाँडी रोपी, तामैं आनि बुझाया ॥ तोल न मोल हलकों नहिं भारी, ऐसा रतन निपजाया ॥ कहैं कवीर बलि बलि सतगुरुकी, लोहा करि पारस लाया ॥
राग कान्हडा १६-मन नटनीको निरत विचारी ॥ टे० ॥ गागरि पाँच धरी शिर ऊपर, वरत चढी यक नारी ॥ तन मन दियो बरतके ऊपर जैसे भरे पनिहारी ॥ आडौ बाँस सलियाकर तोलैं, दाबी पांव तर थारी ॥ आपन नाचै रिझावे जगको, आप जगतसों न्यारी ॥ गुरुका शब्द गहै कर दंतै, कटिसों बाँधि कटारी ॥ नौ नारी मिलि खेल रचो है, तन मन हो हुशियारी ॥ जैसे मकडी उलटि तारसों, पलटि गहै फिर तारी ॥ ऐसी कला नाच मन मोरा, तरत न लागे बारी ॥ तीन लोक चौथे मतवारी, छर अच्छर सो न्यारी ॥ कहैं कवीर सुनो भाइ साधो, पंचे रीझ भई भारी ॥
राग कान्हडा १७-अब हम सकल कुसल कर जाना । सती भई जब सहज समाना ॥ टेक ॥ तनमें होती कोटि उपाधी । उलटि भई सुख सहज समाधी ॥ बैरी उलट भया है भिकता, साकट उलटि भयो है संता ॥ जमतें उलटि भया है रामा । दुख विसरा सुख किय विसरामा ॥ आप जानि उलटि लै आया । तब नहिं व्यापै तीनों तापा ॥ अब मन उलटि सनातन हुआ । तब हम जाना जीवत मूवा ॥ कहैं कवीर सुख सहज समाजै । आप डरुं नहिं और डराऊं ॥
राग कान्हडा १८-अब हम एक एक करि जाना । दूजा कहै ताहिको दोजक, जिन तू नहिं पहिचाना ॥ टेक ॥ पवन पावक पानी पृथ्वी नभ, एक जोति संसारा ॥ एकहि खास घडे बहु