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भारतकोश
कबीरपंथी शब्दावली

कबीरपंथी शब्दावली

Kabirpanthi Shabdavali

स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा

स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)

Devanagarihipublished968 पृष्ठ

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शब्दावली

(७५१)

राग कान्हडा ९-जाय रे दिनहिं दिन देहा । करिले बावरे राम सनेहा ॥ टेक ॥ बालापन गयो जीवन जासी । जरा मरन भव संकट आसी ॥ पलटे केस नयन जल छावे । मुखर खेत बुढापो आवे ॥ राम कहत लज्जा नहिं कीजै । पल पल आयु घटै तन छीजै ॥ लज्जा कहै मैं जमकी दासी । एक हाथ सुदूर दूजे फांसी ॥ कहैं कवीर तिन सरबस हारा । राम नाम जिन मना विसारा ॥

राग कान्हडा १०-कहा मांगू कछु थिर न रहाई । देखत नैन चला जग जाई ॥ टे० ॥ एक लख पुत्र सवा लख नाती । ता रावन घर दिया न बाती ॥ लंका सो कोट समुद्रसी खाई । ता रावनकी खबर न पाई ॥ सोनेदा महल रूपेदा छाजा । छोड़ि चला नगरीका राजा ॥ को कर महल को कर टाटी । उड़ि गया हंस पड़ी रहि मांटी ॥ आवत संग न जात संवाती । कहा भयो द्वारे बांधे हाथी ॥ कहैं कवीर अन्तकी बारी । हाथ झारि जस चले जुआरी ॥

राग कान्हडा ११-सोइरे अजीत जो कालहिं जीते ॥ टेक ॥ निरख होय तो शब्दहिं पावे, शब्द कहै मोहि दिठ करि लीजै ॥ बहुरि नहिं कछु दोष हमारा, अपने अवगुन आपही छीजै ॥ जारसो रहै खसम सों हसे, कहो सुहागि कैसे कै दीजै ॥ जार रुठे तब जाय मनावे, हमहिं देखि कछु परदा दीजै ॥ सब कोइ साधु कहे चलनेको, चल न सके तेहि कैसे कीजै ॥ इन बातन सो अमर घर चाहे, कहो अमर घर कैसे दीजै ॥ यही उछाह कहै सब कोई, जानि बूझिकै अंतर भीजै ॥ कहैं कवीर सोई हंस निरखियो, शब्द हमारा हमहिं पतीजै ॥

राग कान्हडा १२-कहा भयो मुख राम कह्यो रे । ज्यों भुजंग मंत्रन वस कीनो, अन्तर्गत वाको विष न गयोरै ॥ टेक ॥ माला तिलक भेष धरि हरिको, मांगत मांगत जन्म गयोरै ॥ जैसे बधिक

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