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भारतकोश
कबीरपंथी शब्दावली

कबीरपंथी शब्दावली

Kabirpanthi Shabdavali

स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा

स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)

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पृष्ठ 758

(७४४)

कवीरपंथी-

राग कल्याण प्रारम्भः ।

राग कल्याण १-पल पलबलि मैं गुरुके जाऊँ, जिनरे किरपा करि नाम दियो है, गुरुकी पटतर काहि लगाऊँ ॥ टेक ॥ सुखदेव दियो वैकुंठ फेर । बिन गुरु नाहि भयो निवेर । जनकको जाय कियो गुरुदेव । ताहीते पायो अलख अभेव ॥ नारद निंदा गुरुकी कीन्ही । ताहीते चौरासी दीन्ही ॥ रंचक उन गुरु दया जु करी । गुरु प्रताप चौरासी टरी ॥ गुरु समान दाता नहि कोय । भगति दान गुरु दियो मोय ॥ कहैं कवीर सुनो नर लोई । गुरुको भगति विनु मुक्ति न होई ॥

राग कल्याण २-गुरु मेरे बुटिया अजब पिलाई । भया सचेत मिटी दुचित्ताई ॥ टे० ॥ नाम औषधि रसन कटोरी । ताहिके पीवत कुमति गढ़ मोरी ॥ सुषुमनिके घर भयो अनंदा । मिटि गई तिमिर उदय भौ चंदा ॥ सुरति सुहागिनि भरि भरि लाई । पीवत अमृत कबहुँ न अघाई ॥ सुषुमनि सुरति भई मतवारी । कबहुँ न लागे विषय सुमारी ॥ ब्रह्मा नारद रहे लुभाई । खोजत शम्भु ध्यान लगाई ॥ प्रेम प्रीति भरि पिया जु कोई । कहैं कवीर अमर भै सोई ॥

राग कल्याण ३-भाग बडे जाके संत पधारै । करि सुमिरन भवसागर तारे ॥ टे० ॥ आये संतको आदर कीजै चरन धोय चरनामृत लीजै ॥ येही संत हैं पर उपकारी । सरन आयेको लेत उबारी ॥ साहबको घर संतन माँहिं । साहेब संत कछु अन्तर नाहिं ॥ कहैं कवीर संतन भले पधारै । जनम जनमके कारज सारै ॥

राग कल्याण ४-जबते मन प्रतीति भयी । दिन दिन अवगुन छूटन लागे, बाढन लागी प्रीति नयी ॥ टे० ॥ सुखसागर सुख