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भारतकोश
कबीरपंथी शब्दावली

कबीरपंथी शब्दावली

Kabirpanthi Shabdavali

स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा

स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)

Devanagarihipublished968 पृष्ठ

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शब्दावली

(७४३)

सरग पाताल भूमाहीं । बिना ब्रह्म खाली नहीं कितहुँ, नरक पड़े सो काहीं ॥ अन समझे को नरक सरग है, ततदरसीको नाहीं । जा डरसो संसार डरत है, सो डर हमरे नाहीं ॥ पाप पून्यकी कहेँ न आशा, सरग नरक नहीं जाऊँ ॥ कहै कवीर सुनो भाई साधो, जहाँ पद तहाँ ठहराऊँ ॥

गौरी ४४-भगतकी हांसी करो मत कोई । जाको हँसे महा दुख होई ॥ टेक ॥ पहिली हांसी करी हिरनाकुश, नखसे उदर विदारो । बाँह पकड़ि भुजा उपाडी, ले धरतीमें डारो । दूजो हांसी रावन कीन्ही जनम तीन तिहिँ मारो । भगत विभीषण राज दियो है, अजहुँ टरत न टारो ॥ भीषम करन द्वैत दुयोधन, ये हांसी करि हारे । कौरव कुटुम्ब निकंदन कीन्हो, भगत चक्रसे मारे ॥ जिन जिन हांसी करी भगतकी, सो २ नर नरक सिधारे ॥ तिन पतितनको नरक दियो है, कहैं कवीर पुकारे ॥

गौरी ४५-हरितो भगतनके बस भाई । जाति वरन कुल रीझत नाहीं, ना रीझे चतुराई ॥ टेक ॥ सेवरी जाति भीलनी होती, वेर जूठले आई । प्रीति जानि वाके फल पाये, तीनों लोक बंढाई ॥ करमा कद आचार कियो थो, हरिसे प्रीति लगाई ॥ छप्पन भोग पाछे आरोगे, पहिले खिचडी खाई ॥ तिर लोचन और नामा पीपा, हरि पेठे विकराई । सेन रूप होय मर्दन कीन्हो आप भये हरि नाई ॥ सहस्र अठासी जग्यमें जीमें, तबहुँ घंट नहिरे बाज्यो । कहैं कवीर स्वप्नचके जीमे, संख मगन होय गाज्यो ॥

॥ इति गौरी ॥

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