कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
शब्दावली
(७४३)
सरग पाताल भूमाहीं । बिना ब्रह्म खाली नहीं कितहुँ, नरक पड़े सो काहीं ॥ अन समझे को नरक सरग है, ततदरसीको नाहीं । जा डरसो संसार डरत है, सो डर हमरे नाहीं ॥ पाप पून्यकी कहेँ न आशा, सरग नरक नहीं जाऊँ ॥ कहै कवीर सुनो भाई साधो, जहाँ पद तहाँ ठहराऊँ ॥
गौरी ४४-भगतकी हांसी करो मत कोई । जाको हँसे महा दुख होई ॥ टेक ॥ पहिली हांसी करी हिरनाकुश, नखसे उदर विदारो । बाँह पकड़ि भुजा उपाडी, ले धरतीमें डारो । दूजो हांसी रावन कीन्ही जनम तीन तिहिँ मारो । भगत विभीषण राज दियो है, अजहुँ टरत न टारो ॥ भीषम करन द्वैत दुयोधन, ये हांसी करि हारे । कौरव कुटुम्ब निकंदन कीन्हो, भगत चक्रसे मारे ॥ जिन जिन हांसी करी भगतकी, सो २ नर नरक सिधारे ॥ तिन पतितनको नरक दियो है, कहैं कवीर पुकारे ॥
गौरी ४५-हरितो भगतनके बस भाई । जाति वरन कुल रीझत नाहीं, ना रीझे चतुराई ॥ टेक ॥ सेवरी जाति भीलनी होती, वेर जूठले आई । प्रीति जानि वाके फल पाये, तीनों लोक बंढाई ॥ करमा कद आचार कियो थो, हरिसे प्रीति लगाई ॥ छप्पन भोग पाछे आरोगे, पहिले खिचडी खाई ॥ तिर लोचन और नामा पीपा, हरि पेठे विकराई । सेन रूप होय मर्दन कीन्हो आप भये हरि नाई ॥ सहस्र अठासी जग्यमें जीमें, तबहुँ घंट नहिरे बाज्यो । कहैं कवीर स्वप्नचके जीमे, संख मगन होय गाज्यो ॥
॥ इति गौरी ॥
(७४४)
कवीरपंथी-
राग कल्याण प्रारम्भः ।
राग कल्याण १-पल पलबलि मैं गुरुके जाऊँ, जिनरे किरपा करि नाम दियो है, गुरुकी पटतर काहि लगाऊँ ॥ टेक ॥ सुखदेव दियो वैकुंठ फेर । बिन गुरु नाहि भयो निवेर । जनकको जाय कियो गुरुदेव । ताहीते पायो अलख अभेव ॥ नारद निंदा गुरुकी कीन्ही । ताहीते चौरासी दीन्ही ॥ रंचक उन गुरु दया जु करी । गुरु प्रताप चौरासी टरी ॥ गुरु समान दाता नहि कोय । भगति दान गुरु दियो मोय ॥ कहैं कवीर सुनो नर लोई । गुरुको भगति विनु मुक्ति न होई ॥
राग कल्याण २-गुरु मेरे बुटिया अजब पिलाई । भया सचेत मिटी दुचित्ताई ॥ टे० ॥ नाम औषधि रसन कटोरी । ताहिके पीवत कुमति गढ़ मोरी ॥ सुषुमनिके घर भयो अनंदा । मिटि गई तिमिर उदय भौ चंदा ॥ सुरति सुहागिनि भरि भरि लाई । पीवत अमृत कबहुँ न अघाई ॥ सुषुमनि सुरति भई मतवारी । कबहुँ न लागे विषय सुमारी ॥ ब्रह्मा नारद रहे लुभाई । खोजत शम्भु ध्यान लगाई ॥ प्रेम प्रीति भरि पिया जु कोई । कहैं कवीर अमर भै सोई ॥
राग कल्याण ३-भाग बडे जाके संत पधारै । करि सुमिरन भवसागर तारे ॥ टे० ॥ आये संतको आदर कीजै चरन धोय चरनामृत लीजै ॥ येही संत हैं पर उपकारी । सरन आयेको लेत उबारी ॥ साहबको घर संतन माँहिं । साहेब संत कछु अन्तर नाहिं ॥ कहैं कवीर संतन भले पधारै । जनम जनमके कारज सारै ॥
राग कल्याण ४-जबते मन प्रतीति भयी । दिन दिन अवगुन छूटन लागे, बाढन लागी प्रीति नयी ॥ टे० ॥ सुखसागर सुख
शब्दावली
(७४५)
मंजन कीन्ही, स्वाती बूंद निज सीपलई । मानिकपुरमें मोती निपजे, हीरा हंसा भेट भई ॥ सुरति दोऊ ज्ञान जोहरी, निरखि परखि निज वस्तु लई । थोड़ा बनिजन वस्तु भइ भारी, उपजन लागी लाल मयी ॥ पायो दाव भाव बनि आयो, सतगुरु मिले बड साहु सही ॥ बाढ़ी बटे घटे नहि कबहुं परम तत्त्व ले मनो-तही ॥ अगम निगम तत खोज निरंतर, गुरु नाम निज मूल दयी । कहैं कवीर दया सतगुरुकी, हती कुमति सो दूर गयी ॥
राग कल्याण ५-सुमिरन सार साधो सुमिरन सार । सुमिरि सुमिरि जन उतरे पार ॥ टेक ॥ सुमिरनही शिव शंकर जोगी । सुमिरनही इंद्रादिक भोगी ॥ सुमिरनही प्रह्लाद उबारे । स्वप्न फाड़ि हिरनाकुश मारे ॥ सुमिरनही ध्रुव निहचल कियो । सुमिरन राज विभीषण दियो ॥ सुमिरन द्रोपदीचीर बढायो । गजकै काज पयादेइ धायो ॥ सुमिरन नाम देवकी छानि छवाई । मंदिर फेरचो गऊ जिवाई ॥ सुमिरन नामदेवकू दरशन दियो । बांह पकडी मंदिरमें लियो ॥ कहैं कवीर सुमिरन है ऐसा । अपनी करनी करो कोइ जैसा ॥
राग कल्याण ६-करन मतै सो करै करता । और सकलका झूठ मता ॥ टे० ॥ पूतना कहाँ कमाई कीन्ही, अघ मोचन जाँकी दूरि गता ॥ वाहि वैकुंठ पाताल पठायो, बलि राजामें कौन खता ॥ कबहुँक सैलपर सागर, कबहुँक सोखे सब सलिता ॥ कबहुँ भूपतितै करै भिषारी, तनहाँके सिर छत्र धरता ॥ एक रहै मायामों शीतल, एक फिरे माया जलता ॥ एकनके घर बैठेही आवे, एक फिरे घर २ मँगता ॥ एक पुत्रकौ नृप पचिहारे, जाके हती बहुत बनिता ॥ साठ पुत्र नारदकी दीन्हा, माया त्यागि फिरे विर-
(७४६)
कवीरपंथी—
कता ॥ पंच भरतारीकी लब्धा राखी, लंछन लगायो पति वरता॥ कहैं कवीर सुनो भाई साधो वा साहबकी अगम गता ॥
राग कल्याण ७—सब अवगुनके सिर अभिमान । दुरजोधनके मेवा त्यागी, दासी सुत घर आये, भगवान ॥ टे० ॥ याही चूक बलि गयो रसातल, मारचो बालि एकहि बान ॥ याही चूक गयो लंकापति, काटी शीश दसरथ सुत आन ॥ सुखदेव मुनिसे को बड होई, इन्द्री जीति बिष डारचो भान ॥ वैकुंठमें आदर नाहिं, कृपा भई गुरु लागे कान ॥ राजसू जग्य रच्यो पंडवनके, सुर नर मुनि कियो जलपान ॥ संख पंचायन जबहीं बाज्यो, स्वपच भगत रस लीयो सान ॥ जोग रु जग्य नेम व्रत संजम, चारिवेद अरु पढैं पुरान । कहैं कवीर जब लगि मैं मेरी, तब लगि भगति नहीं परमान ॥
राग कल्याण ८—जाहूँ मैं या जगकी चतुराई । प्रभुजीको नाम विसरजन कियो, जिन या जलसो जुगति बनायी ॥ टे० ॥ जोरत दाम काम अपनेको, हम खेहैं लडक व्योसायी । सो धन चोर हाकमा लोनो, रहो सहो ले जात जमाई । या माया कलवारिन कहिये, मद पिवाय राखे बौराई एक जे परो धूरिमें लेटे, एक कहैं चौका देरी माई ॥ या माया सुरनर मुनि बहके दयी देवता सब धरि खायी । कोइ कोइ लागि रहै गुरु चरना, तिनको माया फिरि पछिताई ॥ कहैं कवीर सुनो भाई साधो, ले फांसी हमहुँ पै आई । गुरु प्रताप साधुकी संगति, अब हम रहे निशान बजाई ॥
राग कल्याण ९—अजहूँ प्यारे चेत मना, समुझि विन जीवना कछु ना ॥ टे० ॥ धन जीवन द्वारा अरु बारा, ये तो रैनका है सुपना । तन सुन्दर छवि देख न भूलो, यह तन रहन न एक
शब्दावली
(७४७)
छिन्ना ॥ जेते तेते ध्यान लगावे, अँखियन देखा सरवन सुना ॥ युमिरन भजन कैरे सब कोई, विन दृश्शन सबही भरमना ॥ शब्द विचारि रहो तुम सन्मुख, अखंड स्वरूपी अजर घना । कहैं कवीर आप लखि आपे, जुग जुग शब्द स्रूप बना ॥
राग कल्याण १०-मैं बौरी मेरा राम भतार । जा कारन रचि कहूँ सिंगार ॥ टेक ॥ जैसे धोबिया रज मिलि धोवे, हमरा पाप थूँ निंदक खोवे ॥ निंदक मेरा प्रान अधार । विन वेगार चलावे भार ॥ निंदक मेरा माय अरु बाप । जनम जनमका काटे पाप ॥ कहैं कवीर निंदक बलिहारी । आप रहे जन पार उतारनी ॥
राग कल्याण ११-साधू घट शील संतोष विराजे ॥ दया स्वरूप सकल जीवपै, शब्द सरोतर गाजै ॥ टेक ॥ जहाँ जहाँ मनकी मनोरथ दौड़े, ताके संग न धावो । आसन अटल छिमा धीरज धरि, तन तजि अनत न जावो ॥ सत्यवादी सतगुरु पहिचाने, आतम दिष्टि परगासा ॥ निरमल दसा सरब सुख- दाई, आनंद घर रहिवासा ॥ सूधी चाल सदा शीतल गति, निसि दिन सबद विलासा । कहैं कवीर ऐसे संत विवेकी, जहाँ हमारा वासा ॥
राग कल्याण १२-जनको दीनता जो आवे । सौ पद देऊँ दास अपनेको, ब्रह्मादिक नहीं पावे ॥ टेक ॥ औरनको पूरा करि जाने, आपन बोझ कहावै । अवधू तुमसे सत्य कहत हौं, सो मेरे मन भावे ॥ एकै ब्रह्म सकल घट देखै, दुविधा दूरि कहावै ॥ इन पांचन तैं तोरि सनेहा, जब गोविंद गुन गावे ॥ होय आधीन प्रेम लवलीन, कुल अभिमान मिटावै ॥ सहज सुन्यमें रहै समाई पठि गुन सब विसरावै ॥ गुरुकी दया साधुकी संगति,
(७४८)
कबीरपंथी—
भाव भगति चित लावै । कहैं कवीर सुनो भाई साधो, क्यों न परम पद पावै ॥
राग कल्याण १३-भजनमें होत आनंद आनंद । बरसत शब्द अमीके बादल, भीजत है कोइ संत ॥ टे० ॥ अगर वरन जहाँ ततकी नदियां, मानो धारा गंग । करि अस्नान मगन होय बैठे, चढ़ तब शब्दको रंग ॥ रोम रोम जाके अमृत भीना, पारस परसत अंग । शब्द गहो जिव संशय नाहिं, साहेब है तेरे संग ॥ स्वासा सार रचो मेरे साहिब, जहाँ नहिं माया सोहंग । कहैं कवीर सुनो भाई साधो, जपो सोहंग सोहंग ॥
राग कल्याण १४-क्यों न हमारे आये केसो, क्यों न हमारे आये । षड्रस व्यंजन छाड़िरसोई, साग विडुर घर पाये ॥ टे० ॥ जहाँ अभिमान तहाँ हम नाहीं, वह व्यंजन विष लागे । सोई मुनिजन पूरा कहिये, जो अभिमानीको त्यागे ॥ जाति हीन जाके कुल नाहिं, है दासीको जायो । जाकी टपरिया तुम जइ बैठे, कहा बड़ापन पायो ॥ सत सत वचन कहो दुयौधन, सुन लो बात हमारी । विडुर हमारे प्रानसों प्यारे, तुम विषिया बेकारी ॥ पुरातन कथा तुम्हारी प्रभुजी, वनमें छाछ मंगाई ॥ ग्वालनके संग भोजन करते, सो मति तुम मैं आई ॥ प्रेम प्रीतिके हम हैं भूलें, अभिमानी नहिं भावै । कहैं कवीर साधुकी महिमा, हरि अपने मुख गावै ॥
राग कल्याण १५-कौन तुम्हारे आवै राजा, कौन तुम्हारे आवै । ऐसो हेतु विडुरको कहिये, सोई गरीब मोहि भावै ॥ टे० ॥ तुमरो दूध विडुरको पानी, अमृत करि करि जानी । तुमरी मेवा विडुरकी भाजी, रस भर एक न आनी ॥ भोजन तो दोऊ विधि राजा, विपत्ति परकी प्रीती । तुम्हारे प्रीति न हमरे
शब्दावली
(७४९)
आपदा, एही बड़ी अनरीती ॥ स्वीर समान साग हम पाये, गावत रैन बिहाई। कहैं कवीर दासकी महिमा, आप श्रीमुख गाई॥
राग कान्हरा आरम्भः ।
राग कान्हरा १—जा कुल भक्त भागवत होई। गिनिय न अवरन बरन रंक धन, विमल वंस मानिये निज सोई ॥ टेक ॥ ब्राह्मन छत्री वैश्य सूदलौ, नारि चंडाल मलेच्छ जो होई । होय पुनी तजे भगवंता, आप तरे तारे कुल दोई॥ धन वही गांव ठांव सोह पावन, होत पुनीत संगके लोई । सुर पंडित अरु निरपति पादसाह, भगत बरोबर तुले न कोई ॥ गहत सार पद पीवत ग्यान रस, तजि संसार जानि जस छोई । पुरइन पत्र समान रहत जल, कहैं कवीर जगमें जन सोई ॥
राग कान्हरा २—बहुत दिननसों प्रीतम पाये। भाग भले घर बैठिहिं आये ॥ टे० ॥ मंगल चारि मांहि मन राखूं । राम रसायन रसना चाखूं ॥ मंदिर माहिं भयो उजियारा । ले सूती पि्या अपना पि्यारा ॥ मैं जो निरासी जो निधि पाई । हमरो कहा पि्या तुमरी बड़ाई ॥ कहैं कवीर हम कछु नहिं कीनो । सहज सुहाग राम मोहि दीनों ॥
राग कान्हडा ३—अब तोहिं जान न देऊँ रामा प्यारे । ज्यों भावे त्यों रहो हमारे ॥ टे० ॥ बहुत दिननके बिछडे पाये । भाग भले घर बैठिहिं आये ॥ चरन लागि कहैं बरियाई । प्रेम प्रीति राखूं उरझाई ॥ आय बसो मन मंदिर चोखे । कहैं कवीर परो मति धोखे ॥
राग कान्हडा ४—अब मोहि राम भरोसो तोरा । को काहू का करै निहोरा ॥ टेक ॥ जाके हरि अस ठाकुर भाई । सो क्यों अनत पुकारन जाई ॥ तीन लोक जाके सिर भारा । क्यों न करे जनकी प्रतिपारा ॥ कहैं कवीर सेवो बनवारी । सींचो मूल फले सब डारी ॥
(७५०)
कवीरपंथी-
राग कान्हड़ा ५-चल मन हरि चटसाल पढाऊँ । जात कुमार मारग लाऊँ ॥ टे० ॥ पाटी प्रीति सुरतिकी लेखन, रराँ मम्मा दोय अंक लिखाऊँ ॥ गुरुकी साटि शब्दकी औपटि, बिच बिच सहज समाधि लगाऊँ ॥ बावन भित्र रहत जोइ अच्छर, सो पद परसि बहुरि नहिँ आऊँ ॥ कहैं कवीर सुनो भाइ साधो, हेलो मारि कहि समझाऊँ ॥
राग कान्हड़ा ६-नाम मोर पूंजी नाम मोर धना । या पूंजीसे लगो मेरो मना ॥ टेक ॥ या पूंजी है अगम अपारा । कोई इक बनिजे साहूकारा ॥ अगिन जरे न ईली खाय । राजा डंडे न चोर लेजाय ॥ खेती करै न बनिजन जाय । नाम खजीना वैठा खाय ॥ कागद चढै न कृता होय । कहैं कवीर धन पाया सोय ॥
राग कान्हड़ा ७-भजन विन तीनों पन विगडे । चेतो रे नर जीवन थोडा, काल करत नित झगडे ॥ टे० ॥ बालपना बालपन खोये, अरू तरुण पन टेडे । बिरध भयो तब काल गरासे, अंध होय निवेडे ॥ मन भुजंग मायाको मातो, बोलत है करडे । जबहिँ हंसा देत पयाना, मांढी होय निवडे ॥ मानुष देह धरि काहेको, पशु न भया कहुरे । कहैं कवीर सुनो भाई संतो, कोई संतहि ध्यान धरे ॥
राग कान्हड़ा ८-अब देखो विसरी गया इहाँ आय । अति मंद मस्त मोह तन छाकै, फिरत लटेम कराय ॥ टेक ॥ जननीके गरभ उरध मुख झूल्यो, तहाँ रहै दुख पाय ॥ अति संकट तहाँ भाठी औटे, मलमै मूँड गडाय ॥ ता दिन तेरे कौन संग था, खान पान पहुँचाय । जाको पिता प्रान पति कहिये, ताको क्यों विसराय ॥ अति मति हीन बुधि तुच्छ तनमै, सब विधि हाथ पराये । कहैं कवीर मृग सर लागा, वालि विषैके खाये ॥
शब्दावली
(७५१)
राग कान्हडा ९-जाय रे दिनहिं दिन देहा । करिले बावरे राम सनेहा ॥ टेक ॥ बालापन गयो जीवन जासी । जरा मरन भव संकट आसी ॥ पलटे केस नयन जल छावे । मुखर खेत बुढापो आवे ॥ राम कहत लज्जा नहिं कीजै । पल पल आयु घटै तन छीजै ॥ लज्जा कहै मैं जमकी दासी । एक हाथ सुदूर दूजे फांसी ॥ कहैं कवीर तिन सरबस हारा । राम नाम जिन मना विसारा ॥
राग कान्हडा १०-कहा मांगू कछु थिर न रहाई । देखत नैन चला जग जाई ॥ टे० ॥ एक लख पुत्र सवा लख नाती । ता रावन घर दिया न बाती ॥ लंका सो कोट समुद्रसी खाई । ता रावनकी खबर न पाई ॥ सोनेदा महल रूपेदा छाजा । छोड़ि चला नगरीका राजा ॥ को कर महल को कर टाटी । उड़ि गया हंस पड़ी रहि मांटी ॥ आवत संग न जात संवाती । कहा भयो द्वारे बांधे हाथी ॥ कहैं कवीर अन्तकी बारी । हाथ झारि जस चले जुआरी ॥
राग कान्हडा ११-सोइरे अजीत जो कालहिं जीते ॥ टेक ॥ निरख होय तो शब्दहिं पावे, शब्द कहै मोहि दिठ करि लीजै ॥ बहुरि नहिं कछु दोष हमारा, अपने अवगुन आपही छीजै ॥ जारसो रहै खसम सों हसे, कहो सुहागि कैसे कै दीजै ॥ जार रुठे तब जाय मनावे, हमहिं देखि कछु परदा दीजै ॥ सब कोइ साधु कहे चलनेको, चल न सके तेहि कैसे कीजै ॥ इन बातन सो अमर घर चाहे, कहो अमर घर कैसे दीजै ॥ यही उछाह कहै सब कोई, जानि बूझिकै अंतर भीजै ॥ कहैं कवीर सोई हंस निरखियो, शब्द हमारा हमहिं पतीजै ॥
राग कान्हडा १२-कहा भयो मुख राम कह्यो रे । ज्यों भुजंग मंत्रन वस कीनो, अन्तर्गत वाको विष न गयोरै ॥ टेक ॥ माला तिलक भेष धरि हरिको, मांगत मांगत जन्म गयोरै ॥ जैसे बधिक
(७५२)
कवीरपंथी—
ओट टाटी की, बहु जीवनको दाव दियोरे॥ अन्तर कपट बचन सुख शीतल, तन अधीन मन तऊ न नयोर॥ कहैं कवीर ताको सग न कीजे, विन विवेक जिन भेष लयोर॥
राग कान्हडा १३—जो तैं हिरदयमें राम न जान्यो। तसबी गहे कहा भौ भाई, कहा कितेब बखान्यो॥ टेक॥ स्याही गई सफेदी आई, दिल सफेद अजहुं न हुआ॥ हुजरे निमाज बांग क्या दीजै, हुजरे भीतर पैठि सुआ॥ आन्यो जीव पछाड्यो परबस, गला काटि सिर भार लिया॥ जीवता मारि मूदौर किया है, ताको कहै हलाल किया॥ अपना किया न बूझै सुगधा, कहै हमारो बडेन किया॥ उनकी स्नूत तुम्हारी गर्दन, जिन तुमको उपदेश दिया॥ जाहि मांसकुं तुम पाक कहत हो, ताकी उत्पत्ति सुन भाई॥ रज वीरजते मांस उत्पाने, मांस न पाक लखाई॥ वेद पठै पठि पंडित भूला, काजी पठि रहु कुराना॥ कहैं कवीर ते नर नरक पड़ेगे, जिन आतम राम न जाना॥
राग कान्हडा १४—कहा पंडिताई भूलोरे प्रानी। सतनाम जप अमृत वानी॥ टेक॥ घरही पंडित युधिष्ठिर केरा। काहे न घंट बज्यो तेहि वेरा॥ कोटिन विप्र जिमायो राजा। सुपच भगत विन घंट न बाजा॥ पठिलिय भारत चारिवों वेदा। विन सतगुरु नहिं पायो भेदा॥ सुपच भगत कीनी जिवनारा। बाज्यो घंट भई झनकारा॥ कहैं कवीर हम सब कहु जाना। देखत गनिका चढी विमाना॥
राग कान्हडा १५—सतगुरु अहरिन अजब बनाया। एक मठीके दस दरवाजा, सरब तत जहैं लपटाया॥ टे०॥ अहरन आनि अग्निमें पटकी, घनवां पांच लगाया॥ सुरति सँडासी हरष हथोडा, अकिल आँकडा लाया॥ स्वांस उस्वांसकी नाल बनाई, उलटा
शब्दावली
(७५३)
पवन चलाया ॥ करम काठका कोयला झोंक्यो, अकरम कीट जलाया ॥ मन लोहाको इस विधि ताया, ताव भला बनि आया ॥ सील साँचकी चाँडी रोपी, तामैं आनि बुझाया ॥ तोल न मोल हलकों नहिं भारी, ऐसा रतन निपजाया ॥ कहैं कवीर बलि बलि सतगुरुकी, लोहा करि पारस लाया ॥
राग कान्हडा १६-मन नटनीको निरत विचारी ॥ टे० ॥ गागरि पाँच धरी शिर ऊपर, वरत चढी यक नारी ॥ तन मन दियो बरतके ऊपर जैसे भरे पनिहारी ॥ आडौ बाँस सलियाकर तोलैं, दाबी पांव तर थारी ॥ आपन नाचै रिझावे जगको, आप जगतसों न्यारी ॥ गुरुका शब्द गहै कर दंतै, कटिसों बाँधि कटारी ॥ नौ नारी मिलि खेल रचो है, तन मन हो हुशियारी ॥ जैसे मकडी उलटि तारसों, पलटि गहै फिर तारी ॥ ऐसी कला नाच मन मोरा, तरत न लागे बारी ॥ तीन लोक चौथे मतवारी, छर अच्छर सो न्यारी ॥ कहैं कवीर सुनो भाइ साधो, पंचे रीझ भई भारी ॥
राग कान्हडा १७-अब हम सकल कुसल कर जाना । सती भई जब सहज समाना ॥ टेक ॥ तनमें होती कोटि उपाधी । उलटि भई सुख सहज समाधी ॥ बैरी उलट भया है भिकता, साकट उलटि भयो है संता ॥ जमतें उलटि भया है रामा । दुख विसरा सुख किय विसरामा ॥ आप जानि उलटि लै आया । तब नहिं व्यापै तीनों तापा ॥ अब मन उलटि सनातन हुआ । तब हम जाना जीवत मूवा ॥ कहैं कवीर सुख सहज समाजै । आप डरुं नहिं और डराऊं ॥
राग कान्हडा १८-अब हम एक एक करि जाना । दूजा कहै ताहिको दोजक, जिन तू नहिं पहिचाना ॥ टेक ॥ पवन पावक पानी पृथ्वी नभ, एक जोति संसारा ॥ एकहि खास घडे बहु
(७५४)
कवीरपंथी—
भांडा, एकहि सिरजन हारा ॥ जैसे बढई काठहिं काटै, अगिन न काटै कोई । ऐसे व्यापक है सबहिनमें, रवि स्वरूप है सोई ॥ माया मोह करि जगत भुलाना, गरंथ देखि गरवाना ॥ होय निःशंक शंक नहिं व्यापै, कहैं कवीर दिवाना ॥
राग कान्हडा १९—अब मैं पायो ब्रह्म ग्यान । सहज समाधी मुखमें रहिबो, कोटि कलप विसरान ॥ टे० ॥ गुरु कृपाल कृपा जब कीन्हा, हृदया कमल बिगासा ॥ भागा भरम दसों दिसि सूझा, परम ज्योति परगासा ॥ मृतक उठी धनुष कर लीन्हा, काल अहेरी भागा ॥ उदसिया सूर निसि किया प्याना, सोवतते तब जागा ॥ अविगत अकल अनुपम देखा, कहता कहो न जाई ॥ सेन करै मनही मन राखे, गुंगे जान मिठाई ॥ पुहुप बिना एक तरुवर फलिया, बिन कर तूर बजाया ॥ नारी विना नीर घट भरिया, सहज रूपसो पाया ॥ देखत काँच भया मन कंचन, बिन बानी मन माना ॥ उडा विहंगम खोज न पाया, ज्यों जल जलहि समाना ॥ पूजो देव बहुरि नहिं पूजूं, नहाय उदक न नहाऊं ॥ भाग्या भरम एकहि कहता, आप बहुरि नहिं आऊं ॥ आपामें जब आप निरखिया, आपनमें आपहिं सूझा ॥ आपहिं कहत सुनत पुनि आपै, आपनमहिं आपा बूझा ॥ अपने परिचय लागी तारी, आपनमें आप समाना ॥ कहैं कवीर जे आप विचारे, मिटिगा आवन जाना ॥
राग कान्हडा २०—कौन मरे जन्मे को आई । सुरग नरक कौन गति पाई ॥ टेक ॥ पांच तत्त्व अविगत तैं उपजा, ये कै किया निवासा ॥ विछुरा तत्त्व फिर ततैं समाना, रेषहिं रही न आसा ॥ जलमें कुंभ कुंभमें जल है, बाहर भीतर पानी ॥ बिनसा कुंभ जल जलहि समाना, यह तत कथै सु ग्यानी ॥ आदे गगना मधे
शब्दावली
(७५५)
गगना, अंतहि गगना भाई॥ कहै कवीर करम काहे लागै, झूठौ सकल उपाई ॥
राग कान्हडा २१-ताहि विचारो पंडित लोई । जाके रूप बरन नहीं होई ॥ टेक ॥ पिंडमें प्रान कहाँ तैं आवै, सुवा जीव कहु कहाँ समावै ॥ इंद्री कहाँ करै विसरामा । सोँ कित गया जो कहता रामा ॥ पांच तत्त्व जहाँ सबद न स्वादा । अलख निरंजन विधी न वादा ॥ कहैं कवीर मन मनहि समाना । अगम निगम झूठ करि जाना ॥
राग कान्हडा २२-मन मेरा पंछी विलमत हीरारे । गुरुका सबद एक अजर अमर है, धूप छाँह दुख डुंद नहींरे ॥ टेक ॥ अमर लोक हंसनका वासा, सुख सागर सुख लेत तहीरे ॥ तहँके गण बहुरि नहीं आवै, करत अनंद दुख डुंद नहींरे ॥ कपटकी पांघ द्वारि निरवारो, जो ले उडत विकार महीरे ॥ सुरतिकी चाँच संवारि सबैरे, नाम चुगै चुग रहु ढिगहीरे ॥ निरमल नाम जपौ हिरदामैं, बार बार मैं तोहि कहीरे ॥ आवागमन मिटै तब तेरो, बहुरि न या जग जनम लहीरे ॥ सदा आनंद होत है वा घर, कबहुँ न होत उदास वहीरे ॥ कहैं कवीर जहाँ अधिक जाल नहीं, गुर मारग चलि जाय तहीरे ॥
राग कान्हडा २३-हरिजन हंस दिसा लिय डोलै । निरमल नाम चुनि चुनि बोले ॥ टे० ॥ मान सरोवर तटके बासी । राम चरन रति आन उदासी ॥ सुकताहल बिन चोंच न लावै । मौन रहे कै हरिगुन गावै ॥ कौआ कुबुधि निकट नहि आवै । सो हंसा निज दर्शन पावै ॥ कहैं कवीर सोई जन मेरा । नीर पीरका करै निवेरा ॥
राग कान्हडा २४-धोषैही धोषै डहकायो । समुझ न परी सनद सतगुरकी, बहु फंदनमें आय फदायो ॥ टे० ॥ सुवना एक अंबके
(७५६)
कवीरपंथी—
भोरे, सेवा करन आक की आयो॥ मारी चोंच जब हूओ उडायो, छीर शरीर अंग लपटायो ॥ रातो फूल देखि सेमलको सुवना, अंत वासों नेह लगायो ॥ मारी चोंच फल गयौ दूटि जब, उडि गयो तूर तिवारो आयो॥ उडि न सकै बहु परचो झोलमें, तातै नाम किर जुवो कहायो॥ कहै कवीर नीचकी संगति, जाति गई औ जनम गवाँयो ॥
राग कान्हडा २५—नाम विना धिक धिक नर नारी । कहाँ ते आय कियो संसारी ॥ टे० ॥ धिग वो रसना धिग वो कामा । चीन्हो नाहीं आतम रामा ॥ जा कुल पुत्र न भक्ति विचारी । जनमत क्यों न मरी महतारी॥ भरम सुचे सुच रही क्यों न बंझा । सुकरी रूप फिरै जग मंझा ॥ विधवा नारी करत सिंगारा । शोभा न पावे बिन भरतारा॥ वेश्याके पुत्र पिता कासो कहै । बिन गुर चेला ग्यान कैसे लहै ॥ राज बिना कैसी रजपूता । ग्यान बिना फोकट अवधूता ॥ जा कुल नाही हरिको दासा । सो कुल जानो ठाक पलासा ॥ कहैं कवीर भक्ति निज सारा । जो चीन्है सो उतरे पारा ॥
अथ राग काफी प्रारम्भः ।
राग काफी १—मैं तेरा दीदार हो दीदार दिवाना । घडी घडी तुझे देखा चाहों, सुनु साहेब रहमाना ॥ टे० ॥ पडा रहूँ दरबार तुम्हारे, ज्यू घरका बंदी जादा ॥ नेकी कुलाह लिये सिर ऊपर, गलै प्रेमका धागा ॥ हुआ अलमस्त खबरि नहीं तनकी, पिया जो प्रेम पियाला ॥ ठाढे होय करि झुकि झुकि परते, तैरे रंग मतवाला ॥ तसबी और निमाज न जावूँ, ना धरि जानौ रोजा ॥ बंग जिकिरि जबहीसँ विसरायो, जबते तन मन खोजा ॥ कहैं कवीर कजा
शब्दावली
(७५७)
नहीं करना, दिलहीसे दिल लाया ॥ मक्का हज् हिंय बिच हिंजरत, पूरा सुरसिद पाया ॥
राग काफी २—सतगुरु हो महाराजा मोपै राम रंग डारा ॥टेक॥ सबदकी चोट लगी मेरे तनमें, बेधि लिया तन सारा ॥ औषध मुरि कछुओ नहीं लागे, का करे वैद विचारा ॥ सुर नर मुनिजन पीर औलिया, कोइ न पावै पारा ॥ दास कवीर अब रंग रंगिया, सब रंगन रंग न्यारा ॥
राग काफी ३—दूर नहीं रहमाना कोई सबद विचारो, दूर नहीं रहमाना ॥ दूर भटक नहीं मरना रे यारो, नेरेही मन माना ॥टे०॥ एक जो खोजियारे, दूजा दिलहि समाना ॥ खोजत खोजत थकित भये हैं, हिन्दू मुसलमाना ॥ कहा पढ़ि लीये वेद पुराना, कहा कथ लीये ग्यानाना ॥ गुरु पीरसो पाईये तब, पहुँचे जाय ठिकाना ॥ सबद विचार रहो तुम सन्मुख, नेरैही मन माना ॥ बंदे तू करे बन्दगी, तोहि साहब पै जाना ॥ एकम एका होय रहा है, ज्यों जल जलहि समाना ॥ कहैं कवीर सुनो भाइ साधो, लगा निरंतर ध्यानाना ॥
राग काफी ४—नैना आशिक मेरा महबूब तूही है । जित देखु तित याही मूरति है, यामें अनंत चितेरो ॥ टेक ॥ ऐसा नैन लालची मेरा, तुमही मैं खूब खूवैरा ॥ जब देखु मैं अपनी मूरतको, निकट बिराजत नेरा ॥ ऐसी प्रीति लगी तुम मांहीं, जैसे चंद चकोरा ॥ देखत देखत उलटि परी है, यूं मन लग्यो जु मेरा ॥ गांसी सार सबदकी, घायल लेत घुमेरा ॥ उरझि पुरझि रह्यो बंक नालमें, सुरझत नाहिं सुझेरा ॥ लगन लगी कोई लाख कहोरे, छूटत नाहिं हटेरा ॥ कहैं कवीर सुनो भाइ साधो, मिटि गौ सकल अंधेरा ॥
(७५८)
कवीरपंथी—
राग काफी ५—नैनन माझ बसाऊँ जो मैं साहिब पाऊँ ॥ टे० ॥ नैननमें मेरा साहेब वसदा, डरती पलक न लगाऊँ ॥ एक टक ठाढी पंथ निहारौं, पलकसौं पलक न लाऊँ ॥ त्रिकुटी महल में बना है झरोखा, जहां सुख झाँकी पाऊँ ॥ अकह महलमें चवँर ढुराऊँ, सुखकी सेज विछाऊँ ॥ पियाको परसि भई पटरानी, आनंद मंगल गाऊँ ॥ कहैं कवीर सुनो भाइ साधो, सिंधु बुंद मिलि जाऊँ ॥
राग काफी ६—लेखा तेरा लीजैगा रे सुनु दिल महरम यार ॥ टे० ॥ चलना दूरि अभी कयूं थाकयो, पंथ खड़की धार ॥ हकहि साखी न्याव जो होयगा, वा सांचे दरबार ॥ धरम राय जब लेखा मांगे, परत गुरजकी मार ॥ घरकी नारी प्रान सों प्यारी, सो न चले तेरे लार ॥ कहैं कवीर सुनो भाइ साधो, हरि भजि उतरो पार ॥
राग काफी पंजाब ७—साहबसों लौ लाव हो मन गरब गुमानी ॥ टे० ॥ आज कालि अरु पांच दिनामें, आवैगे जमदानी ॥ हाथमें मुगदर लोहका, तेरी खूब करै मिजमानी ॥ पल पल आयु घटे छिन छिनमें, ज्यों अंजुली जन पानी ॥ अब तू समझि देख दिल अपने, सुरति करौ पहिचानी ॥ हस्ती घोडा छत्र सिंहासन, दुनियां देखि लुभानी ॥ बाँह पकड़ि जम ले चले जब, होयगी ऐचातानी ॥ भयो नर अंध मगन मायामें, ज्यू कपि मूठ बंधानी ॥ कर्म डोरि बाजीगरके बस, घर घर नाच नचानी ॥ हिल मिल एक जो होय रहै, सबदमें सुरति समानी ॥ अग्रदास दीदार दिवाना, दरिया बुंद मिलानी ॥
राग काफी ८—येही हाल फकीरा हंदा, सुन लीजो सब कोई बे ॥ सुरग मिरत पताल लोककी, फिकर फकीरौ खोई बे ॥ टोपी तत खवनी चितवन, सीगी अनहद सोई बे ॥ नाम निरंतर चोला पहिरे,
शब्दावली
(७५९)
सेली सुरति समोई बे॥ जत कोपीन सत आडबंद, मगन पतंगा होई बे । सिरजनहार तिलक सिर ऊपर, सुमरन कंठी पोई बे ॥ भिच्छा भाव सहजकी चीपी, झोली अकल जुठोई बे । जो देवै जाइपै लेवे, ऊँच नीच नहिं कोई बे॥ सेज भोम अकास ओढना, जोति चंद्रमा जोई बे॥ पवन रैन दिन करै षवासी, दिठ आसना परि सोई बे ॥ धुनी ध्यान धकावै रैन दिन, फिकर फावडी होई बे॥ आशा तृष्णा इंधन लकरी, धूंनी माहिं धकोई बे॥ उन सुनि दिष्ट उदास जगतसे, निस प्रेही निरमोही बे ॥ तरक त्यागबैराग धारना, राव रंक नहिं जोई बे ॥ एका एकी रहै अवनि पर, दिलकी डुरमति खोई बे ॥ कहैं कवीर अलमस्त फकीरा, आय निरंतर सोई बे ॥
राग काफी ९-वाह वाह गुजरान फकीरी दी ॥ टे० ॥ कबहुँक सौड निहाली पथरिया, कबहुँ भूत सरीरो दी ॥ कबहुँ टुकडा बासी कूसी, कबहुँक खीर मलीदो दी ॥ कबहुँक ओढै मल मल खासा, कबहुँ गुदडी लीरों दी ॥ कबहुँक मैडी कबहुँक मन्दर, कबहुँक आसन चौडो दी॥ कहैं कवीर परवाह न किसी दी, एक परवाह गुर पीरो दी ॥
राग काफी १०-रस मगन भया जब क्या गावै॥ टे० ॥ दिल दरियाव सदा जल निरमल, अनत नहावनकूँ कहैं जावै॥ जाग्रत सुषन सुषोपति तुरिया, भँवर गुफामें घेर छावै॥ इंगला पिंगला सुषमन नारी, वंक नालकी सुधि पावै॥ त्रिकुटी ऊपर ध्यान लगावै, अविनाशीकूँ लखि पावै॥ कहैं कवीर सिष पर बैठा, आवागवन जब मिटि पावै ॥
राग काफी ११-मेरा दिल लगा फकीरीमें ॥ टे० ॥ जो सुख पायो नाम भजनमें, सो सुख नाहिं अमीरीमें॥ भली बुरी सबकी
(७६०)
कबीरपंथी—
सुनि लीजे, करि गुजरान गरीबीमें ॥ प्रेम नगरमें रहन हमारी, भली बनि आई सबूरीमें ॥ कहैं कबीर दया सतगुरुकी, पाई भगति जगीरीमें ॥
राग काफी १२—दिल मगन भया जब क्या बोलै ॥ टे० ॥ तेरा साहेब है तुझ माहीं, बाहर नैना क्या खोलै ॥ मान सरोवर हंसा बासी, डाबर डाबर क्या डोलै ॥ सुरति कलाली भयी मतवाली, अमृत पाया बिन तोलै ॥ हस्तीकी चाल चलु मन मेरा, बाहर भीतर क्या डोलै ॥ कहैं कबीर अलमस्त फकीरा, साहेब पायो तिन ओलै ॥
राग काफी १३—दिल मगन भया अनहद बासी ॥ टे० ॥ अड- सठको फल जान लियो है, खोजि लई काया कासी ॥ अष्ट सिद्धि नौ निधि आगे ठाढी, जुगन जुगनकी है दासी ॥ बिन ब्याई जहाँ काम घेतु है, दूझत है बारह मासी ॥ कहैं कबीर सुनो भाई साधो, गगन मंडलका है बासी ॥
राग काफी १४—मेरी लगन साहेबसो लागी है ॥ टे० ॥ बन्धन काटि किया गुर मुकता, जरा मरन भरम भागी है ॥ जबसे दया भई सतगुरुकी, लोक लाज कुल त्यागी है ॥ गुरुकी दया साधुकी संगत, अमर लोक लौ लागी है ॥ सुरति निरति दोष भइ मत- वारी, प्रेम सुधा रस पागी है ॥ एक नाम बिन और न दूजा, कहैं कबीर बड भागी है ॥
राग काफी १५—फकीरोंदा हाल यह हानी ॥ टे० ॥ गोदडी गुरु ज्ञान दी हो, दया दी कफनी । कमर मंतंगा जतदा, माथे तिलक उनसुनी ॥ धूनी धीरज ध्यान दी हो, सेली सुरति अपार । फावडी गुरु ज्ञान दी हो, चित्त लगदा दसवें द्वार ॥ अन्तर तुरिया झूलदा हो, मरम न जाने कोय । जग विच दीसा बावरा हो,
शब्दावली
(७६१)
टुक हंस दे टुक रोय ॥ माता हस्ती झूलदो हो, आहूँ पहर खुसाल । चेला दास कवीरदा, पद गावे कमाल ॥
राग काफी १६-गलताना मता जब आवैगा, तब जीवड़ा सुख पावैगा ॥ टे० ॥ अचार विचार छुटे या जिवका, डुरमति दूर नसावैगा ॥ माया मोह भरमके बादल, परदा खोलि बहावैगा ॥ पांच पचीस करो बसि अपने, सतगुरु सबद लखावैगा ॥ रहनि गहनिकी नाव सवारी, तब भव पार सिधावैगा ॥ हंस सुजन जन बहुरि मिलैंगे, साहिबका गुन गावैगा ॥ अमरलोक इम्रतकी काया, तहाँ बड़ा सुख पावैगा ॥ कहैं कवीर सुनो भाई साधो, यह तत विरला पावैगा ॥
अथ मंगल प्रारम्भः ।
मंगल १-तन मन सुरति विचारि तो बात जनाइये । तुम प्रभु दीन दयाल सो ब्याह रचाइये ॥ वेद बुधि करि विधिसों चौक गुराइये । विषम भरम सब मेटिकै कलश धराइये ॥ त्रिकुटी छाजै बैठि नगर खलबल परी । गावत मंगल चार लगन हाथै धरी ॥ काम क्रोध दोउ काटिके खम्भ बनाइये । सत्सुकृतके बाँसन मंडप छाइये ॥ सुरतिको घुडिला पलानि चित चाबुक लियो । अनहद बाजो बजायके ब्याहन चढि चल्यो ॥ शीलको खड़ग बँधाय छिमाको मौरिया । चले अमर पुर जाय धनीकी पौरिया ॥ ब्याहै सदगुरु आप सवारे हेतियो ॥ कहै कवीर सतिभाय अमर घर चेतियो ॥
मंगल २-दीननके हो दयाल भगतिकी पन करौ । सरन आयकी लाज गई साहिब जिनि करो ॥ नऊ द्वार बिकार थार नौका वगे । मेरी सुरति नहीं ठहराय लगन केमे लगे ॥ पांच तत गुना तीनका सावर साजीया । जम राखे बिलमाय तो फंदन फादिया ॥ त्रिगुन
(७६२)
कबीरपंथी—
फांसि फाँदि आय माया मद जालमें । भवसागरके बीच महा जंजालमें ॥ मोक्ष सुक्ति जब होय दया जनपै करो । मेरो काटो कर्म विकार दास अपनो करो ॥ साहेब कवीर बंदी छोर अजर इक मानिये । हमसे पतित उधारि सरन साहिब आनिये ॥
मंगल ३—जो तुम आये हो सरन बचन इक मानियो । तजियो खलककी आस, सुरति ऐसे जानियो ॥ ज्यू जल मीन सनेह, सदा जलमें रहै । जल बिछूरत तजै परान, लगन ऐसी लहै ॥ तजो नीर पीवो, खीर लप नहि लावई । ते नर हंस हमार, सुरति ऐसे धावई ॥ काग वचन तुम छाँडि दे, हंस गति लावई । तेरे पुनि पूरन करि देऊँ, बहुत सुख पावई ॥ काटूँ करम विकार, भार सिर लेइहौं । हंसा तो मैं रहूं समय, आप सम करि गहौं ॥ कहैं कवीर धरमदाससों, तत मतसार ॥ हंसा बेगे लोक मंझार नाम आधार है ॥
मंगल ४—मूल कमलमें बैठि धरनिको बंध दयो ॥ सप्त अगरासी कोटि सबदको वस भयो ॥ मूंदै सप्त पताल मेरु मंडल हले । गरजो गगन अकास अमीसागर झले ॥ नई भई पहिचानि नवल भयो नेहरा । अगर जोति सिरमौर विराजै सेहरा ॥ उठौ सुहागिनि नारि महलको गम करो । वजर पौर उधारि पुरुषसो तुम मिलौ ॥ परम ज्योति प्रकाश निरंतर राजई । मिलौ सुहागिनी नारि तो पुरुष रिझावई ॥ देख्यो सबद रूप विहँसि सुंदरि मिली । चिकुटी नगर मंझार मदन मूरति लगी । धरमदास चित चेति चरन चित लाईये ॥ सतगुरु कवीर कहि दीन तो दीप जगाइये ॥
मंगल ५—सतगुरु आनंद मंगल आरति बोलिये । जुग जुग कहौ पुकारिके परदा खोलिये ॥ अलख निरंजन राय तो चरित्र बनाइया । संसामें छिन भंगु सुपनौ दिखाइया ॥ यह संसार सराय तो बाट