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भारतकोश
कबीरपंथी शब्दावली

कबीरपंथी शब्दावली

Kabirpanthi Shabdavali

स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा

स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)

Devanagarihipublished968 पृष्ठ

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शब्दावली

(७५७)

नहीं करना, दिलहीसे दिल लाया ॥ मक्का हज् हिंय बिच हिंजरत, पूरा सुरसिद पाया ॥

राग काफी २—सतगुरु हो महाराजा मोपै राम रंग डारा ॥टेक॥ सबदकी चोट लगी मेरे तनमें, बेधि लिया तन सारा ॥ औषध मुरि कछुओ नहीं लागे, का करे वैद विचारा ॥ सुर नर मुनिजन पीर औलिया, कोइ न पावै पारा ॥ दास कवीर अब रंग रंगिया, सब रंगन रंग न्यारा ॥

राग काफी ३—दूर नहीं रहमाना कोई सबद विचारो, दूर नहीं रहमाना ॥ दूर भटक नहीं मरना रे यारो, नेरेही मन माना ॥टे०॥ एक जो खोजियारे, दूजा दिलहि समाना ॥ खोजत खोजत थकित भये हैं, हिन्दू मुसलमाना ॥ कहा पढ़ि लीये वेद पुराना, कहा कथ लीये ग्यानाना ॥ गुरु पीरसो पाईये तब, पहुँचे जाय ठिकाना ॥ सबद विचार रहो तुम सन्मुख, नेरैही मन माना ॥ बंदे तू करे बन्दगी, तोहि साहब पै जाना ॥ एकम एका होय रहा है, ज्यों जल जलहि समाना ॥ कहैं कवीर सुनो भाइ साधो, लगा निरंतर ध्यानाना ॥

राग काफी ४—नैना आशिक मेरा महबूब तूही है । जित देखु तित याही मूरति है, यामें अनंत चितेरो ॥ टेक ॥ ऐसा नैन लालची मेरा, तुमही मैं खूब खूवैरा ॥ जब देखु मैं अपनी मूरतको, निकट बिराजत नेरा ॥ ऐसी प्रीति लगी तुम मांहीं, जैसे चंद चकोरा ॥ देखत देखत उलटि परी है, यूं मन लग्यो जु मेरा ॥ गांसी सार सबदकी, घायल लेत घुमेरा ॥ उरझि पुरझि रह्यो बंक नालमें, सुरझत नाहिं सुझेरा ॥ लगन लगी कोई लाख कहोरे, छूटत नाहिं हटेरा ॥ कहैं कवीर सुनो भाइ साधो, मिटि गौ सकल अंधेरा ॥