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कबीरपंथी शब्दावली

Kabirpanthi Shabdavali

स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा

स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)

Devanagarihipublished968 पृष्ठ

शब्दावली

(७५७)

नहीं करना, दिलहीसे दिल लाया ॥ मक्का हज् हिंय बिच हिंजरत, पूरा सुरसिद पाया ॥

राग काफी २—सतगुरु हो महाराजा मोपै राम रंग डारा ॥टेक॥ सबदकी चोट लगी मेरे तनमें, बेधि लिया तन सारा ॥ औषध मुरि कछुओ नहीं लागे, का करे वैद विचारा ॥ सुर नर मुनिजन पीर औलिया, कोइ न पावै पारा ॥ दास कवीर अब रंग रंगिया, सब रंगन रंग न्यारा ॥

राग काफी ३—दूर नहीं रहमाना कोई सबद विचारो, दूर नहीं रहमाना ॥ दूर भटक नहीं मरना रे यारो, नेरेही मन माना ॥टे०॥ एक जो खोजियारे, दूजा दिलहि समाना ॥ खोजत खोजत थकित भये हैं, हिन्दू मुसलमाना ॥ कहा पढ़ि लीये वेद पुराना, कहा कथ लीये ग्यानाना ॥ गुरु पीरसो पाईये तब, पहुँचे जाय ठिकाना ॥ सबद विचार रहो तुम सन्मुख, नेरैही मन माना ॥ बंदे तू करे बन्दगी, तोहि साहब पै जाना ॥ एकम एका होय रहा है, ज्यों जल जलहि समाना ॥ कहैं कवीर सुनो भाइ साधो, लगा निरंतर ध्यानाना ॥

राग काफी ४—नैना आशिक मेरा महबूब तूही है । जित देखु तित याही मूरति है, यामें अनंत चितेरो ॥ टेक ॥ ऐसा नैन लालची मेरा, तुमही मैं खूब खूवैरा ॥ जब देखु मैं अपनी मूरतको, निकट बिराजत नेरा ॥ ऐसी प्रीति लगी तुम मांहीं, जैसे चंद चकोरा ॥ देखत देखत उलटि परी है, यूं मन लग्यो जु मेरा ॥ गांसी सार सबदकी, घायल लेत घुमेरा ॥ उरझि पुरझि रह्यो बंक नालमें, सुरझत नाहिं सुझेरा ॥ लगन लगी कोई लाख कहोरे, छूटत नाहिं हटेरा ॥ कहैं कवीर सुनो भाइ साधो, मिटि गौ सकल अंधेरा ॥

(७५८)

कवीरपंथी—

राग काफी ५—नैनन माझ बसाऊँ जो मैं साहिब पाऊँ ॥ टे० ॥ नैननमें मेरा साहेब वसदा, डरती पलक न लगाऊँ ॥ एक टक ठाढी पंथ निहारौं, पलकसौं पलक न लाऊँ ॥ त्रिकुटी महल में बना है झरोखा, जहां सुख झाँकी पाऊँ ॥ अकह महलमें चवँर ढुराऊँ, सुखकी सेज विछाऊँ ॥ पियाको परसि भई पटरानी, आनंद मंगल गाऊँ ॥ कहैं कवीर सुनो भाइ साधो, सिंधु बुंद मिलि जाऊँ ॥

राग काफी ६—लेखा तेरा लीजैगा रे सुनु दिल महरम यार ॥ टे० ॥ चलना दूरि अभी कयूं थाकयो, पंथ खड़की धार ॥ हकहि साखी न्याव जो होयगा, वा सांचे दरबार ॥ धरम राय जब लेखा मांगे, परत गुरजकी मार ॥ घरकी नारी प्रान सों प्यारी, सो न चले तेरे लार ॥ कहैं कवीर सुनो भाइ साधो, हरि भजि उतरो पार ॥

राग काफी पंजाब ७—साहबसों लौ लाव हो मन गरब गुमानी ॥ टे० ॥ आज कालि अरु पांच दिनामें, आवैगे जमदानी ॥ हाथमें मुगदर लोहका, तेरी खूब करै मिजमानी ॥ पल पल आयु घटे छिन छिनमें, ज्यों अंजुली जन पानी ॥ अब तू समझि देख दिल अपने, सुरति करौ पहिचानी ॥ हस्ती घोडा छत्र सिंहासन, दुनियां देखि लुभानी ॥ बाँह पकड़ि जम ले चले जब, होयगी ऐचातानी ॥ भयो नर अंध मगन मायामें, ज्यू कपि मूठ बंधानी ॥ कर्म डोरि बाजीगरके बस, घर घर नाच नचानी ॥ हिल मिल एक जो होय रहै, सबदमें सुरति समानी ॥ अग्रदास दीदार दिवाना, दरिया बुंद मिलानी ॥

राग काफी ८—येही हाल फकीरा हंदा, सुन लीजो सब कोई बे ॥ सुरग मिरत पताल लोककी, फिकर फकीरौ खोई बे ॥ टोपी तत खवनी चितवन, सीगी अनहद सोई बे ॥ नाम निरंतर चोला पहिरे,

शब्दावली

(७५९)

सेली सुरति समोई बे॥ जत कोपीन सत आडबंद, मगन पतंगा होई बे । सिरजनहार तिलक सिर ऊपर, सुमरन कंठी पोई बे ॥ भिच्छा भाव सहजकी चीपी, झोली अकल जुठोई बे । जो देवै जाइपै लेवे, ऊँच नीच नहिं कोई बे॥ सेज भोम अकास ओढना, जोति चंद्रमा जोई बे॥ पवन रैन दिन करै षवासी, दिठ आसना परि सोई बे ॥ धुनी ध्यान धकावै रैन दिन, फिकर फावडी होई बे॥ आशा तृष्णा इंधन लकरी, धूंनी माहिं धकोई बे॥ उन सुनि दिष्ट उदास जगतसे, निस प्रेही निरमोही बे ॥ तरक त्यागबैराग धारना, राव रंक नहिं जोई बे ॥ एका एकी रहै अवनि पर, दिलकी डुरमति खोई बे ॥ कहैं कवीर अलमस्त फकीरा, आय निरंतर सोई बे ॥

राग काफी ९-वाह वाह गुजरान फकीरी दी ॥ टे० ॥ कबहुँक सौड निहाली पथरिया, कबहुँ भूत सरीरो दी ॥ कबहुँ टुकडा बासी कूसी, कबहुँक खीर मलीदो दी ॥ कबहुँक ओढै मल मल खासा, कबहुँ गुदडी लीरों दी ॥ कबहुँक मैडी कबहुँक मन्दर, कबहुँक आसन चौडो दी॥ कहैं कवीर परवाह न किसी दी, एक परवाह गुर पीरो दी ॥

राग काफी १०-रस मगन भया जब क्या गावै॥ टे० ॥ दिल दरियाव सदा जल निरमल, अनत नहावनकूँ कहैं जावै॥ जाग्रत सुषन सुषोपति तुरिया, भँवर गुफामें घेर छावै॥ इंगला पिंगला सुषमन नारी, वंक नालकी सुधि पावै॥ त्रिकुटी ऊपर ध्यान लगावै, अविनाशीकूँ लखि पावै॥ कहैं कवीर सिष पर बैठा, आवागवन जब मिटि पावै ॥

राग काफी ११-मेरा दिल लगा फकीरीमें ॥ टे० ॥ जो सुख पायो नाम भजनमें, सो सुख नाहिं अमीरीमें॥ भली बुरी सबकी

(७६०)

कबीरपंथी—

सुनि लीजे, करि गुजरान गरीबीमें ॥ प्रेम नगरमें रहन हमारी, भली बनि आई सबूरीमें ॥ कहैं कबीर दया सतगुरुकी, पाई भगति जगीरीमें ॥

राग काफी १२—दिल मगन भया जब क्या बोलै ॥ टे० ॥ तेरा साहेब है तुझ माहीं, बाहर नैना क्या खोलै ॥ मान सरोवर हंसा बासी, डाबर डाबर क्या डोलै ॥ सुरति कलाली भयी मतवाली, अमृत पाया बिन तोलै ॥ हस्तीकी चाल चलु मन मेरा, बाहर भीतर क्या डोलै ॥ कहैं कबीर अलमस्त फकीरा, साहेब पायो तिन ओलै ॥

राग काफी १३—दिल मगन भया अनहद बासी ॥ टे० ॥ अड- सठको फल जान लियो है, खोजि लई काया कासी ॥ अष्ट सिद्धि नौ निधि आगे ठाढी, जुगन जुगनकी है दासी ॥ बिन ब्याई जहाँ काम घेतु है, दूझत है बारह मासी ॥ कहैं कबीर सुनो भाई साधो, गगन मंडलका है बासी ॥

राग काफी १४—मेरी लगन साहेबसो लागी है ॥ टे० ॥ बन्धन काटि किया गुर मुकता, जरा मरन भरम भागी है ॥ जबसे दया भई सतगुरुकी, लोक लाज कुल त्यागी है ॥ गुरुकी दया साधुकी संगत, अमर लोक लौ लागी है ॥ सुरति निरति दोष भइ मत- वारी, प्रेम सुधा रस पागी है ॥ एक नाम बिन और न दूजा, कहैं कबीर बड भागी है ॥

राग काफी १५—फकीरोंदा हाल यह हानी ॥ टे० ॥ गोदडी गुरु ज्ञान दी हो, दया दी कफनी । कमर मंतंगा जतदा, माथे तिलक उनसुनी ॥ धूनी धीरज ध्यान दी हो, सेली सुरति अपार । फावडी गुरु ज्ञान दी हो, चित्त लगदा दसवें द्वार ॥ अन्तर तुरिया झूलदा हो, मरम न जाने कोय । जग विच दीसा बावरा हो,

शब्दावली

(७६१)

टुक हंस दे टुक रोय ॥ माता हस्ती झूलदो हो, आहूँ पहर खुसाल । चेला दास कवीरदा, पद गावे कमाल ॥

राग काफी १६-गलताना मता जब आवैगा, तब जीवड़ा सुख पावैगा ॥ टे० ॥ अचार विचार छुटे या जिवका, डुरमति दूर नसावैगा ॥ माया मोह भरमके बादल, परदा खोलि बहावैगा ॥ पांच पचीस करो बसि अपने, सतगुरु सबद लखावैगा ॥ रहनि गहनिकी नाव सवारी, तब भव पार सिधावैगा ॥ हंस सुजन जन बहुरि मिलैंगे, साहिबका गुन गावैगा ॥ अमरलोक इम्रतकी काया, तहाँ बड़ा सुख पावैगा ॥ कहैं कवीर सुनो भाई साधो, यह तत विरला पावैगा ॥

अथ मंगल प्रारम्भः ।

मंगल १-तन मन सुरति विचारि तो बात जनाइये । तुम प्रभु दीन दयाल सो ब्याह रचाइये ॥ वेद बुधि करि विधिसों चौक गुराइये । विषम भरम सब मेटिकै कलश धराइये ॥ त्रिकुटी छाजै बैठि नगर खलबल परी । गावत मंगल चार लगन हाथै धरी ॥ काम क्रोध दोउ काटिके खम्भ बनाइये । सत्सुकृतके बाँसन मंडप छाइये ॥ सुरतिको घुडिला पलानि चित चाबुक लियो । अनहद बाजो बजायके ब्याहन चढि चल्यो ॥ शीलको खड़ग बँधाय छिमाको मौरिया । चले अमर पुर जाय धनीकी पौरिया ॥ ब्याहै सदगुरु आप सवारे हेतियो ॥ कहै कवीर सतिभाय अमर घर चेतियो ॥

मंगल २-दीननके हो दयाल भगतिकी पन करौ । सरन आयकी लाज गई साहिब जिनि करो ॥ नऊ द्वार बिकार थार नौका वगे । मेरी सुरति नहीं ठहराय लगन केमे लगे ॥ पांच तत गुना तीनका सावर साजीया । जम राखे बिलमाय तो फंदन फादिया ॥ त्रिगुन

(७६२)

कबीरपंथी—

फांसि फाँदि आय माया मद जालमें । भवसागरके बीच महा जंजालमें ॥ मोक्ष सुक्ति जब होय दया जनपै करो । मेरो काटो कर्म विकार दास अपनो करो ॥ साहेब कवीर बंदी छोर अजर इक मानिये । हमसे पतित उधारि सरन साहिब आनिये ॥

मंगल ३—जो तुम आये हो सरन बचन इक मानियो । तजियो खलककी आस, सुरति ऐसे जानियो ॥ ज्यू जल मीन सनेह, सदा जलमें रहै । जल बिछूरत तजै परान, लगन ऐसी लहै ॥ तजो नीर पीवो, खीर लप नहि लावई । ते नर हंस हमार, सुरति ऐसे धावई ॥ काग वचन तुम छाँडि दे, हंस गति लावई । तेरे पुनि पूरन करि देऊँ, बहुत सुख पावई ॥ काटूँ करम विकार, भार सिर लेइहौं । हंसा तो मैं रहूं समय, आप सम करि गहौं ॥ कहैं कवीर धरमदाससों, तत मतसार ॥ हंसा बेगे लोक मंझार नाम आधार है ॥

मंगल ४—मूल कमलमें बैठि धरनिको बंध दयो ॥ सप्त अगरासी कोटि सबदको वस भयो ॥ मूंदै सप्त पताल मेरु मंडल हले । गरजो गगन अकास अमीसागर झले ॥ नई भई पहिचानि नवल भयो नेहरा । अगर जोति सिरमौर विराजै सेहरा ॥ उठौ सुहागिनि नारि महलको गम करो । वजर पौर उधारि पुरुषसो तुम मिलौ ॥ परम ज्योति प्रकाश निरंतर राजई । मिलौ सुहागिनी नारि तो पुरुष रिझावई ॥ देख्यो सबद रूप विहँसि सुंदरि मिली । चिकुटी नगर मंझार मदन मूरति लगी । धरमदास चित चेति चरन चित लाईये ॥ सतगुरु कवीर कहि दीन तो दीप जगाइये ॥

मंगल ५—सतगुरु आनंद मंगल आरति बोलिये । जुग जुग कहौ पुकारिके परदा खोलिये ॥ अलख निरंजन राय तो चरित्र बनाइया । संसामें छिन भंगु सुपनौ दिखाइया ॥ यह संसार सराय तो बाट

शब्दावली

(७६३)

बरानिया। उठ चले अपने पंथ न काहू जानिया॥ सुन धरमदास सयान पुकार जो कीजिये। निंदा अस्तुति त्यागि पिया चित दीजिये॥ पंथ दुहेला नाहिं कोई सत संगिया। सायर बुंद विनोद प्रेम चित मंडिया॥ नाहिं करो संशय सोग जीवन सब धुन्द है। अजर अमर एक आत्मा अमृत बुंद है॥ पांच तत्त्व सम बुंद पचीस सुहाना। अष्ट धातुको जुगल सो पियाको खेलावना॥ पिया है प्रगट विचारि नाहिं कोई बुझिया। अंत सुहागिनि नारि तत्त्व नहिं सुझिया॥ अछरमें गम राखि निःअछर जानिये। शब्द मंत्र गुरु भाषि सुरति पहिचानिये॥ हरष शोकते भिन्न बूझ प्रवीन हैं। जोग विवेकतैं दरसै जोति अधीन हैं॥ जग मग दीप बनाय आरति कीजिये। घट घट जोति परगास दरस सुख लीजिये॥ यहाँ वहाँ भरिपूर न दुनिया भावना। गुरुगम परचे होत तो इस विधि पावना॥ कहै कवीर धर्मदाससों मूल उचारिये। यही विधि आरती साजि शवद निरवारिये॥

मंगल ६-मनुषा देही पाये सुकृतको धाइये। सुरति जो अषन कुवॉरि हंसको ब्याहिये॥ सतगुरु विप्र बुलाय तो लगन लिखाईये। वेगि करि लेहु ब्याह ठील नहिं लाइये॥ मिलौ पचीसौ नारि तो मंगल गाइये। चौरासीका दुख बहुरि नहिं पाइये॥ सुरति जो सज्यो सिंगार पियापै जाइये। जन्म कर्मके अंक तो तुरत मिटाइये॥ हंसै कियो विचार सुरति सो यों कही। जुग जुग अछन कुँवरि एता दिन क्यों रही॥ सुरति छ करि सलाम पीया तुम सत कही। मोहि सतगुरु मिलिया नाहीं कुवॉरि यों रही॥ परम पुरुषकी सेज अखंडित खेलना। अमृत प्याला पाइ अधरही झेलना॥ पान परवाना पाय तो नाम सुनावई। सतगुरु कहैं कवीर जीव गति पावई॥

(७६४)

कवीरपंथी—

मंगल ७-पीहर रही भुलाय घना दिन बापके। कर सतगुरुको संग चालु घर आपके॥ मामा और ममसाल भुवा दस बेहनरी। तजि उनहूँको संग जाय सन्मुख अरी॥ मात पिता सुतवीर तजो परिवारको। उभा छोड़ लोग चली है पारको ॥ बहुरि न मिलना होय पीहरि प्यारा लोग सो। चली है अपने देश पूरवला जोग सो ॥ लंघिया औघट घाट कमल सब छेदिया। भँवर गुफाके घाट निरंजन भेदिया ॥ चढी कलश पर जाय अगम गम्य जहाँ किया। निराकार निरलेष पयाना तहाँ दिया ॥ अगम महलमें जाय मिलिहै पीवसो। ब्रह्म कियो भरतार पर हरिया जीवसों ॥ अधर दीपके मध्य पुरुष यक सार है। सांची कहै कवीर सोई भरतार है ॥

मंगल ८-समुझि सुमिर सतनाम जीव गति पाइये। नाहिं न आन उपाय चरन चित लाइये ॥ जहाँ गुरुको अस्थान तहाँ चलि जाइये। कोटि भान परगास सुरति तहाँ छाइये॥ तन मन होय अनंद हरषि गुन गाइये। खुलिहैं ग्यानके नैन ध्यान धरि धाइये॥ कहैं कवीर सतनाम जीव गति पाइये। अविगति अलख लखाय निरखि सिर नाइये ॥

मंगल ९-सतगुरु दीन दयाल काल भय भेटिया। दीन्हां दीपक ग्यान अमर बर भेटिया ॥ हरि देखनको चाव गई सतसंगमें। बाठो अधिक सनेह भिजोई हरि रंगमें ॥ देख्यो अलख अपार अखंडित पूर है। झिलमिल होय सोई हरि नूर है॥ अगिन जले जल माहिं सिंधु बिन पाल है। चहुं भानु गम नाहिं जहाँ मेरा लाल है॥ एक सुन्य दोय सून्य सून्य लख चारि है। जाने कोई गुरुमुख संत विवेक विचारि है ॥ कहैं कवीर विचारि संत भल पावई। बसे अमर घर जाय बहुरि नहिं आवई ॥

शब्दावली ।

(७६५)

यंगल १०—यहि जग को न आपन का संग बोले हो । जस तरवर मैदान अकेलै ढोले हो ॥ चारि पवन झख झोरै कोड न सहायक हो । जस पुरइन पर नीर थीर नहि पायक हो ॥ मन तारै मन बोरै मनहि नचावै हो । मन आवै मन जाय नाम सब गावै हो ॥ विष बोयउ संसार अमृत कहाँ पावौ हो । पुनिरपि जनम तुम्हार दोष केहि लावौ हो ॥ मायाके विस्तार नींद नहि आवै हो । कहैं राजा कहैं रंक दोऊ मिलि रोवै हो ॥ कहै कवीर सुन संतो मन निरवारो हो । बूझहु करहु विचार बहुरि नहि आवो हो ॥

सत्यनाम ।

अथ तीसा यंत्र प्रारम्भः । *

बन्दी छोर कवीर गुरु, धर्मदास शिष जासु ।

तासु चरण बन्दन किये, होय अविद्या नासु ॥

इन्दव छन्द—सोय रह्यो नित मोह निसा महैं, जानि परो नहिं राम पियारो । जन्म अनेक गये सपनांतर, एकहु बार न जागृत

  • यह तीसा यंत्र किसी निषेध बिचारवान् महात्माने परोपकारार्थ प्रकट किया है । इसमें निषेध सुन्दर विचार और उपदेश होनेके कारण, तथा सद्गुरु कवीरका श्री, प्रायः साखियाँ इसमें आनेके कारण कवीर पंथियोंको अत्यन्त प्रिय होनेसे, शब्दावलीके संग्रह करनेवालोंने इसे भी, अपनी शब्दावलीमें सम्मिलितकर लिया है । हस्तलिखित या छपी जितनी प्रति मिली सबमें—इसका नाम तो तीसाही यन्त्र लिखा है, किन्तु गिनतीके उपदेशी प्रश्नोत्तर के बल अटुठाइस हो लिखे हैं, इस लिये उसकी वृत्तिके लिये अन्तके दो प्रश्नोत्तर शामिलकर तीस पूरे कर दिये गये हैं, आशा है कि, मेरी इस सभ्य घृष्टताको शिक्षगण क्षमा करेंगे ।

इसकी एक प्रति, दिल्ली खारीबावलीके श्रीमहंत मुखलालदासजी साहबने बहुत दिन हुए भुसे दो थी जिसका नाम तीसा यंत्र न होकर शिक्षा दर्पन लिखा है । इसको किसी शैब संन्यासी महात्माने अपना करके छपवाया है । कवीरपंथियोंके पास जो प्रतियाँ हैं, उसमें मतभेदांतरसे रहित उपदेश मात्र है किन्तु शैब महात्माने इस यंत्रको शैब बनानेके लिये बीच बीचमें अपने अनुकूल कई दोहे मिलाकर यंत्रको अपना बनानेका प्रयत्न किया है । इस प्रकार के कार्य अनुचित होनेपर भी साम्प्रदायिकताके कारण लोगोंसे भूल हुआ ही करती है । इसी लिये सद्गुरुने कहा है—

(७६६)

कबीरपंथी—

धारो ॥ आदिगुरु तब देखि दया करि, तीसा यंत्र शब्द उचारो । चारहु वेद पुरान अठारह, सोधि कहो यह तत् विचारो ॥

सा०-जीव किरतारथ कारने, भाषा कीन विचार । तीसा जंतर बूझिके, नर उतरे भव पार ॥ कलिमें जीवन अलप है, करिये बेगि सम्हार । तप साधन नहि हो सके, केवल नाम अधार ॥

प्र० जगाइये क्या ? उ० प्रेम.

प्रेम जगावे विरहको, विरह जगावे पीव । पीव जगावे जीवको, वही पीव वहि जीव ॥ १ ॥

प्र० कीजिये क्या ? उ० पूजा ।

पूजा गुरुकी कीजिये, सब पूजा जेहि माहिं । ज्यों जल सींचे मूलको, फूले फले अघाहिं ॥ २ ॥

प्र० परखिये क्या ? उ० शब्द ।

परखो द्वारा शब्दका, जो गुरु कहे विचार । विना शब्द कछु ना मिले, देखो नैन निहार ॥ ३ ॥

प्र० लीजिये क्या ? उ० नाम ।

नाम मिलावे रूपको, जो जन खोजी होय । जब वह रूप हिरदे बसे, क्षुधा रहे ना कोय ॥ ४ ॥

प्र० करिये क्या ? उ० सत्संग ।

करिये नित सत्संगको, बाधा सकल मिटाय । ऐसा अवसर ना मिलै, डुरलभ नर तन पाय ॥ ५ ॥

प्र० बोलिये क्या ? उ० मीठा ।

मीठा सबसे बोलिये, रस उपजे चहुँ ओर । बसी करन यह मंत्र है, तेजो बचन कठोर ॥ ६ ॥

पछापछी कारने, सब जग गया मूलान ।

निरपछ होयके हरि भजे, सोई संत मुजान ॥

बिनको अपना कल्याण करना है उन्हें सदा ऐसी साम्प्रदायिकता और मिथ्या अभिमानसे अलग रहकर सत्यकेही बोझ और ग्रहणमें रहना चाहिये ।

संप्रहकर्ता—श्रीयुगलानन्द बिहारी,

शब्दावली ।

(७६७)

प्र० होइये क्या ? उ० दास ।

होय रहै जब दास यह, तब सुख पावै अंत । देखि रीति प्रह्लादकी, सबमें निरखो कंत ॥ ७ ॥

प्र० मानिये क्या ? उ० सबकोसत्य.

मानिये सबको सत्य है, जाको व्यवहार । जियन मरत दोऊ लगा, थिर होय देखु विचार ॥ ८ ॥

प्र० बराइये क्या ? उ० झगरा ।

झगरा नित्य बराइये, झगरा बुरी बलाय । दुख उपजे चिंता बढै, झगरामें घर जाय ॥ ९ ॥

प्र० खाइये क्या ? उ० गम ।

गम समान भोजन नहीं, जो कोई गमको खाय । अम्बरीष गम खाइया, दुरवासा बिललाय ॥ १० ॥

प्र० राखिये क्या उ० निज धर्म ।

राखिये निज २ धर्मको, दिठ गहिये सब काल । निज धर्म आपन राखते, सहजे भये निहाल ॥ ११ ॥

प्र० त्यागिये क्या ? उ० सब कुछ ।

त्याग तो ऐसा कीजिये, सब कुछ एकहि बार । सब प्रभुका मेरा नहीं, निश्चय किया विचार ॥ १२ ॥

प्र० छोड़िये क्या ? उ० अभिमान ।

छोड़ि झूठ अभिमानको, सुखी होय यह जीव । भावै कोई कछु कहै, हिये बसे निज पीव ॥ १३ ॥

प्र० पाइये क्या ? उ० सुख ।

सुख पइये निज रूपमें, द्वेत भाव करि त्याग । निरखो आपा सबनमें, रहै न दुखको लाग ॥ १४ ॥

प्र० देखिये क्या ? उ० आत्मराम ।

देखै सबमें राम है, एकहि रस भरपूर । ऊषहिते सब बनत है, चीनी शक्र गूर ॥ १५ ॥

(७६८)

कवीरपंथी—

प्र० मिटाइये क्या ? उ० प्रम ।

भरम मिटा तब जानिये, अचरज लगे न कोय । यह लीला सब रामकी, निरखे आपा खोय ॥ १६ ॥

प्र० निरखिये क्या ? उ० निजरूप ।

निरखत अपने रूपको, थीर होय सब अंग । कहन सुनन कछु ना रहे, ज्योंका त्योंहि अभंग ॥ १७ ॥

प्र० सुनिये क्या ? उ० गुणवार्ता ।

सुनिये गुणकी वार्ता, औगुन गुनिये नाहिं । हंस छीरको गहत है, नीरस त्यागत आहि ॥ १८ ॥

प्र० साधिये क्या ? उ० इन्द्री ।

साधे इन्द्री प्रबलको, जिहिं ते उठे उपाध । मन राजा बहकावते, पाँचो बडे असाध ॥ १९ ॥

प्र० भारिये क्या ? आशा ।

मारिये आशा साँपनि, जिन डसिया संसार । ताकी औषध तोष है, यह गुरु मंत्र विचार ॥ २० ॥

प्र० दोने क्या ? उ० दान ।

भूखेको कछु दीजिये, यथा शक्ति जो होय । ता ऊपर शीतल बचन, लखी आत्मा सोय ॥ २१ ॥

प्र० बड़ा पुण्य क्या ? उ० दया ।

दया पुण्य सबसे बड़ा, सबके ऊपर भाख । जीव दया चित्त राखिये, वेद पुराण है साख ॥ २२ ॥

प्र० बड़ा पाप क्या उ० हिंसा ।

बड़ा पाप हिंसा अहै, ता समान नहिं कोय । लेखा मांगे धर्म जब, तब सब नौबत होय ॥ २३ ॥

प्र० खुशबूई क्या ? उ० यश ।

खुशबूई यशकी भली फैल रही चहुँ ओर । मल्या गिरि सम गंध है, प्रगट बसे जग सोर ॥ २४ ॥

शब्दावली

(७६९)

प्र० दुर्गंध क्या ? उ० अपयश ।

अपयश सम दुर्गंध नहीं, नीका लगे न सोय । जैसे मलके निकटमें, बैठ सके ना कोय ॥ २५ ॥

प्र० धारिये क्या ? उ० धीरज ।

धीरज धरिके जानिये, सखुझि सबनकी रीति । उनकी औगुन आपमें, कबहुँ न लइये मीति ॥ २६ ॥

प्र० ठहराइये क्या ? उ० मन ।

मन ठहराये जानिये, अनसुझ सबै सुझाय । ज्यों अंधियारे भवनमें, दीपक बारि दिखाय ॥ २७ ॥

प्र० होनी क्या ? उ० होनहार ।

होनी सोई होत है, होनहार जो होय । रामचन्द्र वनको गये, सुख आवत दुख जोय ॥ २८ ॥

प्र० विचारिये क्या उ० निज तत्त्व ।

जो निज तत्त्व विचारिके, राखे हिये समोय । सो प्रानी सुखको लहै, दुख नहिं दरसे कोय ॥ २९ ॥

प्र० तौलिये क्या ? उ० बोली ।

बोली तो अनमोल है, जो कोइ बोले जान । हिये तराजू तौलके, तब सुख बाहर आन ॥ ३० ॥

प्र० सर्वोपरि क्या ? उ० गुरुको क्या ।

सर्वोपरि गुरुकी दया, जो हारी भव खेद । गुरु भगता सो जानई, और न पावे भेद ॥ ३१ ॥ सवैया-भाग जगे जब पूरबको तब, श्रीगुरुदेव दया करि हेरी । ज्ञान कपाट उधार दियो जब, मोह निशाके मारग फेरी ॥ थोरेइमें समझाय दियो तब, धीर भयी चंचल मति मेरी । सूझ परो सबही घट साहब, छूटि गयी सब तर्क घनेरी ॥

इति तोसा यंत्र ॥

कबीरपंथी शब्दावली २५

सत्यनाम

शब्दावली-छठा खंड ।

अथ शब्द प्रारम्भः ।

शब्द १-संतो सतगुरु अलख लखाया । जासो आप अपन दरसाया ॥ बीज मध्य ज्यों वृच्छ देखिये, वृच्छ मध्य ज्यों छाया ॥ परमात्ममें आत्मम जैसे, आत्मम मध्ये माया ॥ ज्यों नभ मध्ये सुन्न देखिये, सुन्न मध्य अंकारा ॥ अच्छरमें निःअच्छर दर्शो, छर अच्छर विस्तारा ॥ ज्यों रवि मध्ये किरन देखिये, किरन मध्य परकासा ॥ पारब्रह्मते जीव ब्रह्म है, इमि जीव मध्यमें स्वासा ॥ स्वासा मध्ये शब्द देखिये, अर्थ शब्दके माहीं ॥ ब्रह्मते जीव जीवते मन है, न्यारा मिला सदाही ॥ आपे बीज वृच्छ अंकुरा, आप फूल फल छाया ॥ सूरज किरन प्रकाश आपही, आप ब्रह्म जिव माया ॥ आत्ममें परमात्म दरसे, परमात्ममें झाँई ॥ झाँईमें परझाँई बोले, लखे कवीरा साई ॥

शब्द २-संतो गगनमंडल लगी तारा । खोलैंगे कोई संत जौहरी कोटन मध्य विचारा ॥ प्रथमें सोहं ध्यान लगावें ता विच सुरत करै पैठारा ॥ तब आगेकी सुध कीजिये, ता भीतर निज रूप हमारा ॥ मंडल भीतर पुरुष विराजे, कुलफ तीन तहां अगम अपारा ॥ ताकी कूंची गुरुगम माहीं, ज्ञान अंथसो न्यारा ॥ जुगभर जोग समाध लगावे, कोटन करे विचारा ॥ पुरुष रूप कबहुँ ना दरसे, जो गुरु मिलै न सारा ॥ जब गुरु वहियां होय

शब्दावली

(७७१)

दया निधि, निज मति खोल सुधारा ॥ तबै हंसको मारग सूझै, खोलै कुलफ किंवारा ॥ ता गुरुपै तन मन धन वारे, छोड़ कपट व्यवहारा ॥ तब गुरु होय कृपाल जीवपै, कागाते हंसा कर डारा ॥ कही हमारी मानो हंसा, या मति कोट ज्ञानसो न्यारा ॥ जीवत हंसा लोक समावे, जो यह शब्द विचारा ॥ अजपा ध्यान गगनमें दरसे, है सबहीसों न्यारा ॥ कहैं कवीर सुनो हो संतो, भेटो निज करतारा ॥

शब्द ३-संतो वह घर सबते न्यारा । जहां पूरन पुरुष हमारा ॥ टे० ॥ जहां न दुख सुख साँच झूठ नहीं, पाप न पुन्य पसारा ॥ ना दिन रैन चंद ना सूरज, बिना जोति उजियारा ॥ ना तहां ज्ञान ध्यान ना जप तप, वेद अहै नहीं बानी ॥ करनी धरनी रहनी गहनी, ये सब वहां हेरानी ॥ धरना अघर न बाहिर भीतर, पिंड ब्रह्मांडौ नाही ॥ पांच तत्त्व गुन तीनों नाही, साखी शब्द न ताही ॥ मूल न फूल बेल ना बीजा, बिना वृच्छ फल सोहै ॥ वोहं सोहं अर्ध उर्ध नहीं, स्वासा लेखत को है ॥ ना निरगुन ना सरगुन भाई, ना सुच्छम अरु अस्थूला ॥ ना अच्छर ना अविगति भाई, या सब जगके भूला ॥ जहां पुरुष तहवाँ कछु नाही, कहैं कवीर हम जाना ॥ हमरी सैन लखै जो कोई, पावे पद निर्वाना ॥

शब्द ४-संतो वह घर ऐसा जाना । जहवाँ है पुरुष ठिकाना ॥ टे० ॥ जब कछु रचना ताहि धनीका, आद न अंत पसारा ॥ रूप रेखा ना वरन अवरन, तबकी समुझ विचारा ॥ ईच्छा एक भई सन्नथसों, ताका सब मंडाना ॥ फिर नहीं साहब ईछा आये, ईछा यहां लुकाना ॥ ईच्छाते शब्द सुरत नौतम भये, इनके कुंभ बनाया ॥ कुंभे उपजे कुंभे बिनसे, ईच्छा आवे जाया ॥

(७७२)

कवीरपंथी—

सब नर चाहै बाहर भीतर, नख सिख ईच्छा खेला ॥ ईच्छा भेद लखे जो कोई, पावे पुरुष सुहेला ॥ ज्यों जब त्यो अबही है संतो, समुझ जुगत सो पावे ॥ कहै कवीर शब्दते न्यारा, इस विधि पुरुष रहावे ॥

शब्द ५—संतो दृष्टि परे सो माया ॥ वह तो अचल अलेख एक है, ज्ञान दृष्टिमें आया ॥ सतगुरु दिये बताय आपमें, है माहीं सत सोई ॥ दूजा क्रीतम थाप लिया है, सुक्त कौन विध होई ॥ काया झाँई त्रिगुन तत्त्वकी, विनसे कहवों जाई ॥ जल तरंग जलहीसो उपजे, फिर जल माँहि समाई ॥ ऐसी देह सदा गत सबकी; मनमें हरदम कोइ उचारे ॥ आपे भयो नाम धर न्यारा, इस विधि माया देख विचारे ॥ आपे रहे समाथ समुझमें, ना कहुँ जाय न आवे ॥ ऐसी स्वासा समुझ परे जब, पूजे काह पुजावे ॥ धरै न ध्यान करै ना जप तप, राम रहीम न गावे ॥ तीरथ बरत सकलो भ्रम छोड़े, सुन्न दौर ना जावे ॥ जोग जुगतसो कर्म न छूटे, आप अपन ना सूझे ॥ कहै कवीर सोइ संत जौहरी, जो या समुझे बूझे ॥

शब्द ६—संतो तन चीन्हे मन पाया ॥ तनही मन है मनही मन है, मनही निरंजन राया ॥ मन गुन तीनों पाँच तत्त्व है, मनका सकल पसारा ॥ जैसे चंद उदकमें दीसे, है माहीं सत न्यारा ॥ जागृत सुपन सुषोपत तुरिया, चारों मनके झाँई ॥ मन औतार असंख्य कला होय, मनते दुसरा नाई ॥ आद हता सो अब है संतो, सतगुरु भेद बताया ॥ कहै कवीर कंचनके भूषण, एक हुवा जब ताया ॥

शब्द ७—संतो ज्ञान कौनसे कहिये, कौन ध्यान विज्ञान कौन है, कैसे निज पद लहिये ॥ को है जीव ब्रह्म कहु को है, को

शब्दावली

(७७३)

अछरसे न्यार ॥ को है नाम अनामी को है, को कहिये औतारा ॥ चार अवस्था पाँचौ मुद्रा, जोग करे सो कवना ॥ मुक्त नाम काहे सो कहिये, कौन सार निज पवना ॥ कहो शब्द कहाँसे आया, करत अवाज अमोला ॥ काट कसर होत अंदरमें, कौन राह होय बोला ॥ बाहर भीतर व्यापक को है, सकल ठौरमें बासा ॥ उत्पति परलै कौन करत है, को कर सबे तमासा ॥ येता जुग लखे सो को है, अलख नाम है काको ॥ कहैं कवीर सुनो हो संतो, खोज करो तुम ताको ॥

शब्द ८—संतो सुनो शब्दका ज्वाबा ॥ करिहो छान जान जब पैहो, हासिल सबे हिसाबा ॥ ज्ञान सोई जो आतम चीन्हे, और ज्ञान कछु नाहीं ॥ चार दिसाकी छोड़ आसरा, मगन रहे मन माहीं ॥ ध्यान सोई जो उनमुन दरसे, बालक सम विज्ञाना ॥ या रहनीमें चूके नाहीं, चेहे न मान गुमाना ॥ जीव सोई जो जुग जुग जीवे, उत्पति परलै माहीं ॥ देही धर भरमें चौरासी, निरभय कबहुँ नाहीं ॥ ब्रह्म सोई जो सब घट व्यापक, निअछरको छय नाहीं ॥ ऊंकार आद सबहीके, त्रिगुन तत्त्व ता माहीं ॥ नाम सोई जाके है रूप, निअछर निज नामा ॥ राम कृष्ण औतार आदि लो, धरे निरंजन जामा ॥ शब्द सोई जो सबते न्यारा, त्रिकुटी मोटकसारा ॥ कंठद्वार होय बानी बोलै, निकसे मुखके द्वारा ॥ मनहि अवस्था मनही मुद्रा, मन करता तिहुँ लोका ॥ मुक्त नाम वाहीसो कहिये, मिटगये धंधा धोखा ॥ सार पवन सबहीके ऊपर, पंचासीके पारा ॥ उत्पति परले काल करत है, तासो है वह न्यारा ॥ कहैं कवीर यह लेख बताऊं, संत होय सो बूझे ॥ गुप्त प्रगट औ बाहर भीतर, सकल ठौर तिहि सूझे ॥

शब्द ९—संतो काम सकल जग खाया ॥ टे० ॥ स्वादी जीव

(७७४)

कवीरपंथी—

कोई ना बांचे, पर घर गमन कराया ॥ काम लहर काहू ना चीन्हा, कहो कहाँसे आया ॥ जासों भयो ताहि धर खायो, खाता विलंब न लाया ॥ अधारूप ब्रह्म छय कीन्हो, तन दे नाथ गिराया ॥ ब्रह्मा विष्णु मुनिजन जोगी, सकल जीव भरमाया ॥ स्वर्ग मृत्यु पाताल कामवस, चार खान रहु छाया ॥ कहै कवीर काम जोरावर, तीन लोक धर खाया ॥

शब्द १०—संतो निरंजन जाल पसारा ॥ टे० ॥ सरग पाताल रचा मृत्युमंडल, तीन लोक विस्तारा ॥ ब्रह्मा विष्णु शंखु प्रकट कर, तेही दीन्हो सिर भारा ॥ ठांव ठांव तीरथ वरत रोपे, ठगवेको संसारा ॥ चौरासी लक्ष जीव फंदाने, कबहुं न होय उबारा ॥ जाति बारी भसम करि डारी, फिर फिर दे ओतारा ॥ आवागमन रहे उरझाई, बूढे भौ मंझारा ॥ सतगुरु शब्दके बिना चिन्हारी, कैसे उतरे पारा ॥ माया फांस सकल जिव फांसे, आप भये करतारा ॥ अजर लोक जहां पुरुष बिदेही, जहांके मुंदो द्वारा ॥ ब्रह्मा विष्णु महेश्वर देवा, ये ओइले व्योहारा ॥ जो साहबसे निरंजन प्रगटे, सो सबहीसे न्यारा ॥ महाकालसे बांचा चाहो, गहो शब्द टकसारा ॥ कहै कवीर अमर कर राखों, जो निज होय हमारा ॥

शब्द ११—संतो माया तजी न जाई। जैसे बेल बृच्छ लपटाई ॥ टे० ॥ काम तजे तो क्रोध न छूटे, क्रोध तजे तो लोभा ॥ लोभ तजे तो आशा मांड़े, मान बढाई शोभा ॥ ग्रह तजे तो मठी बनावे, उदै अस्त दे फेरी ॥ कुटुम्ब तजे सिख साखा चाहै, मन मायाने घेरी ॥ देखत पैसा हाथ न छूवै, फूटी फावरी ताके ॥ आदर मान कछू ना चाहै, दीनी माया झांके ॥ कर्म संजोग भया ना पावत, तौ लग माया त्यागी ॥ आज्ञा तृष्णा मिटी

शब्दानवली

(७७५)

न मनकी, का ग्रेही बैरागी ॥ स्वामी सिष सखाके कारण, सौ जोजन चलि जावे ॥ जो छूटे तो सीधे छूटे, हिरदै ज्ञान समावे ॥ माया त्यागे मन बैरागी, सबदमें सुरत समानी ॥ कहें कवीर सोई संत जौहरी, जिन झूठी कर जानी ॥

शब्द १२-संतो सहज समाध भली है ॥ जब सो दया भई सतगुरुकी, सुरत न अनत चली है ॥ टेक ॥ जहँ जहँ जाऊँ सोई परिकरमा, जो कछु करों सो पूजा ॥ ग्रह उद्यान एक करि लेखों, भाव मिटाऊँ दूजा ॥ शब्द निरंतर मनुवा राचे, मलिन वासना त्यागी ॥ जागत सोवत ऊठत बैठत, ऐसी तारी लागी ॥ आँख न मूँदो कान न हँधो, काया कष्ट न धारों ॥ उघरे नैनमें साहेब देखो, सुंदर बदन निहारों ॥ कहें कवीर या उन्मुनि रहनी, जो प्रगट करि गई ॥ दुख सुखके वह परे परमपद, सोई सुखरहा समाई ॥

शब्द १३-संतो एक पंथ दोय बाटा ॥ आगे अंतरगत एक दुबिधा, तहांसो मारग फाटा ॥ टेक ॥ हिंदूके हृद गऊ देहरा, तीरथ व्रत ज्ञाना ॥ बकरी मार मांस मुख मेलै, कहो रामका जाना ॥ रोजा बांग निमाज गुजारे, मक्के मसीद भुलाना ॥ तसबी फेर ततबीर न छोडे, कहो अलह का जाना ॥ अपनी बुधसो छेदे काना, सुन्नत वही कराई ॥ जोरे हुकम अलहके होता, कटी क्यों ना आई ॥ तुरुक सुन्नत ईद्रीका कीन्हा, मूल न काटे मीयां ॥ विन सुन्नत बीबी घर मांही, क्यों राखे विन कीया ॥ हिंदूकी दया मिहर तुरकनकी, दोनों घटसे भागी ॥ वे हलाल वे झटका मारें, आग दोउन घर लागी ॥ सूकर गऊके एकहि लोहू, एक हाड़ इक चामा ॥ कहे कवीर हम दोनों त्यागे, सब घट आतमरामा ॥

शब्द १४-संतो ऐसी भक्त निरासा ॥ जो कोइ चाहैं मुक्ति पदारथ, छाँडे सबकी आसा ॥ टेक ॥ जो माया परपंच न होता,

(७७६)

कवीरपंथी—

नृप जंगल क्यों जाता ॥ दे पाहन पारस तेली घर, दत्तखरी क्यों खाता ॥ रतन जड़ित सुखसेज साहके, नामदेव जलहि बहाया ॥ गोरख कनक कूपमें डारे, गुरु कहैं चानक लाया ॥ गरभवास झुकदेव महासुनि, महासुमत होय जागे ॥ होय अनुराग ब्रह्मसो झगडे, मनबाँछित फल मांगे ॥ साहेब कवीर भक्त परमारथ, अम्बर बेचन आये ॥ ब्रह्मरूप होय शब्द सुनाये, देत गहर ना लाये ॥

शब्द १५-संतो मेंहीं होय सो पावे ॥ टे० ॥ खांड जो बिखरी रेतमें, हस्ती चुनी न जाय ॥ या बूरेका यही महातम, चींटी होय चुन खाय ॥ मोटे काते बिन गूझनी, मिहीं कहाँसे पावे ॥ वा कोरीको दोष न दीजे, मिही बिन मिहीं न पावे ॥ मोटे माटी बसे कुम्हारके, सुगदर मार दिवावे ॥ मोटेको जब मार परत है, तब तिहिँ कौन छुडावे ॥ कूट काटके ले जल बोरें, सुकियन लात लगावे ॥ मिही भई कुम्हार मनमानी, कर गहि चाक फिरावे ॥ कहे कवीर मिहीं कर मनुवां, और मिहीं कहैं पावे ॥ मरजीवा होय जलमें पैठे, मानिक मोती लावे ॥

शब्द १६-संतो मोहि कोई समझावे ॥ जीव ब्रह्म एकही दोई, या मति मोहि बतावे ॥ टे० ॥ एक कहते जाय न संशय, दोय कहेते न बनि आवे ॥ कहूँ कहूँ एक कहूँ कहूँ दो है, शास्त्र दोऊ बिधि गावे ॥ ब्रह्म सनातन भूतक कहिये, श्रीमुख गाय सुनायो ॥ जीव सदा उपजे औ बिनसै, सो क्यों ब्रह्म कहायो ॥ जीव कहाँते आया संतो, कहो कहाँ को जाई ॥ आवत जात चार जुग बीते, गति न काहु लखि पाई ॥ या संशय सतगुरु बिन संतो, को कर कृपा मिटावे ॥ ब्रह्म अनादि जीव मायामें, प्रगट कवीर लखावे ॥ ❁

शब्द १७-संतो अब हम आपा चीन्हा । निज स्वरूप प्राप्त है नितही, अचरज सहित सो कीन्हा ॥ टे० ॥ ना हम मनुष्य देवता