कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
पृष्ठ 785, कुल 968 में से
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दया निधि, निज मति खोल सुधारा ॥ तबै हंसको मारग सूझै, खोलै कुलफ किंवारा ॥ ता गुरुपै तन मन धन वारे, छोड़ कपट व्यवहारा ॥ तब गुरु होय कृपाल जीवपै, कागाते हंसा कर डारा ॥ कही हमारी मानो हंसा, या मति कोट ज्ञानसो न्यारा ॥ जीवत हंसा लोक समावे, जो यह शब्द विचारा ॥ अजपा ध्यान गगनमें दरसे, है सबहीसों न्यारा ॥ कहैं कवीर सुनो हो संतो, भेटो निज करतारा ॥
शब्द ३-संतो वह घर सबते न्यारा । जहां पूरन पुरुष हमारा ॥ टे० ॥ जहां न दुख सुख साँच झूठ नहीं, पाप न पुन्य पसारा ॥ ना दिन रैन चंद ना सूरज, बिना जोति उजियारा ॥ ना तहां ज्ञान ध्यान ना जप तप, वेद अहै नहीं बानी ॥ करनी धरनी रहनी गहनी, ये सब वहां हेरानी ॥ धरना अघर न बाहिर भीतर, पिंड ब्रह्मांडौ नाही ॥ पांच तत्त्व गुन तीनों नाही, साखी शब्द न ताही ॥ मूल न फूल बेल ना बीजा, बिना वृच्छ फल सोहै ॥ वोहं सोहं अर्ध उर्ध नहीं, स्वासा लेखत को है ॥ ना निरगुन ना सरगुन भाई, ना सुच्छम अरु अस्थूला ॥ ना अच्छर ना अविगति भाई, या सब जगके भूला ॥ जहां पुरुष तहवाँ कछु नाही, कहैं कवीर हम जाना ॥ हमरी सैन लखै जो कोई, पावे पद निर्वाना ॥
शब्द ४-संतो वह घर ऐसा जाना । जहवाँ है पुरुष ठिकाना ॥ टे० ॥ जब कछु रचना ताहि धनीका, आद न अंत पसारा ॥ रूप रेखा ना वरन अवरन, तबकी समुझ विचारा ॥ ईच्छा एक भई सन्नथसों, ताका सब मंडाना ॥ फिर नहीं साहब ईछा आये, ईछा यहां लुकाना ॥ ईच्छाते शब्द सुरत नौतम भये, इनके कुंभ बनाया ॥ कुंभे उपजे कुंभे बिनसे, ईच्छा आवे जाया ॥