कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
पृष्ठ 784, कुल 968 में से
संदर्भ में पढ़ेंसत्यनाम
शब्दावली-छठा खंड ।
अथ शब्द प्रारम्भः ।
शब्द १-संतो सतगुरु अलख लखाया । जासो आप अपन दरसाया ॥ बीज मध्य ज्यों वृच्छ देखिये, वृच्छ मध्य ज्यों छाया ॥ परमात्ममें आत्मम जैसे, आत्मम मध्ये माया ॥ ज्यों नभ मध्ये सुन्न देखिये, सुन्न मध्य अंकारा ॥ अच्छरमें निःअच्छर दर्शो, छर अच्छर विस्तारा ॥ ज्यों रवि मध्ये किरन देखिये, किरन मध्य परकासा ॥ पारब्रह्मते जीव ब्रह्म है, इमि जीव मध्यमें स्वासा ॥ स्वासा मध्ये शब्द देखिये, अर्थ शब्दके माहीं ॥ ब्रह्मते जीव जीवते मन है, न्यारा मिला सदाही ॥ आपे बीज वृच्छ अंकुरा, आप फूल फल छाया ॥ सूरज किरन प्रकाश आपही, आप ब्रह्म जिव माया ॥ आत्ममें परमात्म दरसे, परमात्ममें झाँई ॥ झाँईमें परझाँई बोले, लखे कवीरा साई ॥
शब्द २-संतो गगनमंडल लगी तारा । खोलैंगे कोई संत जौहरी कोटन मध्य विचारा ॥ प्रथमें सोहं ध्यान लगावें ता विच सुरत करै पैठारा ॥ तब आगेकी सुध कीजिये, ता भीतर निज रूप हमारा ॥ मंडल भीतर पुरुष विराजे, कुलफ तीन तहां अगम अपारा ॥ ताकी कूंची गुरुगम माहीं, ज्ञान अंथसो न्यारा ॥ जुगभर जोग समाध लगावे, कोटन करे विचारा ॥ पुरुष रूप कबहुँ ना दरसे, जो गुरु मिलै न सारा ॥ जब गुरु वहियां होय