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भारतकोश
कबीरपंथी शब्दावली

कबीरपंथी शब्दावली

Kabirpanthi Shabdavali

स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा

स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)

Devanagarihipublished968 पृष्ठ

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शब्दावली

(७६९)

प्र० दुर्गंध क्या ? उ० अपयश ।

अपयश सम दुर्गंध नहीं, नीका लगे न सोय । जैसे मलके निकटमें, बैठ सके ना कोय ॥ २५ ॥

प्र० धारिये क्या ? उ० धीरज ।

धीरज धरिके जानिये, सखुझि सबनकी रीति । उनकी औगुन आपमें, कबहुँ न लइये मीति ॥ २६ ॥

प्र० ठहराइये क्या ? उ० मन ।

मन ठहराये जानिये, अनसुझ सबै सुझाय । ज्यों अंधियारे भवनमें, दीपक बारि दिखाय ॥ २७ ॥

प्र० होनी क्या ? उ० होनहार ।

होनी सोई होत है, होनहार जो होय । रामचन्द्र वनको गये, सुख आवत दुख जोय ॥ २८ ॥

प्र० विचारिये क्या उ० निज तत्त्व ।

जो निज तत्त्व विचारिके, राखे हिये समोय । सो प्रानी सुखको लहै, दुख नहिं दरसे कोय ॥ २९ ॥

प्र० तौलिये क्या ? उ० बोली ।

बोली तो अनमोल है, जो कोइ बोले जान । हिये तराजू तौलके, तब सुख बाहर आन ॥ ३० ॥

प्र० सर्वोपरि क्या ? उ० गुरुको क्या ।

सर्वोपरि गुरुकी दया, जो हारी भव खेद । गुरु भगता सो जानई, और न पावे भेद ॥ ३१ ॥ सवैया-भाग जगे जब पूरबको तब, श्रीगुरुदेव दया करि हेरी । ज्ञान कपाट उधार दियो जब, मोह निशाके मारग फेरी ॥ थोरेइमें समझाय दियो तब, धीर भयी चंचल मति मेरी । सूझ परो सबही घट साहब, छूटि गयी सब तर्क घनेरी ॥

इति तोसा यंत्र ॥

कबीरपंथी शब्दावली २५