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भारतकोश
कबीरपंथी शब्दावली

कबीरपंथी शब्दावली

Kabirpanthi Shabdavali

स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा

स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)

Devanagarihipublished968 पृष्ठ

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पृष्ठ 782

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कवीरपंथी—

प्र० मिटाइये क्या ? उ० प्रम ।

भरम मिटा तब जानिये, अचरज लगे न कोय । यह लीला सब रामकी, निरखे आपा खोय ॥ १६ ॥

प्र० निरखिये क्या ? उ० निजरूप ।

निरखत अपने रूपको, थीर होय सब अंग । कहन सुनन कछु ना रहे, ज्योंका त्योंहि अभंग ॥ १७ ॥

प्र० सुनिये क्या ? उ० गुणवार्ता ।

सुनिये गुणकी वार्ता, औगुन गुनिये नाहिं । हंस छीरको गहत है, नीरस त्यागत आहि ॥ १८ ॥

प्र० साधिये क्या ? उ० इन्द्री ।

साधे इन्द्री प्रबलको, जिहिं ते उठे उपाध । मन राजा बहकावते, पाँचो बडे असाध ॥ १९ ॥

प्र० भारिये क्या ? आशा ।

मारिये आशा साँपनि, जिन डसिया संसार । ताकी औषध तोष है, यह गुरु मंत्र विचार ॥ २० ॥

प्र० दोने क्या ? उ० दान ।

भूखेको कछु दीजिये, यथा शक्ति जो होय । ता ऊपर शीतल बचन, लखी आत्मा सोय ॥ २१ ॥

प्र० बड़ा पुण्य क्या ? उ० दया ।

दया पुण्य सबसे बड़ा, सबके ऊपर भाख । जीव दया चित्त राखिये, वेद पुराण है साख ॥ २२ ॥

प्र० बड़ा पाप क्या उ० हिंसा ।

बड़ा पाप हिंसा अहै, ता समान नहिं कोय । लेखा मांगे धर्म जब, तब सब नौबत होय ॥ २३ ॥

प्र० खुशबूई क्या ? उ० यश ।

खुशबूई यशकी भली फैल रही चहुँ ओर । मल्या गिरि सम गंध है, प्रगट बसे जग सोर ॥ २४ ॥