कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
(७६८)
कवीरपंथी—
प्र० मिटाइये क्या ? उ० प्रम ।
भरम मिटा तब जानिये, अचरज लगे न कोय । यह लीला सब रामकी, निरखे आपा खोय ॥ १६ ॥
प्र० निरखिये क्या ? उ० निजरूप ।
निरखत अपने रूपको, थीर होय सब अंग । कहन सुनन कछु ना रहे, ज्योंका त्योंहि अभंग ॥ १७ ॥
प्र० सुनिये क्या ? उ० गुणवार्ता ।
सुनिये गुणकी वार्ता, औगुन गुनिये नाहिं । हंस छीरको गहत है, नीरस त्यागत आहि ॥ १८ ॥
प्र० साधिये क्या ? उ० इन्द्री ।
साधे इन्द्री प्रबलको, जिहिं ते उठे उपाध । मन राजा बहकावते, पाँचो बडे असाध ॥ १९ ॥
प्र० भारिये क्या ? आशा ।
मारिये आशा साँपनि, जिन डसिया संसार । ताकी औषध तोष है, यह गुरु मंत्र विचार ॥ २० ॥
प्र० दोने क्या ? उ० दान ।
भूखेको कछु दीजिये, यथा शक्ति जो होय । ता ऊपर शीतल बचन, लखी आत्मा सोय ॥ २१ ॥
प्र० बड़ा पुण्य क्या ? उ० दया ।
दया पुण्य सबसे बड़ा, सबके ऊपर भाख । जीव दया चित्त राखिये, वेद पुराण है साख ॥ २२ ॥
प्र० बड़ा पाप क्या उ० हिंसा ।
बड़ा पाप हिंसा अहै, ता समान नहिं कोय । लेखा मांगे धर्म जब, तब सब नौबत होय ॥ २३ ॥
प्र० खुशबूई क्या ? उ० यश ।
खुशबूई यशकी भली फैल रही चहुँ ओर । मल्या गिरि सम गंध है, प्रगट बसे जग सोर ॥ २४ ॥
शब्दावली
(७६९)
प्र० दुर्गंध क्या ? उ० अपयश ।
अपयश सम दुर्गंध नहीं, नीका लगे न सोय । जैसे मलके निकटमें, बैठ सके ना कोय ॥ २५ ॥
प्र० धारिये क्या ? उ० धीरज ।
धीरज धरिके जानिये, सखुझि सबनकी रीति । उनकी औगुन आपमें, कबहुँ न लइये मीति ॥ २६ ॥
प्र० ठहराइये क्या ? उ० मन ।
मन ठहराये जानिये, अनसुझ सबै सुझाय । ज्यों अंधियारे भवनमें, दीपक बारि दिखाय ॥ २७ ॥
प्र० होनी क्या ? उ० होनहार ।
होनी सोई होत है, होनहार जो होय । रामचन्द्र वनको गये, सुख आवत दुख जोय ॥ २८ ॥
प्र० विचारिये क्या उ० निज तत्त्व ।
जो निज तत्त्व विचारिके, राखे हिये समोय । सो प्रानी सुखको लहै, दुख नहिं दरसे कोय ॥ २९ ॥
प्र० तौलिये क्या ? उ० बोली ।
बोली तो अनमोल है, जो कोइ बोले जान । हिये तराजू तौलके, तब सुख बाहर आन ॥ ३० ॥
प्र० सर्वोपरि क्या ? उ० गुरुको क्या ।
सर्वोपरि गुरुकी दया, जो हारी भव खेद । गुरु भगता सो जानई, और न पावे भेद ॥ ३१ ॥ सवैया-भाग जगे जब पूरबको तब, श्रीगुरुदेव दया करि हेरी । ज्ञान कपाट उधार दियो जब, मोह निशाके मारग फेरी ॥ थोरेइमें समझाय दियो तब, धीर भयी चंचल मति मेरी । सूझ परो सबही घट साहब, छूटि गयी सब तर्क घनेरी ॥
इति तोसा यंत्र ॥
कबीरपंथी शब्दावली २५
सत्यनाम
शब्दावली-छठा खंड ।
अथ शब्द प्रारम्भः ।
शब्द १-संतो सतगुरु अलख लखाया । जासो आप अपन दरसाया ॥ बीज मध्य ज्यों वृच्छ देखिये, वृच्छ मध्य ज्यों छाया ॥ परमात्ममें आत्मम जैसे, आत्मम मध्ये माया ॥ ज्यों नभ मध्ये सुन्न देखिये, सुन्न मध्य अंकारा ॥ अच्छरमें निःअच्छर दर्शो, छर अच्छर विस्तारा ॥ ज्यों रवि मध्ये किरन देखिये, किरन मध्य परकासा ॥ पारब्रह्मते जीव ब्रह्म है, इमि जीव मध्यमें स्वासा ॥ स्वासा मध्ये शब्द देखिये, अर्थ शब्दके माहीं ॥ ब्रह्मते जीव जीवते मन है, न्यारा मिला सदाही ॥ आपे बीज वृच्छ अंकुरा, आप फूल फल छाया ॥ सूरज किरन प्रकाश आपही, आप ब्रह्म जिव माया ॥ आत्ममें परमात्म दरसे, परमात्ममें झाँई ॥ झाँईमें परझाँई बोले, लखे कवीरा साई ॥
शब्द २-संतो गगनमंडल लगी तारा । खोलैंगे कोई संत जौहरी कोटन मध्य विचारा ॥ प्रथमें सोहं ध्यान लगावें ता विच सुरत करै पैठारा ॥ तब आगेकी सुध कीजिये, ता भीतर निज रूप हमारा ॥ मंडल भीतर पुरुष विराजे, कुलफ तीन तहां अगम अपारा ॥ ताकी कूंची गुरुगम माहीं, ज्ञान अंथसो न्यारा ॥ जुगभर जोग समाध लगावे, कोटन करे विचारा ॥ पुरुष रूप कबहुँ ना दरसे, जो गुरु मिलै न सारा ॥ जब गुरु वहियां होय
शब्दावली
(७७१)
दया निधि, निज मति खोल सुधारा ॥ तबै हंसको मारग सूझै, खोलै कुलफ किंवारा ॥ ता गुरुपै तन मन धन वारे, छोड़ कपट व्यवहारा ॥ तब गुरु होय कृपाल जीवपै, कागाते हंसा कर डारा ॥ कही हमारी मानो हंसा, या मति कोट ज्ञानसो न्यारा ॥ जीवत हंसा लोक समावे, जो यह शब्द विचारा ॥ अजपा ध्यान गगनमें दरसे, है सबहीसों न्यारा ॥ कहैं कवीर सुनो हो संतो, भेटो निज करतारा ॥
शब्द ३-संतो वह घर सबते न्यारा । जहां पूरन पुरुष हमारा ॥ टे० ॥ जहां न दुख सुख साँच झूठ नहीं, पाप न पुन्य पसारा ॥ ना दिन रैन चंद ना सूरज, बिना जोति उजियारा ॥ ना तहां ज्ञान ध्यान ना जप तप, वेद अहै नहीं बानी ॥ करनी धरनी रहनी गहनी, ये सब वहां हेरानी ॥ धरना अघर न बाहिर भीतर, पिंड ब्रह्मांडौ नाही ॥ पांच तत्त्व गुन तीनों नाही, साखी शब्द न ताही ॥ मूल न फूल बेल ना बीजा, बिना वृच्छ फल सोहै ॥ वोहं सोहं अर्ध उर्ध नहीं, स्वासा लेखत को है ॥ ना निरगुन ना सरगुन भाई, ना सुच्छम अरु अस्थूला ॥ ना अच्छर ना अविगति भाई, या सब जगके भूला ॥ जहां पुरुष तहवाँ कछु नाही, कहैं कवीर हम जाना ॥ हमरी सैन लखै जो कोई, पावे पद निर्वाना ॥
शब्द ४-संतो वह घर ऐसा जाना । जहवाँ है पुरुष ठिकाना ॥ टे० ॥ जब कछु रचना ताहि धनीका, आद न अंत पसारा ॥ रूप रेखा ना वरन अवरन, तबकी समुझ विचारा ॥ ईच्छा एक भई सन्नथसों, ताका सब मंडाना ॥ फिर नहीं साहब ईछा आये, ईछा यहां लुकाना ॥ ईच्छाते शब्द सुरत नौतम भये, इनके कुंभ बनाया ॥ कुंभे उपजे कुंभे बिनसे, ईच्छा आवे जाया ॥
(७७२)
कवीरपंथी—
सब नर चाहै बाहर भीतर, नख सिख ईच्छा खेला ॥ ईच्छा भेद लखे जो कोई, पावे पुरुष सुहेला ॥ ज्यों जब त्यो अबही है संतो, समुझ जुगत सो पावे ॥ कहै कवीर शब्दते न्यारा, इस विधि पुरुष रहावे ॥
शब्द ५—संतो दृष्टि परे सो माया ॥ वह तो अचल अलेख एक है, ज्ञान दृष्टिमें आया ॥ सतगुरु दिये बताय आपमें, है माहीं सत सोई ॥ दूजा क्रीतम थाप लिया है, सुक्त कौन विध होई ॥ काया झाँई त्रिगुन तत्त्वकी, विनसे कहवों जाई ॥ जल तरंग जलहीसो उपजे, फिर जल माँहि समाई ॥ ऐसी देह सदा गत सबकी; मनमें हरदम कोइ उचारे ॥ आपे भयो नाम धर न्यारा, इस विधि माया देख विचारे ॥ आपे रहे समाथ समुझमें, ना कहुँ जाय न आवे ॥ ऐसी स्वासा समुझ परे जब, पूजे काह पुजावे ॥ धरै न ध्यान करै ना जप तप, राम रहीम न गावे ॥ तीरथ बरत सकलो भ्रम छोड़े, सुन्न दौर ना जावे ॥ जोग जुगतसो कर्म न छूटे, आप अपन ना सूझे ॥ कहै कवीर सोइ संत जौहरी, जो या समुझे बूझे ॥
शब्द ६—संतो तन चीन्हे मन पाया ॥ तनही मन है मनही मन है, मनही निरंजन राया ॥ मन गुन तीनों पाँच तत्त्व है, मनका सकल पसारा ॥ जैसे चंद उदकमें दीसे, है माहीं सत न्यारा ॥ जागृत सुपन सुषोपत तुरिया, चारों मनके झाँई ॥ मन औतार असंख्य कला होय, मनते दुसरा नाई ॥ आद हता सो अब है संतो, सतगुरु भेद बताया ॥ कहै कवीर कंचनके भूषण, एक हुवा जब ताया ॥
शब्द ७—संतो ज्ञान कौनसे कहिये, कौन ध्यान विज्ञान कौन है, कैसे निज पद लहिये ॥ को है जीव ब्रह्म कहु को है, को
शब्दावली
(७७३)
अछरसे न्यार ॥ को है नाम अनामी को है, को कहिये औतारा ॥ चार अवस्था पाँचौ मुद्रा, जोग करे सो कवना ॥ मुक्त नाम काहे सो कहिये, कौन सार निज पवना ॥ कहो शब्द कहाँसे आया, करत अवाज अमोला ॥ काट कसर होत अंदरमें, कौन राह होय बोला ॥ बाहर भीतर व्यापक को है, सकल ठौरमें बासा ॥ उत्पति परलै कौन करत है, को कर सबे तमासा ॥ येता जुग लखे सो को है, अलख नाम है काको ॥ कहैं कवीर सुनो हो संतो, खोज करो तुम ताको ॥
शब्द ८—संतो सुनो शब्दका ज्वाबा ॥ करिहो छान जान जब पैहो, हासिल सबे हिसाबा ॥ ज्ञान सोई जो आतम चीन्हे, और ज्ञान कछु नाहीं ॥ चार दिसाकी छोड़ आसरा, मगन रहे मन माहीं ॥ ध्यान सोई जो उनमुन दरसे, बालक सम विज्ञाना ॥ या रहनीमें चूके नाहीं, चेहे न मान गुमाना ॥ जीव सोई जो जुग जुग जीवे, उत्पति परलै माहीं ॥ देही धर भरमें चौरासी, निरभय कबहुँ नाहीं ॥ ब्रह्म सोई जो सब घट व्यापक, निअछरको छय नाहीं ॥ ऊंकार आद सबहीके, त्रिगुन तत्त्व ता माहीं ॥ नाम सोई जाके है रूप, निअछर निज नामा ॥ राम कृष्ण औतार आदि लो, धरे निरंजन जामा ॥ शब्द सोई जो सबते न्यारा, त्रिकुटी मोटकसारा ॥ कंठद्वार होय बानी बोलै, निकसे मुखके द्वारा ॥ मनहि अवस्था मनही मुद्रा, मन करता तिहुँ लोका ॥ मुक्त नाम वाहीसो कहिये, मिटगये धंधा धोखा ॥ सार पवन सबहीके ऊपर, पंचासीके पारा ॥ उत्पति परले काल करत है, तासो है वह न्यारा ॥ कहैं कवीर यह लेख बताऊं, संत होय सो बूझे ॥ गुप्त प्रगट औ बाहर भीतर, सकल ठौर तिहि सूझे ॥
शब्द ९—संतो काम सकल जग खाया ॥ टे० ॥ स्वादी जीव
(७७४)
कवीरपंथी—
कोई ना बांचे, पर घर गमन कराया ॥ काम लहर काहू ना चीन्हा, कहो कहाँसे आया ॥ जासों भयो ताहि धर खायो, खाता विलंब न लाया ॥ अधारूप ब्रह्म छय कीन्हो, तन दे नाथ गिराया ॥ ब्रह्मा विष्णु मुनिजन जोगी, सकल जीव भरमाया ॥ स्वर्ग मृत्यु पाताल कामवस, चार खान रहु छाया ॥ कहै कवीर काम जोरावर, तीन लोक धर खाया ॥
शब्द १०—संतो निरंजन जाल पसारा ॥ टे० ॥ सरग पाताल रचा मृत्युमंडल, तीन लोक विस्तारा ॥ ब्रह्मा विष्णु शंखु प्रकट कर, तेही दीन्हो सिर भारा ॥ ठांव ठांव तीरथ वरत रोपे, ठगवेको संसारा ॥ चौरासी लक्ष जीव फंदाने, कबहुं न होय उबारा ॥ जाति बारी भसम करि डारी, फिर फिर दे ओतारा ॥ आवागमन रहे उरझाई, बूढे भौ मंझारा ॥ सतगुरु शब्दके बिना चिन्हारी, कैसे उतरे पारा ॥ माया फांस सकल जिव फांसे, आप भये करतारा ॥ अजर लोक जहां पुरुष बिदेही, जहांके मुंदो द्वारा ॥ ब्रह्मा विष्णु महेश्वर देवा, ये ओइले व्योहारा ॥ जो साहबसे निरंजन प्रगटे, सो सबहीसे न्यारा ॥ महाकालसे बांचा चाहो, गहो शब्द टकसारा ॥ कहै कवीर अमर कर राखों, जो निज होय हमारा ॥
शब्द ११—संतो माया तजी न जाई। जैसे बेल बृच्छ लपटाई ॥ टे० ॥ काम तजे तो क्रोध न छूटे, क्रोध तजे तो लोभा ॥ लोभ तजे तो आशा मांड़े, मान बढाई शोभा ॥ ग्रह तजे तो मठी बनावे, उदै अस्त दे फेरी ॥ कुटुम्ब तजे सिख साखा चाहै, मन मायाने घेरी ॥ देखत पैसा हाथ न छूवै, फूटी फावरी ताके ॥ आदर मान कछू ना चाहै, दीनी माया झांके ॥ कर्म संजोग भया ना पावत, तौ लग माया त्यागी ॥ आज्ञा तृष्णा मिटी
शब्दानवली
(७७५)
न मनकी, का ग्रेही बैरागी ॥ स्वामी सिष सखाके कारण, सौ जोजन चलि जावे ॥ जो छूटे तो सीधे छूटे, हिरदै ज्ञान समावे ॥ माया त्यागे मन बैरागी, सबदमें सुरत समानी ॥ कहें कवीर सोई संत जौहरी, जिन झूठी कर जानी ॥
शब्द १२-संतो सहज समाध भली है ॥ जब सो दया भई सतगुरुकी, सुरत न अनत चली है ॥ टेक ॥ जहँ जहँ जाऊँ सोई परिकरमा, जो कछु करों सो पूजा ॥ ग्रह उद्यान एक करि लेखों, भाव मिटाऊँ दूजा ॥ शब्द निरंतर मनुवा राचे, मलिन वासना त्यागी ॥ जागत सोवत ऊठत बैठत, ऐसी तारी लागी ॥ आँख न मूँदो कान न हँधो, काया कष्ट न धारों ॥ उघरे नैनमें साहेब देखो, सुंदर बदन निहारों ॥ कहें कवीर या उन्मुनि रहनी, जो प्रगट करि गई ॥ दुख सुखके वह परे परमपद, सोई सुखरहा समाई ॥
शब्द १३-संतो एक पंथ दोय बाटा ॥ आगे अंतरगत एक दुबिधा, तहांसो मारग फाटा ॥ टेक ॥ हिंदूके हृद गऊ देहरा, तीरथ व्रत ज्ञाना ॥ बकरी मार मांस मुख मेलै, कहो रामका जाना ॥ रोजा बांग निमाज गुजारे, मक्के मसीद भुलाना ॥ तसबी फेर ततबीर न छोडे, कहो अलह का जाना ॥ अपनी बुधसो छेदे काना, सुन्नत वही कराई ॥ जोरे हुकम अलहके होता, कटी क्यों ना आई ॥ तुरुक सुन्नत ईद्रीका कीन्हा, मूल न काटे मीयां ॥ विन सुन्नत बीबी घर मांही, क्यों राखे विन कीया ॥ हिंदूकी दया मिहर तुरकनकी, दोनों घटसे भागी ॥ वे हलाल वे झटका मारें, आग दोउन घर लागी ॥ सूकर गऊके एकहि लोहू, एक हाड़ इक चामा ॥ कहे कवीर हम दोनों त्यागे, सब घट आतमरामा ॥
शब्द १४-संतो ऐसी भक्त निरासा ॥ जो कोइ चाहैं मुक्ति पदारथ, छाँडे सबकी आसा ॥ टेक ॥ जो माया परपंच न होता,
(७७६)
कवीरपंथी—
नृप जंगल क्यों जाता ॥ दे पाहन पारस तेली घर, दत्तखरी क्यों खाता ॥ रतन जड़ित सुखसेज साहके, नामदेव जलहि बहाया ॥ गोरख कनक कूपमें डारे, गुरु कहैं चानक लाया ॥ गरभवास झुकदेव महासुनि, महासुमत होय जागे ॥ होय अनुराग ब्रह्मसो झगडे, मनबाँछित फल मांगे ॥ साहेब कवीर भक्त परमारथ, अम्बर बेचन आये ॥ ब्रह्मरूप होय शब्द सुनाये, देत गहर ना लाये ॥
शब्द १५-संतो मेंहीं होय सो पावे ॥ टे० ॥ खांड जो बिखरी रेतमें, हस्ती चुनी न जाय ॥ या बूरेका यही महातम, चींटी होय चुन खाय ॥ मोटे काते बिन गूझनी, मिहीं कहाँसे पावे ॥ वा कोरीको दोष न दीजे, मिही बिन मिहीं न पावे ॥ मोटे माटी बसे कुम्हारके, सुगदर मार दिवावे ॥ मोटेको जब मार परत है, तब तिहिँ कौन छुडावे ॥ कूट काटके ले जल बोरें, सुकियन लात लगावे ॥ मिही भई कुम्हार मनमानी, कर गहि चाक फिरावे ॥ कहे कवीर मिहीं कर मनुवां, और मिहीं कहैं पावे ॥ मरजीवा होय जलमें पैठे, मानिक मोती लावे ॥
शब्द १६-संतो मोहि कोई समझावे ॥ जीव ब्रह्म एकही दोई, या मति मोहि बतावे ॥ टे० ॥ एक कहते जाय न संशय, दोय कहेते न बनि आवे ॥ कहूँ कहूँ एक कहूँ कहूँ दो है, शास्त्र दोऊ बिधि गावे ॥ ब्रह्म सनातन भूतक कहिये, श्रीमुख गाय सुनायो ॥ जीव सदा उपजे औ बिनसै, सो क्यों ब्रह्म कहायो ॥ जीव कहाँते आया संतो, कहो कहाँ को जाई ॥ आवत जात चार जुग बीते, गति न काहु लखि पाई ॥ या संशय सतगुरु बिन संतो, को कर कृपा मिटावे ॥ ब्रह्म अनादि जीव मायामें, प्रगट कवीर लखावे ॥ ❁
शब्द १७-संतो अब हम आपा चीन्हा । निज स्वरूप प्राप्त है नितही, अचरज सहित सो कीन्हा ॥ टे० ॥ ना हम मनुष्य देवता
शब्दावली
(७७७)
नाहीं, ना ग्रेही बनखंडी । ब्राह्मण क्षत्री बैसहु नाहीं, ना हम सुद्रे न दंडी ॥ ना हम ज्ञानी चतुर न मूरख, ना हम पंडित पोथी । ना हम सागर ना मरजीवा, ना हम सीप न मोती ॥ ना हम सरगलोकको जाते, ना हम नरक सिधारे ॥ हम सब रूप सवने न्यारा, ना जीता ना हारे ॥ ना हम अमर मरे ना कबहुँ, हम कवीर ज्योंका त्योंही ॥ व्यास कपिलमुनि नामदेवत्रहपि, सबका अनुभव योंही ॥ ✽
शब्द १८-संतो शब्द साधना कीजे । जाहि शब्दसे राम प्रगट भये, सोई शब्द लिख लीजे ॥ टे० ॥ शब्दहि वेद पुरान बखाने, शब्दहि शब्द ठहरावै ॥ शब्दहि सुर नर मुनिजन गावैं, शब्दका भेद न पावैं ॥ शब्दै गुरु शब्द सुन सिष भये, शब्दै विरला बूझै ॥ जोई गुरु सोई सिष आतम, अंतरगत जब सूझै ॥ शब्दै शब्द शब्द बहु अंतर, सार शब्द मथ लीजे ॥ कहै कवीर जोहि सार शब्द नहिं, धूक जीवन जग जीजे ॥
शब्द १९-संतो नैन बान है गाढे । जा तन लगे सोई तन जाने, परे चैन नहिं ठाढे ॥ निस दिन व्याकुल फिरत रैन दिन, काम-कलासो बाढे ॥ आगे समुझ परेगी तोको, जब जम होइ हैं ठाढे ॥ साहेब कवीर मिले गुरु पूरे, भौसागर सो काढे ॥
शब्द २०-अवधू छर अच्छरसो न्यारा, तुम ताका करो बिचारा ॥ टे० ॥ खैंच पवन जो गगन चढावो, करो गुफामें बासा ॥ गगन पवन जब दोनों विनसे, कहाँ रहे जोग तमासा ॥ जब विनसे वह ईडा पिगला, रवि शशि सुषमन नारी ॥ जो उनमुन सो तारी लावो, सो कहाँ रहे तुमारी ॥ मेरुदंड पर डार दुलीचा, जोगी तारी लावै ॥ सो सुमेरकी खाख उडेगी, काचा जोग कमावै ॥ जो या जोति गगनमें दरशे, पानी मद्धे तारा ॥ निघटे नीर बिनसगये
(७७८)
कवीरपंथी—
तारे, निकसो कौन दुवारा ॥ दोय तत्त्वके मध्य बीचमें, अटके मुनिवर जोगी ॥ अच्छरहूकी खबर बतावे, सोई मुक्त बियोगी ॥ वो तो पद दोनोंसे न्यारा, छर अच्छर ना हेरा ॥ कहैं कवीर ताहि लखि गोरख, बहुर न होय जग फेरा ॥
शब्द २१—अवधू कहि बतलाऊँ कैसा । एक अगम अगोचर ऐसा ॥ टे० ॥ जो कहिये सो हैवी नाही, है सो अगम न जाई॥ सेना बैना कासो कहिये, ज्यों गूंगे गुड खाई ॥ काजी हाथ किताब कुराना, पंडित वेद पुराना ॥ वह अच्छर लिखवेमें नाही, मात्रा लगे न काना ॥ दिष्टि न आवे सुष्टि न आवे, बिनस न होय नियारा । ऐसा ज्ञान कथे जग गुरुवा, संतो करो बिचारा ॥ कोई ध्यावे निराकारको, कोई ध्यावे ओंकारा ॥ वह तो पद दोऊसैं न्यारा, जानैं जाननहारा ॥ नाद वेद लौं पठना गुनना, औ चतुराई भीना ॥ कहैं कवीर वह कबहुं न परलै, जो सत बिरलै चीन्हा ॥
शब्द २२—पी ले अवधू होय मतवाला, प्याला प्रेम अमी रसका रे ॥ पाप पुन्य दोड भुगतन आया, कौन तेरा और तू किसका रे ॥ जो दम जीवो नाम गुन गावो, धन जोबन सपना निसिका रे ॥ बालापन सब खेल गवाईया, तरुन भया नारी बसका रे ॥ बृद्धा भया कफ वायुने घेरा, खाट परे तन जात सकारे ॥ नाभि कमलमें है कस्तूरी, कैसे भरम मिटै पशुका रे ॥ विन सतगुरु इतना दुख पाया, जैसे भटकि सुवा मिरगा रे ॥ लख चौरासी उबरन चाहो, तो छाडो कामिनि चसकारे ॥ कहे कवीर सुनो भाई साधो, नख सिख रूप भरा बिषका रे ॥
शब्द २३—करमनते सो करे करता रे ॥ टे० ॥ कबहुं सैन करै सागरमें, कबहुं सोपै सब सरिता रे ॥ कबहुं रावसे करत भिखारी,
शब्दावली
(७७९)
कबहुँ रंक सिर छत्र धरता रे ॥ पुतना को न सुकृत कर आई, गुन औगुन वाके सब हरता रे ॥ ताहि मार बैकुंठ पठाई, बलि-राजासे कौन खता रे ॥ एक पुत्र विन नृप पचि हारे, ताके हते बहुत बनिता रे ॥ साठ पुत्र नारदको दीन्हे, माया त्यागि रहे विरक्ता रे ॥ पंच अतारीके पन राखे, दोष लगाये पतिबरता रे ॥ कहैं कवीर करतासे डरिये, और सकलके झूट मता रे ॥
शब्द २४—करन हारसे डरते रहिये, करतन लागे घडी अरू पल रे ॥ टे० ॥ पलमें देखे महल बावडी, पलमें देखे टीबा थल रे ॥ पलमें मेह बरसते देखे, पलमें देखे चलता हल रे ॥ पलमें पवन अंधेरी चाले पलमें चाले पातल दल रे ॥ दो तपसी जहाँ खड़े पुकारें, ताको दीन्हे अमृत फल रे ॥ पलमें पच्छी बन बन बोलै, पलमें आन कटाया गल रे ॥ पलमें घरसे बाहर काढै, जैसे काढे राजा नल रे ॥ जो कछु किया सो ध्रुवने पाया, किया राज अरू भया अटल रे ॥ साहेब कवीर अवधूसे बोले, तिनहु न पाई पलकि गैल रे ॥
शब्द २५—अवधू सो जोगी गुरु सांचा । प्रभुजीको सेवो मनसा बाचा ॥ टे० ॥ सीलकी सुद्धा सहजकी झोरी, सुरत निरत ले खेले ॥ ज्ञान भक्षुत सबही तन लागा, साहेब अंतर खोलै ॥ क्षमा दंड संतोष मेखला, अम्बर प्याला पीवे ॥ अविनाशी घर भिच्छा मांगे, ऐसे जोगी जीवे ॥ मन थिर राखै आगम खोजे, दुनियाँ संग न लावे ॥ कहे कवीर या जोग जुगतसो, अविनाशी को पावे ॥
शब्द २६—अवधू ऐसो ज्ञान बिचारी । यामें कौन पुरुष को है नारी ॥ टे० ॥ ब्राह्मणके घर नेती धोती, जोगीके घर चेली ॥ कलमा पढ पढ भई तुर्कनी, ताते रहत अकेली ॥ नाँ मैं व्याही नहिँ मैं कुँवारी, पूत जना जन हारी ॥ कारे मूंड कोई ना छांडयो,
(७८०)
कवीरपंथी—
अजहू बालकुवारी॥ ससुर हमारा बाला भोला, सासू बालकुवारी॥ साई हमारा पालन झूलेँ, हमहिं झुलावन हारी॥ ना जाऊँ ससुरार न नैहर रहुँ मैं, कोउ पुरुष संग नाहिं नसाऊँ॥ कहैं कवीर सुनो भाइ साधू, नहीं अंगसे अंग मिलाऊँ॥
शब्द २७—हंसा छोड करमकी आसा । कर्मकाल सब जगत नचावै, फिर फिर करे गरासा ॥ टे० ॥ उपजन विनसन कर्महिं कहिये, कर्महिं जगत बिनासा ॥ कर्महिं काल ब्याल पुनि कर्महिं, कर्महिंका सब त्रासा ॥ जप तप कर्म बांधि जग राखे, पाप पुन्य विस्वासा ॥ कर्महिं देवल तीरथ कहिये, कर्महिं अलह उदासा ॥ कर्महिं जोग ध्यान तप पूजा, कर्म चढावे दासा ॥ कर्महिं दुख सुख जड़ चेतन है, तीन लोक परकासा ॥ कर्महिं देय लेय पुनि कर्महिं, यज्ञ दान रहिवासा ॥ प्रतिमा भूत कर्मके बस है, सुविचार अचार निवासा ॥ कर्म दुखी दालिद्वी कहिये, कर्महिं भोग विलासा ॥ कर्म बिकार राह तज बैठो, कहैं कबीर सुख बासा ॥
शब्द २८—हंसा त्रिगुन कर्मकी मोट । राजस तामस और सतोषुन, बिषम कालके चोट ॥ टे० ॥ द्वादस बान बंध्यो तीनोको, कोई बडे कोइ छोट । चित बुध अंह मोह मद माया, मार चराचर चोट ॥ राग द्वेष भौ बान कामके, अहि रैन दिन कोट । जरा मरन माहुर बंधायो, मरे विषनके चोट ॥ एकै दिष्टि बान सर ताने, चक्रदेव गन कोट ॥ जप तप कोट साधना पूजा, चढे मांस मद रोट ॥ नाना अमल मात जिव माते, ज्ञानहीन तन खोट । कहैं कबीर विन सतगुरु सेवा, करमन बांधल पोट ॥
शब्द २९—हंसा कर ले शब्द वसेरा ॥ रोम रोम जमदूतन घेरो, ज्यों कांटे टिग केरा ॥ टे० ॥ अहिनिंस बसो शब्दके मांही, गुरुमुख शब्द निवेरा ॥ गुरुके वचन शिष्य जो माने, शब्द सुरति सो हेरा ॥
शब्दावली
(७८१)
शब्दसार गुरु वचन संदेशा, ताहि मध्य कर डेरा ॥ गुरु शिष्यको पार उतारै, मिटै सकल जग फेरा ॥ गुरुके शब्द हिये गहि राखै, त्रास करै बहुतेरा ॥ ताके खुले नैन हिरदेके, दिव्य दृष्टि सो हेरा ॥ सदा अधीन रहै संतनसों, जस भुंगी बन फेरा ॥ दरसे ताहि शब्द निसि वासर, जैसे चित्र चितेरा ॥ निसि वासर जागे औ लागे, सिर पर शब्द उजेरा ॥ कहैं कवीर जो सतगुरु सेवे, सो सतगुरु हित तेरा ॥
शब्द ३०—हंसा करले शब्द नवेरा । देह धर करे अनेक चातुरी, मुवैं कहाँ घर तेरा ॥ टे० ॥ आपा भेट आपको खोजो, आपै मध्य बसेरा । आपा भेट आपको देखो, मिटै सकल जम जेरा ॥ छाड़ी कपट चातुरी तामस, छाड़ी कुमति बसेरा ॥ ज्ञान गयंद चढ़ो गुरु गमसो, काल होय तब चेरा ॥ क्षमा शील संतोष धरन धर, शब्द सुरति कर मेला ॥ भव बारिधि जब सहजे बांधो, बांध लेहु दिठ बेरा ॥ सैन उलंघत चले मोह तज, सुखसागर कर डेरा ॥ कहैं कवीर भव बारिध लांधो, दरस होय प्रभु केरा ॥
शब्द ३१—हंसा निंदक जनि सुख आनो । निंदकके संगत मत बैठो, जनि अमृत विष सानो ॥ टे० ॥ साधु जहां तहां निंदा नाहीं, शीलवंत निरबाना ॥ दया प्रीत दीनता बरते, सतसुकृतको ध्याना ॥ मात पिता सुत नारि बंधु हित, इतने संतत जानो ॥ संकट हरन साधुके बाना, सत् वचन फुर मानो ॥ साध सनेह देह सुख पावे, दिन दिन उपजे ज्ञाना ॥ दीन दुखीमें रहै उजागर, जाग्रत साध प्रमाना ॥ निंदा करे औ साध कहावे, सो निंदक अज्ञाना ॥ आप नष्ट औरनको घाले, जमपुर जाय निदाना ॥ सात पांच नौ नेह बिसारे, भँवर गुफा अस्थाना ॥ आवागवन मिटै चौरासी, कहैं कवीर प्रमाना ॥ ✽
(७८२)
कवीरपंथी—
शब्द ३२—हंसा निंदकका भल नाही। निंदकके तो दान पुन्य व्रत, बहु प्रकार छे जाहीं ॥ टे० ॥ जा मुख निंदा करै संतकी, ता मुख जमकी छांहीं ॥ मजा रुधिर चले निसि बासर, कुमि कुवास तन मांहीं ॥ शोक मोह दुख कबहुं न छूटे, रस तजि निरघिन खाहीं ॥ बिपत बिपात कष्ट बहु पीरा, भौसागर बहि जांहीं ॥ निंदकके रच्छक कोऊ नाही, फिर फिर अनल तन डाहीं ॥ गुरु द्रोही साधनको निंदक, नर्क मांहिं बिहसाहीं ॥ जेहि निंदेसो देह हमारी, जो निंदेसो काही ॥ निंदक निंदा कर पछतावे, साध संत हम आही ॥ धरम दया संतोष समावे, क्षमा शील जेहि मांहीं ॥ कहैं कवीर सोइ साध कहावे, सत गुरु संग रहाहीं ॥ ❁
शब्द ३३—हंसा आपमें आप निवेरो ॥ आपन रूप देख आपहिमें, नौ निधि होवे चेरो ॥ टे० ॥ जागृत रहो सदा दिलमाहीं, ज्ञान रसिक ठिग हेरो ॥ आपा मध्ये आप निहारो, आपा मेट सबेरो ॥ सुरति आगे निरति करले, सिद्धि मिलै बहुतेरो ॥ गृह बन बैठे काम धाममें, राह चलत पग हेरो ॥ जागत लागो सोवत सपने, फहम करे फल केरो ॥ सुषमनके घर फहम करे जब, तुरिया चित्त चित्तरे ॥ फहम आगे फहम पाछे, फहम दहिने डेरो ॥ फहम पर जो फहम देखै, सो फहम है मेरो ॥ आठो सिधि नव निधि पावै, सतगुरु फहम निवेरो ॥ कहैं कवीर भृंगीके कीडा, बहुर न कीटहि घेरो ॥ ❁
शब्द ३४—हंसा परख शब्द टकसारा । बिन पारख कोइ पार न पावे, भूलि सुवा संसारा ॥ टे० ॥ बड बड साध जौहरी कहिये, पारख काहु न पाई ॥ आये थे बैपार करनको, घरकी जमा गँवाई ॥ बड बड साधू बानी छानी, राम भाग द्रव्य कीन्हा ॥ रा अच्छर पारख कर लीन्हे, म माया तजि दीन्हा ॥ राम रतन प्रह्लाद
शब्दावली
(७८३)
पारखी, जिन दिढ़ पारख कीन्हा ॥ इंद्रासन सुख आसन कीन्हे, सार वस्तु ना चीन्हा ॥ मुनि शुक्देव परमतत दरसी, आतम लीन न माया ॥ परआतम अजपा गहि चेत, न्यारा भेद न पाया ॥ अब सुन लेव जोहरी मोटा, खरा खोट जे बूझा ॥ शिव समान गोरख है जोगी, तिनहुँको ना सूझा ॥ जो कोह जगमें होय पारखी, सो या पदको बूझे ॥ तीन लोक औ चार लोकलों, सबै ठौर तेहि सूझे ॥ कहैं कवीर हम सबको देखा, सबै लाभको धावै ॥ सतगुरु मिलै तो परख बतावै, ठीक ठौर तब पावै ॥
शब्द ३५—हंसा पूरण गढ चले भाई ॥ कच्चा कोट पक्का दरवाजा, गहिरे जंजीर लगाई ॥ टे० ॥ मस्त हाथी आन झुकाये, डुरमति लेत लडाई ॥ ज्ञान ध्यान दोय अनी बरोबर, यह दोय अदल सिपाई ॥ हिरदय ढाल राव सुमिरनका, जमकी चोट बचाई ॥ गगन घन धुन अनहद बाजे, बिन सीठी कहैं जाई ॥ पाँचो मार करे बस अपना, तापर अदल चलाई ॥ सत्य शब्दको दिढ़ करि राखै, अनुभव कथा सुनाई ॥ कहैं कवीर जो अजपा जपते, तिन्हे काल नहि खाई ॥
शब्द ३६—मनमीता गीता पठ सोई । बिन रसना अश्लोक यादकर, जामें अच्छर अंक न होई ॥ टे० ॥ सुसुम बेदका भेद समुझले, जा पठ पंडित निरमल होई ॥ बाहर भीतर अगम अगोचर, द्वादस आंगुर बांचे सोई ॥ जो पुन ग्यान ब्रह्म विध धारे, आतम तत्त्व रख सुख गोई ॥ एक स्वासमें सकल पसारा, अच्छे नाममें सूरति समोई ॥ कहैं कवीर सोई सत जोगी, सायर गगन मिलावे दोई ॥
शब्द ३७—मन रे तू अबकी बेर सम्हारो । जन्म अनेक दगामें खोयो, बिन गुरु बाजी हारो ॥ टे० ॥ बालापनमें ज्ञान न तनमें, जब जनमें तब बारो ॥ तरुनापन तामसमें खोयो, वृथा किये
(७८४)
कवीरपंथी—
कूच नगारो॥ सुत दारा मतलबके साथी, ताको कहत हमारो॥ तीन लोक औ भुवन चतुरदस, सबहिँ कालको चारो॥ पूर रह्यो जगदीश जगतगुरु, मिले रहे औ न्यारो॥ कहें कवीर सुनो भाई साधू, सब घट देखनहारो॥
शब्द ३८—मन तू समुझके लाद लदनियां॥ पीना होय इहाँ तू पी ले, आगे देश निपनियां॥ टे०॥ सौदा होय सो इहाँ कर लेना, आगे हाट न बनियां॥ बड बड नायक लाद गये हैं, तेरी बात कितनियां॥ जमराजाके दूत फिरत हैं, तोरि डारे गरदनियां॥ घरके लोग जगाती होके, छीन लेत परदनियां॥ कहें कवीर सुनो भाइ साधू, शब्दमें सुर्त समनियां॥
शब्द ३९—मन रे तू मनहीमें उलट समाना॥ टे०॥ या मन हस्ती जंगल बासा, खोज सकल फल खाता॥ जो बस परे महावत केरे, दे अंकुश सुरकाता॥ या मन जोगी या मन भोगी, या मन देवी देवा॥ या मन उलट होत बैरागी, करै गुरुकी सेवा॥ मनके खोज कोई ना पावे, शिव सनकादिक ब्रह्मा॥ अपरंपार पार नहीं पावे, अगम अगोचर महिमा॥ नियरेके दूर दूरके नियरे, जिन जैसा अनुमाना॥ ओरियवतियोके चढे बढेरी, जिनरे पिया तिन जाना॥ अनुभव कथा कौनसे कहिये, है कोई संत विवेकी॥ कहें कवीर गुरुदिये पलीता, वा घर विरला पेखी॥
शब्द ४०—मन तोसे केतक बार कहा । समुझ न गहे गुरुकी शरनागत, औरै रंग रहे॥ टे०॥ ना गुरु भजन ना साधू सेवा, एको ना निबही॥ तू ना लहुने चतुर विवेकी, पय तजि पिवत मही॥ मन मंतंग फिरै कुजनमें, अंकुश शूल सही॥ हीरा रतन अमोल छोडके, कांचसो करत सही॥ जैसे माखी जतन करत है, तनके आड दर्ई॥ आयो व्याधा सब रस ले गयो, आंखिन छार
शब्दावली
(७८५)
दर्द ॥ लापर लंपट औ परनिंदा, या तेरी न गई ॥ कहैं कवीर सुनो भाइ साधू, सुख तिहुँ लोक नहीं ॥
शब्द ४१-मनरे तू धीरज क्यों न धरे । शुभ औ अशुभ कर्म पूरविले, रतिओ न चटै बटै ॥ टे० ॥ होनहार होवेसो होवे, चिंता काहू करे ॥ पशु पंछी औ कीट पतंगा, सबकी खबर करे ॥ गर्भ वासमें रच्छा कीन्ही, सो कैसे विसरे ॥ तुमतो हंस वहि साहेबकी, भटकत काह फिरे ॥ सतगुरु छोड औरको धावे, काज तो नाहिं सरे ॥ मात पिता सुत संपत दारा, मोहके झार जरे ॥ समुझ देख मन कोइ न अपना, धोखामें काहि परे ॥ संतन सरन गहो मोरे मन, कोटिन व्याध हरे ॥ कहै कवीर सुनो भाइ साधू, सहजे सहज जीव तरे ॥
शब्द ४२-मनरे तू बूझ सबद उपदेसा । सार सबद औ गुरुमुख बानी, ताका गहो संदेसा ॥ टे० ॥ जाहि तत्त्वको सुनिवर खोजे, ब्रह्मादिक सो ज्ञानी ॥ सोई तत्त्व गुरु चरनन लागे, भक्ति हेतकर प्रानी ॥ प्रथमें दया दीनता आवे, हांसी मिथ्या त्यागी ॥ आतम चीन्ह परातम जाने, सदा रहे अनुरागी ॥ पद प्रतीत औ शब्द कसोटी, निस दिन बिरह विरागी ॥ जहांको अर्थ तहां लो बूझे, जहां लागी जहां लागी ॥ कहै कवीर यह तत्त्व जो बूझे, माने सीख हमारी ॥ काल दुकाल तहां ना ध्यापे, सदा करें रखवारी ॥
शब्द ४३-मनरे तू सपनेमें सुख पाया ॥ टे० ॥ अगम पंथ गुरुगमका चढना, बिन गुरु पंथ नसाया । सतगुरु शब्द कहा न माने, मार्ग कौन बताया ॥ ईहां आपने हेत जानके, जगमें करत बढाई ॥ एक दिन होय कालका पहरा, बिन गुरु कौन छुड़ाई ॥ या तन जान जरे जस लकरी, सब मिल देय जराई ॥ लोग कुटुम मरघटके साथी, हंस अकेला जाई ॥ झूठ मोह तजिदेरे गवांरा,
(७८६)
कवीरपंथी—
करले नाम सगाई । निहअच्छर लख नाम धनीका, कहें कवीर समुझाई ॥
शब्द ४४-गगन बिच मनको रमना है ॥ टे० ॥ राखत नाद बिंदको बसकर बंक नाल चढ गमना है ॥ बांधत मूल विराजत आसन, उलट पलट सुषमना है ॥ आवे न जाय रहे ना अस्थिर, उलट बहा तब जमना है ॥ कहें कवीर सुनो भाई साधू, जोग जुगतसो मलना है ॥
शब्द ४५-राम तेरो नाम बिना दुख भारी । ताते संतन यही बिचारी ॥ एक बेद कितेबा राते । एक मायाके मदमाते ॥ एक देश देशांतर डोले । एक बहु ज्ञानी हो बोले ॥ एक नागा दूधाधारी । ताते मोहि अचंभा भारी ॥ एक मौनी औ बिसवासी । ताते कटी न जमकी फांसी ॥ एक काया कसत अपारा । एक मरत खरगके धारा ॥ एक किये गुफामें वासा । जानो बहु जीवनकी आसा ॥ कोई आदि जुगादी जागे । जाके जरा मरन भ्रम भागे ॥ कहें कवीर बिचारी । भवसागर उत्तरो पारी ॥
शब्द ४६-राम रासो पंडित मोहि भावे, बिन जिभ्या बेद पढावे ॥ टे० ॥ एक कायथ गुनी कहावे । वह बिन मसी अंक बनावे ॥ वह बिन मशि अंकम होई । तब बहुरि लिखे ना कोई ॥ एक धोबी धोवनहारा । वह बिन जल करत पराारा ॥ वह बिन जल निर्मल होई । तब बहुरि न धोखे कोई ॥ एक बढई बहुते ज्ञानी । वह छीले बिना रुखानी ॥ बिन काठके खंभ बनावे । तब बहुरि न जगमें आवे ॥ एक खेवट बहुत विदानी । वह खेवत है बिन पानी ॥ जब नइयामें नदियां समावे । तब उलटा डंड चढावे ॥ एक पारधी चतुर सयाना । वह तो घात कर असमाना ॥ बिन पिंडके सावज लावे । जब मनहिमें उलट समावे ॥ एक
शब्दावली
(७८७)
माली चतुर विदानी । वह सींचत है विन पानी ॥ विन मूलके फूल ले आवे । तहवाँ मन मधुकर विलमावे ॥ एक सूरई सीवन हारा । वह सीवत है विन तारा ॥ जब सूरई सुमेरु समाना । कहैं कवीर तबै मन माना ॥
शब्द ४७-भाई रे अनी लडे सो सूर । दोय दल बिच खेले गुरु पूरा ॥ ८० ॥ जहाँ जन्म नहीं तहाँ मरना । जम आगे लेखा भरना ॥ जमदूत खडे बैरी तरे । का सोवत नींद घनरे ॥ जे बांध पांच हथियारा । गुरु ज्ञानके स्वर्ग सँवारा ॥ जे मारे पांचों बाना । तब साहेब भये अगवाना ॥ जहाँ तीर तुपक ना छूटे । उहाँ शब्दोंसे गढ लूटे ॥ गढ भीतर हाकम होई । गढ गढ लूट सके ना कोई ॥ जहाँ बजे जुझाऊ बाजा । सब कायर उठ उठ भाजा ॥ कोई शूर लडे मैदाना । जे मार किया घमसाना ॥ मनमार अगम गढ लीन्हा । सत्यव्रत पर डेरा दीन्हा ॥ जहाँ बजे कवीरका ढंका । तब जीत लिया गढ बंका ॥
शब्द ४८-भाई रे मुसलमान सोई दीन । जाको पीर मिले परवीन ॥ ८० ॥ बकरी पांच बसे घट भीतर, ममता सुरगी तीन ॥ इनको मारे जीव उबारे, घटहीमें मक्का मदीन ॥ कहता है सुरदा नहीं खाते, कर हलाल सो खाना । घट भीतरसे जीव निकस गये, सो सुरदा परवाना ॥ जिस कपडेमें छींटा लागे, उसको कहत नपाक । जो सुरगी कीडा चुन खाती, सो कैसे भइ पाक ॥ किया पेशाब उदरके भीतर, जासो जिव उतपानी । जीव मारके मांस भखत है, सो कैसे मन मानी ॥ परघाती पर पीर ना जाने, सो काफिर बेपीरा । कहैं कवीर अंध नर भकुवा, कैसेके लागे तीरा ॥
शब्द ४९-भाई रे मुसलमान होय भूला । मुसल्लमदीन छोडके ऐसा, कुफर माहिं दिल फूला ॥ ८० ॥ मुसलिम सोई कुफर सब