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भारतकोश
कबीरपंथी शब्दावली

कबीरपंथी शब्दावली

Kabirpanthi Shabdavali

स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा

स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)

Devanagarihipublished968 पृष्ठ

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शब्दावली

(७७३)

अछरसे न्यार ॥ को है नाम अनामी को है, को कहिये औतारा ॥ चार अवस्था पाँचौ मुद्रा, जोग करे सो कवना ॥ मुक्त नाम काहे सो कहिये, कौन सार निज पवना ॥ कहो शब्द कहाँसे आया, करत अवाज अमोला ॥ काट कसर होत अंदरमें, कौन राह होय बोला ॥ बाहर भीतर व्यापक को है, सकल ठौरमें बासा ॥ उत्पति परलै कौन करत है, को कर सबे तमासा ॥ येता जुग लखे सो को है, अलख नाम है काको ॥ कहैं कवीर सुनो हो संतो, खोज करो तुम ताको ॥

शब्द ८—संतो सुनो शब्दका ज्वाबा ॥ करिहो छान जान जब पैहो, हासिल सबे हिसाबा ॥ ज्ञान सोई जो आतम चीन्हे, और ज्ञान कछु नाहीं ॥ चार दिसाकी छोड़ आसरा, मगन रहे मन माहीं ॥ ध्यान सोई जो उनमुन दरसे, बालक सम विज्ञाना ॥ या रहनीमें चूके नाहीं, चेहे न मान गुमाना ॥ जीव सोई जो जुग जुग जीवे, उत्पति परलै माहीं ॥ देही धर भरमें चौरासी, निरभय कबहुँ नाहीं ॥ ब्रह्म सोई जो सब घट व्यापक, निअछरको छय नाहीं ॥ ऊंकार आद सबहीके, त्रिगुन तत्त्व ता माहीं ॥ नाम सोई जाके है रूप, निअछर निज नामा ॥ राम कृष्ण औतार आदि लो, धरे निरंजन जामा ॥ शब्द सोई जो सबते न्यारा, त्रिकुटी मोटकसारा ॥ कंठद्वार होय बानी बोलै, निकसे मुखके द्वारा ॥ मनहि अवस्था मनही मुद्रा, मन करता तिहुँ लोका ॥ मुक्त नाम वाहीसो कहिये, मिटगये धंधा धोखा ॥ सार पवन सबहीके ऊपर, पंचासीके पारा ॥ उत्पति परले काल करत है, तासो है वह न्यारा ॥ कहैं कवीर यह लेख बताऊं, संत होय सो बूझे ॥ गुप्त प्रगट औ बाहर भीतर, सकल ठौर तिहि सूझे ॥

शब्द ९—संतो काम सकल जग खाया ॥ टे० ॥ स्वादी जीव