कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
पृष्ठ 788, कुल 968 में से
संदर्भ में पढ़ें(७७४)
कवीरपंथी—
कोई ना बांचे, पर घर गमन कराया ॥ काम लहर काहू ना चीन्हा, कहो कहाँसे आया ॥ जासों भयो ताहि धर खायो, खाता विलंब न लाया ॥ अधारूप ब्रह्म छय कीन्हो, तन दे नाथ गिराया ॥ ब्रह्मा विष्णु मुनिजन जोगी, सकल जीव भरमाया ॥ स्वर्ग मृत्यु पाताल कामवस, चार खान रहु छाया ॥ कहै कवीर काम जोरावर, तीन लोक धर खाया ॥
शब्द १०—संतो निरंजन जाल पसारा ॥ टे० ॥ सरग पाताल रचा मृत्युमंडल, तीन लोक विस्तारा ॥ ब्रह्मा विष्णु शंखु प्रकट कर, तेही दीन्हो सिर भारा ॥ ठांव ठांव तीरथ वरत रोपे, ठगवेको संसारा ॥ चौरासी लक्ष जीव फंदाने, कबहुं न होय उबारा ॥ जाति बारी भसम करि डारी, फिर फिर दे ओतारा ॥ आवागमन रहे उरझाई, बूढे भौ मंझारा ॥ सतगुरु शब्दके बिना चिन्हारी, कैसे उतरे पारा ॥ माया फांस सकल जिव फांसे, आप भये करतारा ॥ अजर लोक जहां पुरुष बिदेही, जहांके मुंदो द्वारा ॥ ब्रह्मा विष्णु महेश्वर देवा, ये ओइले व्योहारा ॥ जो साहबसे निरंजन प्रगटे, सो सबहीसे न्यारा ॥ महाकालसे बांचा चाहो, गहो शब्द टकसारा ॥ कहै कवीर अमर कर राखों, जो निज होय हमारा ॥
शब्द ११—संतो माया तजी न जाई। जैसे बेल बृच्छ लपटाई ॥ टे० ॥ काम तजे तो क्रोध न छूटे, क्रोध तजे तो लोभा ॥ लोभ तजे तो आशा मांड़े, मान बढाई शोभा ॥ ग्रह तजे तो मठी बनावे, उदै अस्त दे फेरी ॥ कुटुम्ब तजे सिख साखा चाहै, मन मायाने घेरी ॥ देखत पैसा हाथ न छूवै, फूटी फावरी ताके ॥ आदर मान कछू ना चाहै, दीनी माया झांके ॥ कर्म संजोग भया ना पावत, तौ लग माया त्यागी ॥ आज्ञा तृष्णा मिटी