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भारतकोश
कबीरपंथी शब्दावली

कबीरपंथी शब्दावली

Kabirpanthi Shabdavali

स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा

स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)

Devanagarihipublished968 पृष्ठ

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पृष्ठ 789

शब्दानवली

(७७५)

न मनकी, का ग्रेही बैरागी ॥ स्वामी सिष सखाके कारण, सौ जोजन चलि जावे ॥ जो छूटे तो सीधे छूटे, हिरदै ज्ञान समावे ॥ माया त्यागे मन बैरागी, सबदमें सुरत समानी ॥ कहें कवीर सोई संत जौहरी, जिन झूठी कर जानी ॥

शब्द १२-संतो सहज समाध भली है ॥ जब सो दया भई सतगुरुकी, सुरत न अनत चली है ॥ टेक ॥ जहँ जहँ जाऊँ सोई परिकरमा, जो कछु करों सो पूजा ॥ ग्रह उद्यान एक करि लेखों, भाव मिटाऊँ दूजा ॥ शब्द निरंतर मनुवा राचे, मलिन वासना त्यागी ॥ जागत सोवत ऊठत बैठत, ऐसी तारी लागी ॥ आँख न मूँदो कान न हँधो, काया कष्ट न धारों ॥ उघरे नैनमें साहेब देखो, सुंदर बदन निहारों ॥ कहें कवीर या उन्मुनि रहनी, जो प्रगट करि गई ॥ दुख सुखके वह परे परमपद, सोई सुखरहा समाई ॥

शब्द १३-संतो एक पंथ दोय बाटा ॥ आगे अंतरगत एक दुबिधा, तहांसो मारग फाटा ॥ टेक ॥ हिंदूके हृद गऊ देहरा, तीरथ व्रत ज्ञाना ॥ बकरी मार मांस मुख मेलै, कहो रामका जाना ॥ रोजा बांग निमाज गुजारे, मक्के मसीद भुलाना ॥ तसबी फेर ततबीर न छोडे, कहो अलह का जाना ॥ अपनी बुधसो छेदे काना, सुन्नत वही कराई ॥ जोरे हुकम अलहके होता, कटी क्यों ना आई ॥ तुरुक सुन्नत ईद्रीका कीन्हा, मूल न काटे मीयां ॥ विन सुन्नत बीबी घर मांही, क्यों राखे विन कीया ॥ हिंदूकी दया मिहर तुरकनकी, दोनों घटसे भागी ॥ वे हलाल वे झटका मारें, आग दोउन घर लागी ॥ सूकर गऊके एकहि लोहू, एक हाड़ इक चामा ॥ कहे कवीर हम दोनों त्यागे, सब घट आतमरामा ॥

शब्द १४-संतो ऐसी भक्त निरासा ॥ जो कोइ चाहैं मुक्ति पदारथ, छाँडे सबकी आसा ॥ टेक ॥ जो माया परपंच न होता,