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भारतकोश
कबीरपंथी शब्दावली

कबीरपंथी शब्दावली

Kabirpanthi Shabdavali

स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा

स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)

Devanagarihipublished968 पृष्ठ

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कवीरपंथी—

नृप जंगल क्यों जाता ॥ दे पाहन पारस तेली घर, दत्तखरी क्यों खाता ॥ रतन जड़ित सुखसेज साहके, नामदेव जलहि बहाया ॥ गोरख कनक कूपमें डारे, गुरु कहैं चानक लाया ॥ गरभवास झुकदेव महासुनि, महासुमत होय जागे ॥ होय अनुराग ब्रह्मसो झगडे, मनबाँछित फल मांगे ॥ साहेब कवीर भक्त परमारथ, अम्बर बेचन आये ॥ ब्रह्मरूप होय शब्द सुनाये, देत गहर ना लाये ॥

शब्द १५-संतो मेंहीं होय सो पावे ॥ टे० ॥ खांड जो बिखरी रेतमें, हस्ती चुनी न जाय ॥ या बूरेका यही महातम, चींटी होय चुन खाय ॥ मोटे काते बिन गूझनी, मिहीं कहाँसे पावे ॥ वा कोरीको दोष न दीजे, मिही बिन मिहीं न पावे ॥ मोटे माटी बसे कुम्हारके, सुगदर मार दिवावे ॥ मोटेको जब मार परत है, तब तिहिँ कौन छुडावे ॥ कूट काटके ले जल बोरें, सुकियन लात लगावे ॥ मिही भई कुम्हार मनमानी, कर गहि चाक फिरावे ॥ कहे कवीर मिहीं कर मनुवां, और मिहीं कहैं पावे ॥ मरजीवा होय जलमें पैठे, मानिक मोती लावे ॥

शब्द १६-संतो मोहि कोई समझावे ॥ जीव ब्रह्म एकही दोई, या मति मोहि बतावे ॥ टे० ॥ एक कहते जाय न संशय, दोय कहेते न बनि आवे ॥ कहूँ कहूँ एक कहूँ कहूँ दो है, शास्त्र दोऊ बिधि गावे ॥ ब्रह्म सनातन भूतक कहिये, श्रीमुख गाय सुनायो ॥ जीव सदा उपजे औ बिनसै, सो क्यों ब्रह्म कहायो ॥ जीव कहाँते आया संतो, कहो कहाँ को जाई ॥ आवत जात चार जुग बीते, गति न काहु लखि पाई ॥ या संशय सतगुरु बिन संतो, को कर कृपा मिटावे ॥ ब्रह्म अनादि जीव मायामें, प्रगट कवीर लखावे ॥ ❁

शब्द १७-संतो अब हम आपा चीन्हा । निज स्वरूप प्राप्त है नितही, अचरज सहित सो कीन्हा ॥ टे० ॥ ना हम मनुष्य देवता