कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
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नाहीं, ना ग्रेही बनखंडी । ब्राह्मण क्षत्री बैसहु नाहीं, ना हम सुद्रे न दंडी ॥ ना हम ज्ञानी चतुर न मूरख, ना हम पंडित पोथी । ना हम सागर ना मरजीवा, ना हम सीप न मोती ॥ ना हम सरगलोकको जाते, ना हम नरक सिधारे ॥ हम सब रूप सवने न्यारा, ना जीता ना हारे ॥ ना हम अमर मरे ना कबहुँ, हम कवीर ज्योंका त्योंही ॥ व्यास कपिलमुनि नामदेवत्रहपि, सबका अनुभव योंही ॥ ✽
शब्द १८-संतो शब्द साधना कीजे । जाहि शब्दसे राम प्रगट भये, सोई शब्द लिख लीजे ॥ टे० ॥ शब्दहि वेद पुरान बखाने, शब्दहि शब्द ठहरावै ॥ शब्दहि सुर नर मुनिजन गावैं, शब्दका भेद न पावैं ॥ शब्दै गुरु शब्द सुन सिष भये, शब्दै विरला बूझै ॥ जोई गुरु सोई सिष आतम, अंतरगत जब सूझै ॥ शब्दै शब्द शब्द बहु अंतर, सार शब्द मथ लीजे ॥ कहै कवीर जोहि सार शब्द नहिं, धूक जीवन जग जीजे ॥
शब्द १९-संतो नैन बान है गाढे । जा तन लगे सोई तन जाने, परे चैन नहिं ठाढे ॥ निस दिन व्याकुल फिरत रैन दिन, काम-कलासो बाढे ॥ आगे समुझ परेगी तोको, जब जम होइ हैं ठाढे ॥ साहेब कवीर मिले गुरु पूरे, भौसागर सो काढे ॥
शब्द २०-अवधू छर अच्छरसो न्यारा, तुम ताका करो बिचारा ॥ टे० ॥ खैंच पवन जो गगन चढावो, करो गुफामें बासा ॥ गगन पवन जब दोनों विनसे, कहाँ रहे जोग तमासा ॥ जब विनसे वह ईडा पिगला, रवि शशि सुषमन नारी ॥ जो उनमुन सो तारी लावो, सो कहाँ रहे तुमारी ॥ मेरुदंड पर डार दुलीचा, जोगी तारी लावै ॥ सो सुमेरकी खाख उडेगी, काचा जोग कमावै ॥ जो या जोति गगनमें दरशे, पानी मद्धे तारा ॥ निघटे नीर बिनसगये