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भारतकोश
कबीरपंथी शब्दावली

कबीरपंथी शब्दावली

Kabirpanthi Shabdavali

स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा

स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)

Devanagarihipublished968 पृष्ठ

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कवीरपंथी—

तारे, निकसो कौन दुवारा ॥ दोय तत्त्वके मध्य बीचमें, अटके मुनिवर जोगी ॥ अच्छरहूकी खबर बतावे, सोई मुक्त बियोगी ॥ वो तो पद दोनोंसे न्यारा, छर अच्छर ना हेरा ॥ कहैं कवीर ताहि लखि गोरख, बहुर न होय जग फेरा ॥

शब्द २१—अवधू कहि बतलाऊँ कैसा । एक अगम अगोचर ऐसा ॥ टे० ॥ जो कहिये सो हैवी नाही, है सो अगम न जाई॥ सेना बैना कासो कहिये, ज्यों गूंगे गुड खाई ॥ काजी हाथ किताब कुराना, पंडित वेद पुराना ॥ वह अच्छर लिखवेमें नाही, मात्रा लगे न काना ॥ दिष्टि न आवे सुष्टि न आवे, बिनस न होय नियारा । ऐसा ज्ञान कथे जग गुरुवा, संतो करो बिचारा ॥ कोई ध्यावे निराकारको, कोई ध्यावे ओंकारा ॥ वह तो पद दोऊसैं न्यारा, जानैं जाननहारा ॥ नाद वेद लौं पठना गुनना, औ चतुराई भीना ॥ कहैं कवीर वह कबहुं न परलै, जो सत बिरलै चीन्हा ॥

शब्द २२—पी ले अवधू होय मतवाला, प्याला प्रेम अमी रसका रे ॥ पाप पुन्य दोड भुगतन आया, कौन तेरा और तू किसका रे ॥ जो दम जीवो नाम गुन गावो, धन जोबन सपना निसिका रे ॥ बालापन सब खेल गवाईया, तरुन भया नारी बसका रे ॥ बृद्धा भया कफ वायुने घेरा, खाट परे तन जात सकारे ॥ नाभि कमलमें है कस्तूरी, कैसे भरम मिटै पशुका रे ॥ विन सतगुरु इतना दुख पाया, जैसे भटकि सुवा मिरगा रे ॥ लख चौरासी उबरन चाहो, तो छाडो कामिनि चसकारे ॥ कहे कवीर सुनो भाई साधो, नख सिख रूप भरा बिषका रे ॥

शब्द २३—करमनते सो करे करता रे ॥ टे० ॥ कबहुं सैन करै सागरमें, कबहुं सोपै सब सरिता रे ॥ कबहुं रावसे करत भिखारी,

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