कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
(७७८)
कवीरपंथी—
तारे, निकसो कौन दुवारा ॥ दोय तत्त्वके मध्य बीचमें, अटके मुनिवर जोगी ॥ अच्छरहूकी खबर बतावे, सोई मुक्त बियोगी ॥ वो तो पद दोनोंसे न्यारा, छर अच्छर ना हेरा ॥ कहैं कवीर ताहि लखि गोरख, बहुर न होय जग फेरा ॥
शब्द २१—अवधू कहि बतलाऊँ कैसा । एक अगम अगोचर ऐसा ॥ टे० ॥ जो कहिये सो हैवी नाही, है सो अगम न जाई॥ सेना बैना कासो कहिये, ज्यों गूंगे गुड खाई ॥ काजी हाथ किताब कुराना, पंडित वेद पुराना ॥ वह अच्छर लिखवेमें नाही, मात्रा लगे न काना ॥ दिष्टि न आवे सुष्टि न आवे, बिनस न होय नियारा । ऐसा ज्ञान कथे जग गुरुवा, संतो करो बिचारा ॥ कोई ध्यावे निराकारको, कोई ध्यावे ओंकारा ॥ वह तो पद दोऊसैं न्यारा, जानैं जाननहारा ॥ नाद वेद लौं पठना गुनना, औ चतुराई भीना ॥ कहैं कवीर वह कबहुं न परलै, जो सत बिरलै चीन्हा ॥
शब्द २२—पी ले अवधू होय मतवाला, प्याला प्रेम अमी रसका रे ॥ पाप पुन्य दोड भुगतन आया, कौन तेरा और तू किसका रे ॥ जो दम जीवो नाम गुन गावो, धन जोबन सपना निसिका रे ॥ बालापन सब खेल गवाईया, तरुन भया नारी बसका रे ॥ बृद्धा भया कफ वायुने घेरा, खाट परे तन जात सकारे ॥ नाभि कमलमें है कस्तूरी, कैसे भरम मिटै पशुका रे ॥ विन सतगुरु इतना दुख पाया, जैसे भटकि सुवा मिरगा रे ॥ लख चौरासी उबरन चाहो, तो छाडो कामिनि चसकारे ॥ कहे कवीर सुनो भाई साधो, नख सिख रूप भरा बिषका रे ॥
शब्द २३—करमनते सो करे करता रे ॥ टे० ॥ कबहुं सैन करै सागरमें, कबहुं सोपै सब सरिता रे ॥ कबहुं रावसे करत भिखारी,
शब्दावली
(७७९)
कबहुँ रंक सिर छत्र धरता रे ॥ पुतना को न सुकृत कर आई, गुन औगुन वाके सब हरता रे ॥ ताहि मार बैकुंठ पठाई, बलि-राजासे कौन खता रे ॥ एक पुत्र विन नृप पचि हारे, ताके हते बहुत बनिता रे ॥ साठ पुत्र नारदको दीन्हे, माया त्यागि रहे विरक्ता रे ॥ पंच अतारीके पन राखे, दोष लगाये पतिबरता रे ॥ कहैं कवीर करतासे डरिये, और सकलके झूट मता रे ॥
शब्द २४—करन हारसे डरते रहिये, करतन लागे घडी अरू पल रे ॥ टे० ॥ पलमें देखे महल बावडी, पलमें देखे टीबा थल रे ॥ पलमें मेह बरसते देखे, पलमें देखे चलता हल रे ॥ पलमें पवन अंधेरी चाले पलमें चाले पातल दल रे ॥ दो तपसी जहाँ खड़े पुकारें, ताको दीन्हे अमृत फल रे ॥ पलमें पच्छी बन बन बोलै, पलमें आन कटाया गल रे ॥ पलमें घरसे बाहर काढै, जैसे काढे राजा नल रे ॥ जो कछु किया सो ध्रुवने पाया, किया राज अरू भया अटल रे ॥ साहेब कवीर अवधूसे बोले, तिनहु न पाई पलकि गैल रे ॥
शब्द २५—अवधू सो जोगी गुरु सांचा । प्रभुजीको सेवो मनसा बाचा ॥ टे० ॥ सीलकी सुद्धा सहजकी झोरी, सुरत निरत ले खेले ॥ ज्ञान भक्षुत सबही तन लागा, साहेब अंतर खोलै ॥ क्षमा दंड संतोष मेखला, अम्बर प्याला पीवे ॥ अविनाशी घर भिच्छा मांगे, ऐसे जोगी जीवे ॥ मन थिर राखै आगम खोजे, दुनियाँ संग न लावे ॥ कहे कवीर या जोग जुगतसो, अविनाशी को पावे ॥
शब्द २६—अवधू ऐसो ज्ञान बिचारी । यामें कौन पुरुष को है नारी ॥ टे० ॥ ब्राह्मणके घर नेती धोती, जोगीके घर चेली ॥ कलमा पढ पढ भई तुर्कनी, ताते रहत अकेली ॥ नाँ मैं व्याही नहिँ मैं कुँवारी, पूत जना जन हारी ॥ कारे मूंड कोई ना छांडयो,
(७८०)
कवीरपंथी—
अजहू बालकुवारी॥ ससुर हमारा बाला भोला, सासू बालकुवारी॥ साई हमारा पालन झूलेँ, हमहिं झुलावन हारी॥ ना जाऊँ ससुरार न नैहर रहुँ मैं, कोउ पुरुष संग नाहिं नसाऊँ॥ कहैं कवीर सुनो भाइ साधू, नहीं अंगसे अंग मिलाऊँ॥
शब्द २७—हंसा छोड करमकी आसा । कर्मकाल सब जगत नचावै, फिर फिर करे गरासा ॥ टे० ॥ उपजन विनसन कर्महिं कहिये, कर्महिं जगत बिनासा ॥ कर्महिं काल ब्याल पुनि कर्महिं, कर्महिंका सब त्रासा ॥ जप तप कर्म बांधि जग राखे, पाप पुन्य विस्वासा ॥ कर्महिं देवल तीरथ कहिये, कर्महिं अलह उदासा ॥ कर्महिं जोग ध्यान तप पूजा, कर्म चढावे दासा ॥ कर्महिं दुख सुख जड़ चेतन है, तीन लोक परकासा ॥ कर्महिं देय लेय पुनि कर्महिं, यज्ञ दान रहिवासा ॥ प्रतिमा भूत कर्मके बस है, सुविचार अचार निवासा ॥ कर्म दुखी दालिद्वी कहिये, कर्महिं भोग विलासा ॥ कर्म बिकार राह तज बैठो, कहैं कबीर सुख बासा ॥
शब्द २८—हंसा त्रिगुन कर्मकी मोट । राजस तामस और सतोषुन, बिषम कालके चोट ॥ टे० ॥ द्वादस बान बंध्यो तीनोको, कोई बडे कोइ छोट । चित बुध अंह मोह मद माया, मार चराचर चोट ॥ राग द्वेष भौ बान कामके, अहि रैन दिन कोट । जरा मरन माहुर बंधायो, मरे विषनके चोट ॥ एकै दिष्टि बान सर ताने, चक्रदेव गन कोट ॥ जप तप कोट साधना पूजा, चढे मांस मद रोट ॥ नाना अमल मात जिव माते, ज्ञानहीन तन खोट । कहैं कबीर विन सतगुरु सेवा, करमन बांधल पोट ॥
शब्द २९—हंसा कर ले शब्द वसेरा ॥ रोम रोम जमदूतन घेरो, ज्यों कांटे टिग केरा ॥ टे० ॥ अहिनिंस बसो शब्दके मांही, गुरुमुख शब्द निवेरा ॥ गुरुके वचन शिष्य जो माने, शब्द सुरति सो हेरा ॥
शब्दावली
(७८१)
शब्दसार गुरु वचन संदेशा, ताहि मध्य कर डेरा ॥ गुरु शिष्यको पार उतारै, मिटै सकल जग फेरा ॥ गुरुके शब्द हिये गहि राखै, त्रास करै बहुतेरा ॥ ताके खुले नैन हिरदेके, दिव्य दृष्टि सो हेरा ॥ सदा अधीन रहै संतनसों, जस भुंगी बन फेरा ॥ दरसे ताहि शब्द निसि वासर, जैसे चित्र चितेरा ॥ निसि वासर जागे औ लागे, सिर पर शब्द उजेरा ॥ कहैं कवीर जो सतगुरु सेवे, सो सतगुरु हित तेरा ॥
शब्द ३०—हंसा करले शब्द नवेरा । देह धर करे अनेक चातुरी, मुवैं कहाँ घर तेरा ॥ टे० ॥ आपा भेट आपको खोजो, आपै मध्य बसेरा । आपा भेट आपको देखो, मिटै सकल जम जेरा ॥ छाड़ी कपट चातुरी तामस, छाड़ी कुमति बसेरा ॥ ज्ञान गयंद चढ़ो गुरु गमसो, काल होय तब चेरा ॥ क्षमा शील संतोष धरन धर, शब्द सुरति कर मेला ॥ भव बारिधि जब सहजे बांधो, बांध लेहु दिठ बेरा ॥ सैन उलंघत चले मोह तज, सुखसागर कर डेरा ॥ कहैं कवीर भव बारिध लांधो, दरस होय प्रभु केरा ॥
शब्द ३१—हंसा निंदक जनि सुख आनो । निंदकके संगत मत बैठो, जनि अमृत विष सानो ॥ टे० ॥ साधु जहां तहां निंदा नाहीं, शीलवंत निरबाना ॥ दया प्रीत दीनता बरते, सतसुकृतको ध्याना ॥ मात पिता सुत नारि बंधु हित, इतने संतत जानो ॥ संकट हरन साधुके बाना, सत् वचन फुर मानो ॥ साध सनेह देह सुख पावे, दिन दिन उपजे ज्ञाना ॥ दीन दुखीमें रहै उजागर, जाग्रत साध प्रमाना ॥ निंदा करे औ साध कहावे, सो निंदक अज्ञाना ॥ आप नष्ट औरनको घाले, जमपुर जाय निदाना ॥ सात पांच नौ नेह बिसारे, भँवर गुफा अस्थाना ॥ आवागवन मिटै चौरासी, कहैं कवीर प्रमाना ॥ ✽
(७८२)
कवीरपंथी—
शब्द ३२—हंसा निंदकका भल नाही। निंदकके तो दान पुन्य व्रत, बहु प्रकार छे जाहीं ॥ टे० ॥ जा मुख निंदा करै संतकी, ता मुख जमकी छांहीं ॥ मजा रुधिर चले निसि बासर, कुमि कुवास तन मांहीं ॥ शोक मोह दुख कबहुं न छूटे, रस तजि निरघिन खाहीं ॥ बिपत बिपात कष्ट बहु पीरा, भौसागर बहि जांहीं ॥ निंदकके रच्छक कोऊ नाही, फिर फिर अनल तन डाहीं ॥ गुरु द्रोही साधनको निंदक, नर्क मांहिं बिहसाहीं ॥ जेहि निंदेसो देह हमारी, जो निंदेसो काही ॥ निंदक निंदा कर पछतावे, साध संत हम आही ॥ धरम दया संतोष समावे, क्षमा शील जेहि मांहीं ॥ कहैं कवीर सोइ साध कहावे, सत गुरु संग रहाहीं ॥ ❁
शब्द ३३—हंसा आपमें आप निवेरो ॥ आपन रूप देख आपहिमें, नौ निधि होवे चेरो ॥ टे० ॥ जागृत रहो सदा दिलमाहीं, ज्ञान रसिक ठिग हेरो ॥ आपा मध्ये आप निहारो, आपा मेट सबेरो ॥ सुरति आगे निरति करले, सिद्धि मिलै बहुतेरो ॥ गृह बन बैठे काम धाममें, राह चलत पग हेरो ॥ जागत लागो सोवत सपने, फहम करे फल केरो ॥ सुषमनके घर फहम करे जब, तुरिया चित्त चित्तरे ॥ फहम आगे फहम पाछे, फहम दहिने डेरो ॥ फहम पर जो फहम देखै, सो फहम है मेरो ॥ आठो सिधि नव निधि पावै, सतगुरु फहम निवेरो ॥ कहैं कवीर भृंगीके कीडा, बहुर न कीटहि घेरो ॥ ❁
शब्द ३४—हंसा परख शब्द टकसारा । बिन पारख कोइ पार न पावे, भूलि सुवा संसारा ॥ टे० ॥ बड बड साध जौहरी कहिये, पारख काहु न पाई ॥ आये थे बैपार करनको, घरकी जमा गँवाई ॥ बड बड साधू बानी छानी, राम भाग द्रव्य कीन्हा ॥ रा अच्छर पारख कर लीन्हे, म माया तजि दीन्हा ॥ राम रतन प्रह्लाद
शब्दावली
(७८३)
पारखी, जिन दिढ़ पारख कीन्हा ॥ इंद्रासन सुख आसन कीन्हे, सार वस्तु ना चीन्हा ॥ मुनि शुक्देव परमतत दरसी, आतम लीन न माया ॥ परआतम अजपा गहि चेत, न्यारा भेद न पाया ॥ अब सुन लेव जोहरी मोटा, खरा खोट जे बूझा ॥ शिव समान गोरख है जोगी, तिनहुँको ना सूझा ॥ जो कोह जगमें होय पारखी, सो या पदको बूझे ॥ तीन लोक औ चार लोकलों, सबै ठौर तेहि सूझे ॥ कहैं कवीर हम सबको देखा, सबै लाभको धावै ॥ सतगुरु मिलै तो परख बतावै, ठीक ठौर तब पावै ॥
शब्द ३५—हंसा पूरण गढ चले भाई ॥ कच्चा कोट पक्का दरवाजा, गहिरे जंजीर लगाई ॥ टे० ॥ मस्त हाथी आन झुकाये, डुरमति लेत लडाई ॥ ज्ञान ध्यान दोय अनी बरोबर, यह दोय अदल सिपाई ॥ हिरदय ढाल राव सुमिरनका, जमकी चोट बचाई ॥ गगन घन धुन अनहद बाजे, बिन सीठी कहैं जाई ॥ पाँचो मार करे बस अपना, तापर अदल चलाई ॥ सत्य शब्दको दिढ़ करि राखै, अनुभव कथा सुनाई ॥ कहैं कवीर जो अजपा जपते, तिन्हे काल नहि खाई ॥
शब्द ३६—मनमीता गीता पठ सोई । बिन रसना अश्लोक यादकर, जामें अच्छर अंक न होई ॥ टे० ॥ सुसुम बेदका भेद समुझले, जा पठ पंडित निरमल होई ॥ बाहर भीतर अगम अगोचर, द्वादस आंगुर बांचे सोई ॥ जो पुन ग्यान ब्रह्म विध धारे, आतम तत्त्व रख सुख गोई ॥ एक स्वासमें सकल पसारा, अच्छे नाममें सूरति समोई ॥ कहैं कवीर सोई सत जोगी, सायर गगन मिलावे दोई ॥
शब्द ३७—मन रे तू अबकी बेर सम्हारो । जन्म अनेक दगामें खोयो, बिन गुरु बाजी हारो ॥ टे० ॥ बालापनमें ज्ञान न तनमें, जब जनमें तब बारो ॥ तरुनापन तामसमें खोयो, वृथा किये
(७८४)
कवीरपंथी—
कूच नगारो॥ सुत दारा मतलबके साथी, ताको कहत हमारो॥ तीन लोक औ भुवन चतुरदस, सबहिँ कालको चारो॥ पूर रह्यो जगदीश जगतगुरु, मिले रहे औ न्यारो॥ कहें कवीर सुनो भाई साधू, सब घट देखनहारो॥
शब्द ३८—मन तू समुझके लाद लदनियां॥ पीना होय इहाँ तू पी ले, आगे देश निपनियां॥ टे०॥ सौदा होय सो इहाँ कर लेना, आगे हाट न बनियां॥ बड बड नायक लाद गये हैं, तेरी बात कितनियां॥ जमराजाके दूत फिरत हैं, तोरि डारे गरदनियां॥ घरके लोग जगाती होके, छीन लेत परदनियां॥ कहें कवीर सुनो भाइ साधू, शब्दमें सुर्त समनियां॥
शब्द ३९—मन रे तू मनहीमें उलट समाना॥ टे०॥ या मन हस्ती जंगल बासा, खोज सकल फल खाता॥ जो बस परे महावत केरे, दे अंकुश सुरकाता॥ या मन जोगी या मन भोगी, या मन देवी देवा॥ या मन उलट होत बैरागी, करै गुरुकी सेवा॥ मनके खोज कोई ना पावे, शिव सनकादिक ब्रह्मा॥ अपरंपार पार नहीं पावे, अगम अगोचर महिमा॥ नियरेके दूर दूरके नियरे, जिन जैसा अनुमाना॥ ओरियवतियोके चढे बढेरी, जिनरे पिया तिन जाना॥ अनुभव कथा कौनसे कहिये, है कोई संत विवेकी॥ कहें कवीर गुरुदिये पलीता, वा घर विरला पेखी॥
शब्द ४०—मन तोसे केतक बार कहा । समुझ न गहे गुरुकी शरनागत, औरै रंग रहे॥ टे०॥ ना गुरु भजन ना साधू सेवा, एको ना निबही॥ तू ना लहुने चतुर विवेकी, पय तजि पिवत मही॥ मन मंतंग फिरै कुजनमें, अंकुश शूल सही॥ हीरा रतन अमोल छोडके, कांचसो करत सही॥ जैसे माखी जतन करत है, तनके आड दर्ई॥ आयो व्याधा सब रस ले गयो, आंखिन छार
शब्दावली
(७८५)
दर्द ॥ लापर लंपट औ परनिंदा, या तेरी न गई ॥ कहैं कवीर सुनो भाइ साधू, सुख तिहुँ लोक नहीं ॥
शब्द ४१-मनरे तू धीरज क्यों न धरे । शुभ औ अशुभ कर्म पूरविले, रतिओ न चटै बटै ॥ टे० ॥ होनहार होवेसो होवे, चिंता काहू करे ॥ पशु पंछी औ कीट पतंगा, सबकी खबर करे ॥ गर्भ वासमें रच्छा कीन्ही, सो कैसे विसरे ॥ तुमतो हंस वहि साहेबकी, भटकत काह फिरे ॥ सतगुरु छोड औरको धावे, काज तो नाहिं सरे ॥ मात पिता सुत संपत दारा, मोहके झार जरे ॥ समुझ देख मन कोइ न अपना, धोखामें काहि परे ॥ संतन सरन गहो मोरे मन, कोटिन व्याध हरे ॥ कहै कवीर सुनो भाइ साधू, सहजे सहज जीव तरे ॥
शब्द ४२-मनरे तू बूझ सबद उपदेसा । सार सबद औ गुरुमुख बानी, ताका गहो संदेसा ॥ टे० ॥ जाहि तत्त्वको सुनिवर खोजे, ब्रह्मादिक सो ज्ञानी ॥ सोई तत्त्व गुरु चरनन लागे, भक्ति हेतकर प्रानी ॥ प्रथमें दया दीनता आवे, हांसी मिथ्या त्यागी ॥ आतम चीन्ह परातम जाने, सदा रहे अनुरागी ॥ पद प्रतीत औ शब्द कसोटी, निस दिन बिरह विरागी ॥ जहांको अर्थ तहां लो बूझे, जहां लागी जहां लागी ॥ कहै कवीर यह तत्त्व जो बूझे, माने सीख हमारी ॥ काल दुकाल तहां ना ध्यापे, सदा करें रखवारी ॥
शब्द ४३-मनरे तू सपनेमें सुख पाया ॥ टे० ॥ अगम पंथ गुरुगमका चढना, बिन गुरु पंथ नसाया । सतगुरु शब्द कहा न माने, मार्ग कौन बताया ॥ ईहां आपने हेत जानके, जगमें करत बढाई ॥ एक दिन होय कालका पहरा, बिन गुरु कौन छुड़ाई ॥ या तन जान जरे जस लकरी, सब मिल देय जराई ॥ लोग कुटुम मरघटके साथी, हंस अकेला जाई ॥ झूठ मोह तजिदेरे गवांरा,
(७८६)
कवीरपंथी—
करले नाम सगाई । निहअच्छर लख नाम धनीका, कहें कवीर समुझाई ॥
शब्द ४४-गगन बिच मनको रमना है ॥ टे० ॥ राखत नाद बिंदको बसकर बंक नाल चढ गमना है ॥ बांधत मूल विराजत आसन, उलट पलट सुषमना है ॥ आवे न जाय रहे ना अस्थिर, उलट बहा तब जमना है ॥ कहें कवीर सुनो भाई साधू, जोग जुगतसो मलना है ॥
शब्द ४५-राम तेरो नाम बिना दुख भारी । ताते संतन यही बिचारी ॥ एक बेद कितेबा राते । एक मायाके मदमाते ॥ एक देश देशांतर डोले । एक बहु ज्ञानी हो बोले ॥ एक नागा दूधाधारी । ताते मोहि अचंभा भारी ॥ एक मौनी औ बिसवासी । ताते कटी न जमकी फांसी ॥ एक काया कसत अपारा । एक मरत खरगके धारा ॥ एक किये गुफामें वासा । जानो बहु जीवनकी आसा ॥ कोई आदि जुगादी जागे । जाके जरा मरन भ्रम भागे ॥ कहें कवीर बिचारी । भवसागर उत्तरो पारी ॥
शब्द ४६-राम रासो पंडित मोहि भावे, बिन जिभ्या बेद पढावे ॥ टे० ॥ एक कायथ गुनी कहावे । वह बिन मसी अंक बनावे ॥ वह बिन मशि अंकम होई । तब बहुरि लिखे ना कोई ॥ एक धोबी धोवनहारा । वह बिन जल करत पराारा ॥ वह बिन जल निर्मल होई । तब बहुरि न धोखे कोई ॥ एक बढई बहुते ज्ञानी । वह छीले बिना रुखानी ॥ बिन काठके खंभ बनावे । तब बहुरि न जगमें आवे ॥ एक खेवट बहुत विदानी । वह खेवत है बिन पानी ॥ जब नइयामें नदियां समावे । तब उलटा डंड चढावे ॥ एक पारधी चतुर सयाना । वह तो घात कर असमाना ॥ बिन पिंडके सावज लावे । जब मनहिमें उलट समावे ॥ एक
शब्दावली
(७८७)
माली चतुर विदानी । वह सींचत है विन पानी ॥ विन मूलके फूल ले आवे । तहवाँ मन मधुकर विलमावे ॥ एक सूरई सीवन हारा । वह सीवत है विन तारा ॥ जब सूरई सुमेरु समाना । कहैं कवीर तबै मन माना ॥
शब्द ४७-भाई रे अनी लडे सो सूर । दोय दल बिच खेले गुरु पूरा ॥ ८० ॥ जहाँ जन्म नहीं तहाँ मरना । जम आगे लेखा भरना ॥ जमदूत खडे बैरी तरे । का सोवत नींद घनरे ॥ जे बांध पांच हथियारा । गुरु ज्ञानके स्वर्ग सँवारा ॥ जे मारे पांचों बाना । तब साहेब भये अगवाना ॥ जहाँ तीर तुपक ना छूटे । उहाँ शब्दोंसे गढ लूटे ॥ गढ भीतर हाकम होई । गढ गढ लूट सके ना कोई ॥ जहाँ बजे जुझाऊ बाजा । सब कायर उठ उठ भाजा ॥ कोई शूर लडे मैदाना । जे मार किया घमसाना ॥ मनमार अगम गढ लीन्हा । सत्यव्रत पर डेरा दीन्हा ॥ जहाँ बजे कवीरका ढंका । तब जीत लिया गढ बंका ॥
शब्द ४८-भाई रे मुसलमान सोई दीन । जाको पीर मिले परवीन ॥ ८० ॥ बकरी पांच बसे घट भीतर, ममता सुरगी तीन ॥ इनको मारे जीव उबारे, घटहीमें मक्का मदीन ॥ कहता है सुरदा नहीं खाते, कर हलाल सो खाना । घट भीतरसे जीव निकस गये, सो सुरदा परवाना ॥ जिस कपडेमें छींटा लागे, उसको कहत नपाक । जो सुरगी कीडा चुन खाती, सो कैसे भइ पाक ॥ किया पेशाब उदरके भीतर, जासो जिव उतपानी । जीव मारके मांस भखत है, सो कैसे मन मानी ॥ परघाती पर पीर ना जाने, सो काफिर बेपीरा । कहैं कवीर अंध नर भकुवा, कैसेके लागे तीरा ॥
शब्द ४९-भाई रे मुसलमान होय भूला । मुसल्लमदीन छोडके ऐसा, कुफर माहिं दिल फूला ॥ ८० ॥ मुसलिम सोई कुफर सब
(७८८)
कबीरपंथी-
छाडे, जीव दगा ना देवै । दीन ईमान दया दिल धरिके, इलम इलाही लेवै ॥ आला इलम नहीं दिल आया, क्या अछा गोहराया ॥ हल किया हक ना हाजा, छूरी हलक हिलाया ॥ रब्ब रहीम करीम काहेका, अकरम कफ़र कराया ॥ रोजा वजू निबाज नबीका, सो ऐसा डहकाया ॥ हैदर हैदर करता डोलै, दर दर भया दिवाना ॥ जिस घरसे वह हैदर आया, तिस घर खबर न जाना ॥ का हैदर कादर है दरका, का हजरत का हक्का ॥ जियरत करे जहाँ जुल्मतकी, खबर नहीं दिल भक्का ॥ कवर मुकरबा महजिद सुरदा, पूज मलीदा सेती ॥ सुरगी बकरी गाय जबह कर, भया जाय जम हेती ॥ भया सुरीद न सुरदा छूटा, कैसा पीर तुम्हारा ॥ बदबखती बद बाद गई ना, गयो इमान खुवारा ॥ सुन्नत जबह न किया महम्मद, जे कुरान जग लाया ॥ रोजा वजू निमाज बंदगी, कलमा पांच पढाया ॥ मिहरबान दिल भया महम्मद, मारत जीव बचाया ॥ हिरनी और फाखता फांसी, जामिन देह छुडाया ॥ तुमको कौन सिखाया ऐसा, किया आप मनभाया ॥ दोजक जुबू स्वादके खातर, जीव जबह कर खाया ॥ जो कोइ कहे इब्राहीम, कीन्ह तो ऐसा ना कीन्हा ॥ हक हुकुम हक्के खातिर, बेटाका गल दीन्हा ॥ आंख मुंद बेटा गल देते, हुम्मा बदले आया ॥ मरा नहीं हरामी बोला, गुसा इब्राहिम लाया ॥ छूरी फैंक दर्ई असमाने, उहाँ टीडी गल दीना ॥ परी आय छूरी जल भीतर, दियो आय गल मीना ॥ हुमा टीडी मछली तीनो, बदलेमें गल दीन्हा ॥ फजल भया फरजंद बचाया, फिर ऐसा ना कीन्हा ॥ अपने बदले जो गल देवै, ताहि मार बया खाना ॥ कहैं कबीर सुनो भाइ मुसलम, रहिमत कहाँ समाना ॥
शब्द ५०-जोगियासे मेरा दिल लाग ॥ ८० ॥ जबसो प्रीति
शब्दावली
(७८९)
लग्गी जोगियासे, भयचं हंस रहेचं ना कागा ॥ जोगियाके कारन जोग कमाऊं, आठ पहर रहों जागा ॥ जब तब जोगिया मौज करत है, पाय अमर पद धागा ॥ कहें कवीर सुनो भाई साधू, जरा मरन अम भागा ॥
शब्द ५१—जोगी नाम न जाना हियेसे ॥ टे० ॥ काह भये गल कंठी डारे, काह तिलक सिर दियेसे ॥ काह भये सिर जटा बढाये, का गुदरीके सियेसे ॥ काह भये वन बनके डोले, का दूबी रंग पियेसे ॥ काह भये काशीके वासे, का गंगाजल लियेसे ॥ कहें कवीर सुनो भाई साधू, का रे बहुत दिन जियेसे ॥
शब्द ५२—प्रभु तो भगतीके बस भाई । जात बरन कुल रीझत नाही, ना रीझे चतुराई ॥ टे० ॥ करमा को न अचार कियो है, कब काशी करिआई ॥ छप्पन भोजन पीछे लागे पहिले खिचड़ी पाई ॥ सेवरी जात मुसहरिन कहिये, जूठ बेर ले आई ॥ प्रीति जान ताके फल खाये, तीनों लोक बढाई ॥ व्याधा कबें अचार कियो है, कब गीता पढ भाई ॥ तुरत गोपालको पकरि ले आया, घरी न दुसर बिताई ॥ तिरलोचन नामदेव पीपा, हरिसों हेत लगाई ॥ सेनरूप होय मरदन कीन्हे, आप भये हरिनाई ॥ सहस्र अठासी सुनी जग्यमें जेवैं, तबहुँ न घंटा बाजे ॥ कहें कवीर सुपचके जेवैं, घंटा मगन होय गाजे ॥
शब्द ५३—अब हम जानो काया बुढानी ॥ टे० ॥ हाड सूख गये मांस सूख गये, पांव पर जैसे ऐंचातानी ॥ आंखिन आगे सूझत नाही, लार गिरे जैसे ओरियक पानी ॥ धीया पूता कोई काम न आवे, देत न बुंदभर पानी ॥ कहें कवीर सुनो भाई साधू, का सोचो दिन आय सिरानी ॥
(७१०)
कवीरपंथी—
शब्द ५४—जगमें गुरु समान नहि दाता, अरे मन ऐसो जानरे ॥ टे० ॥ आगे दिन पाछे गये, किये न हरिसों हेत । अबके चेते का भये, जब चिरिया चुन गई खेत ॥ बनजारेके बैलवा, लदे देसंतर जाय । एकानके पूरे भये, एकन मूल गँवाय ॥ कहें कवीर सुन केसवा, तेरी गत अगम अपार । साधुन लादे नाम धनीका, विष लादे संसार ॥
शब्द ५५—चुनरिया पचरंग, मोहे ना सुहाय ॥ टे० ॥ पांच तत्त्वकी बनी चुनरिया, नाम बिना रंग फीक दिखाय ॥ या चुनरी मोरे मैकेसे आई, अपने गुरुसे लई बदलाय ॥ चुनरी पहिर धनि गई बजरवा, काल निगोडा ले पछुवाय ॥ कहें कवीर सुनो भाई साधू, को मोरे आवे को मोरे जाय ॥
शब्द ५६—कौने रंगरेज रंगी मोरी चूनरी ॥ टे० ॥ धागा पांच पचीस यामें लागे, हाथ परी परमारथ दुलरी ॥ चौकी चार प्रेमका बूटा, पहिरत या धनि होगई पिउरी ॥ पहिर ओठ धनि भई सतमारग, ससुझ ससुझ भई दिन दिन दुबरी ॥ कहें कवीर अजब रंगरेजवा, साधु संगति गहि चरनन उबरी ॥
शब्द ५७—संतो चुनरी मेरि नई ॥ टे० ॥ पांच तत्त्वकी बनी चुनरिया, सतगुरु मोल दर्ई ॥ भौ सागरमें पहिर न पाछें, रंग बदरंग भई ॥ दिना चारके पहिरे ओढै, मैली बहुत भई ॥ मैं अपने जिव लाज मरत हौं, अबकी रंग दर्ई ॥ या चुनरीको बडो भाग है, सतगुरु मिलेसही ॥ जो चुनरीकी मरम बताई, प्रेममें डुबाय दर्ई ॥ साहेब कवीर या रंग बनाये, तामें बोर दर्ई ॥ जन्म जन्मकी छूटी मलामत, चटकमें चटक भई ॥
शब्द ५८—मेरी रंगसे चादर भीनी ॥ टे० ॥ पांच तत्त्वकी चादर हमरी, तीन गुनन ले बीनी ॥ धोबिया देव हाथ नहि लागे, रंग
शब्दावली
(७९१)
मैली तन झीनी ॥ दासमलूक सलूकसे ओढे, रघुवर टुकरी लीन्ही ॥ धनि धर्मदास जुगतसे ओढे, गढ बांधो चौका कीन्ही ॥ साहेब कवीर शब्दसे ओढे, जस लीन्ही तस दीन्ही ॥
शब्द ५९-जोगी चेतन नगरमें रहुरे ॥ टे० ॥ प्रेमप्रीति रंग ओढो चादर, दिलकी तसबी गहुरे ॥ अजपा जाप जपो दोय अच्छर, काल भरम सब डहुरे ॥ नामकी धूनी अंदर बारो, भेद न परगट कहुरे ॥ आसनमार गुफामें बैठो, नाम धनीका भजुरे ॥ सोहैं शब्द समय सबनमें, स्वासा संग धुन गहुरे ॥ कहैं कवीर सुनो भाई साधू, भौजल पार उतर रहुरे ॥
शब्द ६०-सोवे जोगिया कौन जगावे ॥ टे० ॥ गढ परबत जोगी कुटी बनावे । मृगछाला जोगी झाड बिछावे ॥ अन्न न खाय जोगी पानी न पावे । ये जोगिया जग रूप दिखावे ॥ जीव न सीव स्वासा सुर नाहीं । जाय गगन बिच ध्यान लगाहीं ॥ कहैं कवीर सुनो साधो । या जोगियाको कैसे समुझाई ॥
शब्द ६१-संतो धोका सबको मारे ॥ टे० ॥ ऐसा है कोई संत बिवेकी, निरमल ज्ञान विचारे ॥ कोई खोजे शिवशक्तीमें, कोई खोजे काया ॥ कोई खोजे सुन्न महलमें, ऐसे जग भरमाया ॥ कोई सुनीजन मनको मूंढे, कोई उलटा पवन चढावे ॥ कोई जंग्र मंत्र कोई ओषद खोजे, कोई काशी करवत लावे ॥ कोई जंगम जलमाँहिं नहावे, कोई कोई सेष सयाना ॥ कोईकोई देश दिसंतर डोले, कोई तीरथ व्रत लपटाना ॥ कोई कर्म भर्म्मकी सांकर काटे, कोई पारब्रह्मको धावे ॥ कहैं कवीर सोई जन मेरा, सिर अपने भार न लावे ॥
शब्द ६२-हंसा सुरत करो ठहराई ॥ जासों जिव परले ना जाई ॥ टे० ॥ साख रमैनी बहुत कहतहौ, कथ कथ गये अपारा ॥ राई भर
(७९२)
कवीरपंथी—
अमृतके पाये, हंस भये ततसारा॥ राई भर है वस्तु हमारा, अरध राई अस्थूला॥ लहर लहर घट भीतर होवे, सोई पुरुष निज मूला॥ सेत पान पुरइन पर चौका, जहाँ एक पुरुष है सौरा॥ असंख पंखुरीके लोक बना है, सिर डुरत अग्रके चौरा॥ कहैं कवीर हम शब्द कहा है, कछू न राखी गोई॥ है अनमोला शब्द हमारा, लख पावै जन सोई॥
शब्द ६३—अवधू भजन भेद है न्यारा॥ टे० ॥ का मुद्रा मालाके पहिरे, का चंदन घिसे लिलारा॥ मूंड मुडाय का जटा रखाये, का अंग लगाये छारा॥ का गाये का लिख पढ लाये, का भरमे संसारा॥ संध्या का तरपन का कीन्हे, का घट कर्म अचारा॥ का पानी पाहनके पूजे, का कंद मूल अहारा॥ तीरथ व्रत का संजम कीन्हे, जो नहि तत्त्व विचारा॥ कर परचे स्वामी होय बैठे, कर विवेक व्योहारा॥ दया धरमके मरम न जाने, ठाने बेद ऊंकारो॥ फूँके कान कुमत अपनीसों, यह बोझे वह भारा॥ विन सतगुरु गुरु केते बहि गये, लोभ लहरकी धारा॥ भेष अभेष बधिककी टाटी, लिये फिरे विष चारा॥ ज्यों बाला ध्यान धरे जल भीतर, अपने अंग विकारा॥ गहिर गंभीर पीर जो पावे, खज अखजसों न्यारा॥ भये सुदिष्ट पार चलनेको, सहज मिटे भ्रम भारा॥ निर्मल जोत आतमा जागे, है निज नाम अधारा॥ कहैं कवीर जानेसे कहिये, मैं तैं तजे बिकारा॥
शब्द ६४—सो जन मतवाला, जिन पिया पुर्सका प्याला॥ ॥ टे० ॥ मूल कँवल पर बंद लगावे, उलटा पवन चढावे॥ अमृत पिये मगन होय बैठे, बिन रसना गुन गावे॥ बिन धरतीके मंदिर दीसे बिन सरवर जहैं पानी॥ बिन दीपक जगमग उजियारा, गुरुमुख बोले बानी॥ इंगला पिगला, सुषुमुन सोधे, उनमुनके
शब्दावली
(७९३)
घर मेला ॥ षट दल चक्र एक कमल विराजे, जहाँ पुरुष अल- बेला ॥ चंद सूर जो घरको लावे, सुषुप्तन सुरति समावे ॥ कहैं कवीर कायाकी बातें, सतगुरु मिले लखावे ॥
शब्द ६५-गलतान मता जब आवेगा। तब जियरा सुख पावेगा ॥ टे० ॥ चार अचार मिटे जब तनकी, तब साहब सुख पावैगा ॥ ज्ञान ध्यानमें निसदिन राचे, आप अपन ससुझावैगा ॥ अनहद बाजा बजे सुहेला, हरदम खबर मँगावेगा ॥ कहैं कवीर तत्त्व जब दरसे, मैं तैं दूर बहावेगा ॥
शब्द ६६-मेरी सुरति सोहागिन जागरी ॥ का सोवै पंडित लोभ मोहमें, उठ गुरुके चरने लागरी ॥ चित दे सरवन सुन दौय अच्छर, उठत मधुर धुन रागरी ॥ का तू अटकी लोभ मोहमें, उठ गुरुके शब्दसो लागरी ॥ कहैं कवीर सुनो भाई साधू, यह जगत परा जम जालरी ॥
शब्द ६७-पंडित मिथ्या करो बिचारा। तब नहीं सृष्टि न सिरजनहारा ॥ सुत्र अस्थूल पावक जग नहीं, पवन न रवि शशि धरना ॥ जोत सरूप निरंजन नहीं, नहीं भाषा नहीं बरना ॥ गोरखदत्त राम तब नहीं, नहीं तीर्थ पखाना ॥ हरि ब्रह्मा नहीं शिवसकती, नहीं वेद आचरना ॥ कर्म भर्म दोजख तब नहीं, नहीं मंत्र नहीं पूजा ॥ बैकुंठ मसीत भाव तब नहीं, ना तब एक न दूजा ॥ मात पिता कुल वाके नहीं, वह तो पुरुष अकेला ॥ कहैं कवीर या पद को बूझे, सो सतगुरुका चेला ॥
शब्द ६८-रासुरा भौरा कँवल ना पावे। ताते जनम जनम डहकावे ॥ टे० ॥ सुच्छम खेत बिजूका रोपा, मिरगा चरन नहीं पावे ॥ भर्महि मारे भरम पछारे, ताते निकट न आवे ॥ पुरइन पेड बसे एक दादुर, स्वातीके स्वाद न पावे ॥ कँमल बास भौरा
(७९४)
कवीरपंथी—
जब वेधे, सहजेही चल आवे ॥ भक्ति करत चौबिस जुग बीते, कोई सुरति समाध लगावै ॥ कहे कवीर सुनो भाई साधू, बहुरि न भौजल आवै ॥
शब्द ६९—बाँका गढको लीजे मन भाई, जामें बेवड कोट औ तेवड खाई ॥ टे० ॥ काम किवारी दुख सुख दरवानी, पाप पुन्य दरवाजा ॥ क्रोध प्रधान काल डमराऊ, मन मवासी राजा ॥ पांच पचीस बडे डमराऊ, आडी प्रेमल माया ॥ मोहि गरीबके जोर चले नहिं, मैं का करों रघुराया ॥ सेना सदा तोप ममताके, कुमति कमान चढाई ॥ तृष्णा नीर बहे घट भीतर, सो बुध हाथ न आई ॥ तनकी तोप सुरतके हवाई, ज्ञानके गोला भराई ॥ प्रेम पलीता सहज प्रजारे, एकै चोट गढ ढाई ॥ शील संतोष दोउ लडने लागे, तोडा दस दरवाजा ॥ सार संतनकी भीर भगतनकी, पकरा गढका राजा ॥ साधुके संगत गुरुके परतापे, कटी करमकी फांसी ॥ साहेब कवीर चढे गढ ऊपर, राज लिया अविनाशी ॥
शब्द ७०—संतो तनका मन रखवारा । कोई जाने जाननहारा ॥ टे० ॥ मनही देव देहरा मनही, मन सेवा मन पूजा ॥ मनही मन ले पाती तोरै, मनही मनके साजा ॥ मनही ऊठे मनही बैठे, मन भेगा मन न्यारा ॥ मनही ताता मनही शीतल, मन मीठा मन खारा ॥ ध्यान लगाय बैठे घट भीतर, तजदे विषय बिकारा ॥ कहैं कवीर सुनो भाइ साधू, सो जन जगसों न्यारा ॥
शब्द ७१—अवधू सो जोगी गुरु साँचा । प्रभुजीको सेवो रे मनसा बाचा ॥ टे० ॥ शीलकी मुद्रा सहजकी झोरी, सुरति निरति ले खेला । ज्ञान भभूत सबे तन लागा, साहेब अंतर हेला ॥ क्षमा डंड संतोष मेखला, अंमर प्याला, पीवे । अविनाशी घर
शब्दावली
(७१५)
भिच्छा मांगे, ऐसा जोगी जीवे॥ मन थिर राखे अगमको खोजे, दुनियां संगन लावे। कहैं कवीर यह जोग जगत में, अविनाशी को पावे॥
शब्द ७२-इश्क नहीं आसान यारो। इश्क नहीं आसान ॥ टे० ॥ हरदम शीतल या दम सूखा, जान करो कुरवान ॥ प्रेम कटारी या तन मारी, निकल गया यह जान ॥ आपन पिया खोज दिल अंदर, आशुक इश्क इमान ॥ कहैं कवीर फकीरी मानो, जब साहेब मेहरबान ॥
शब्द ७३-हमारे देश रहो कहि अचरज ख्याल ॥ टे० ॥ उमड़ घुमड़के आवे बदरिया, रिमझिम बरसे मेहा। परे रहों चोगान चौहटे, भीजत नहीं मेरी देहा ॥ हमारे देशमें उर्धमुख कूंवा, सांकुर वाकी खोरी। सुरति सोहागिन है पनिहारी, ना गागर ना डोरी ॥ हमारे देशमें नित उठ पूनो, कबहु न होत अमवासिया। छांह धूप व्यापे ना कबहुँ, ना ग्रीषम ना पावसिया ॥ हमारे देशमें बाजा बाजे, अजगैबी होत अवाजा। साहेब कवीर टुक मगन भये हैं, बैठ गगन गढ़ छाजा ॥
शब्द ७४-पंडित अपनी अगिन बुझावो। हम तो अपनी राह चलत हैं, तुम काहे दुख पावो ॥ टे० ॥ गरभवास औंधे मुख झूले, सप्तधात रस पीया। अब तुम चौका देकै बैठे, उहाँ चौका को दीया ॥ कौन हो तुम कहाँसे आये, अनेक जनम फिरि आये। अबतो तुम ब्राह्मन होय बैठे, चौरासी बिसराये ॥ कुल अभिमान आप विप्र पूजा, यही कुमत तोहे लागी ॥ जो तेरी जात भली थी, पंडित शुक्रदेव काहे त्यागी ॥ पांच तत्त्वका सकल पसारा, तामें जिव दुख पावे। कहैं कवीर ब्राह्मन सत सोई, उलटा ब्रह्म समावे ॥
शब्द ७५-परम गुरु सोई दया कर दीन्हा। ताते अनचीन्हे हम चीन्हा ॥ टे० ॥ बिन पग चलना बिन पर उडना, बिना चोंचके
(७९६)
कवीरपंथी—
चुगना ॥ बिना नैन जहाँ देखन पेशा, तहाँ मृतक होय रहना ॥ चंद न सूर दिवस ना रजनी, तहाँ जाय सुरति मिलाई ॥ विन जिभ्या जहाँ अमृत अचवे, बिन जल तृषा बुझाई ॥ जहाँ कुछ नहीं तहाँ सब कुछ देखा, या सुख कासों कहना ॥ कहैं कवीर बल बल सतगुरुकी, धन्य शिष्यका लहना ॥
शब्द ७६—ऐसा कोई प्रेमका देखा मतवाला हो ॥ टे० ॥ छाक चढी क्षुधा बीसरी, पिया प्रेम पियाला ॥ पीवत तेहि तन बीसरी, सो जगतसे न्यारा ॥ कान सुना देखा नहीं, वाते मतवाला ॥ सो छाका निज नामसे, सतगुरुका प्याला ॥ गोली लागी ज्ञानकी, कसनी बहुते दीन्हा ॥ जीवतही मृतक होय रहे, जिन गुरुगम चीन्हा ॥ नामरसायन जो पिये, जग बहुर न आवे ॥ कहैं कवीर कोई छका, जेहि कछु और न भावे ॥
शब्द ७७—एक दिन होयगा प्रान बिगाना ॥ टे० ॥ जो लग प्रान बोले घट भीतर, तों लग करत गुमाना ॥ निकसे प्रान बाहिर कर डेरा, घरके लोग डराना । काठके ठठरीमें लेके चढावे, लै जमुना पहुँठामा ॥ पांच जने मिल फूँक दिये हैं, जर गये सुखके ग्रामा । कहे कवीर सुनो भाई साधू, या पद है निरवाना ॥ पद निरवान चीन्ह ना पावे, अंतकाल पछताना ॥
शब्द ७८—निस दिन माला जुगतकी फेरे ॥ टे० ॥ रवि शशि बांध मन धागा करे, गहि गहि तार सोहंगम घेरे ॥ बंक नाल चढ़ि गिरवर तरवरे, जब टकसार गगन गढ पैरे ॥ अर्ध उर्ध बिच अजब रंग कहिये, बरषे शब्द अमीरस झरे ॥ कहैं कवीर सुनो भाई साधू, ऐसा ध्यान कोई बिरले धरे ॥
शब्द ७९—हंसनके नाह तुम तबहीं कहाये हो ॥ टे० ॥ काशीमें केवल नाम माड़ौ है, उडीसा धाम पंडो पग जरत, देखत वहीँ
शब्दावली
(७१७)
बुझाये हो ॥ साहू सुमरन कीन्हा तबहीं दरशन दीन्हा, उदधि उबारन वोहित बचाये हो॥ तुम साहब दया जोय जीवनको दिये पान ताके तन छूट गयो हांसी कराये हो॥ तुम साहेब मेरी गत राखो घट बांधो पतधर्मनी, दुखित जान कवीर पिया आये हो॥
शब्द ८०-जंगलमें भोंदू का फिरे, तेरे घरहीमें ठग लूटे ॥ जानेगा कोई सूरबीर, सांचे मतसे छूटे ॥ टे० ॥ का जप का तप का संजम, का का कर दिखलावे॥ साहबसे परचे नाहीं, का बहु भेष बनावे॥ चलरे मन सेहरापुर पाटन जइये। भजिये त्रिभुवन नाथको निरभै हो रहिये॥ अमर नहीं संसारमें, विनसे या देही॥ कहे कवीर एक सांच, ले राखो नाम सनेही ॥
शब्द ८१-नाम सनेही साधवा, मुखपाट न खोले॥ नाम जपे निरबान पद, बूझे सो बोले॥ टे० ॥ जो बोलै सो सत कहे, सुख असत न भाखै॥ कलह कलपना मेटकै, चरनों चित राखै॥ धुनमें ध्यान लगाय रहे, बिसराम न छांडे॥ विन बूझे जो आपतें, बकबाद न मांडे॥ सार शब्द संग्रह करे, त्यागे सब छोई॥ कहे कवीर तिहुँ लोकमें, तत्तवेता है सोई ॥
शब्द ८२-भीजे सुर जन माहीं हो नागर॥ टे० ॥ धरन अकाश नीर नहि पवना, अमृत बरषे ताही॥ सौ जोजन जहां बादर नाहीं, घटहि माहि घहराई॥ विन घटवार घाट ना छूटे, निजमें जाय समाई॥ बारा मास कमरिया भीजे, शीतल अंग बुझाई॥ आदि महल विदेही नामा, आवागमन मिट जाई॥ बरषे गगन नदी सब सूखी, प्यासे बूडे ताही॥ प्रीतम छाड़ चले सब ऊपर, जरा मरन मिट जाई॥ सदा रहे इनही बिच गौना, द्वादशहीते न्यारा॥ कहे कवीर सो प्रीतम साथी, जो परखे टकसारा॥
शब्द ८३-निरखो निरगुन निरबानी ॥ टे० ॥ अमर मूरत