कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
पृष्ठ 808, कुल 968 में से
संदर्भ में पढ़ें(७९४)
कवीरपंथी—
जब वेधे, सहजेही चल आवे ॥ भक्ति करत चौबिस जुग बीते, कोई सुरति समाध लगावै ॥ कहे कवीर सुनो भाई साधू, बहुरि न भौजल आवै ॥
शब्द ६९—बाँका गढको लीजे मन भाई, जामें बेवड कोट औ तेवड खाई ॥ टे० ॥ काम किवारी दुख सुख दरवानी, पाप पुन्य दरवाजा ॥ क्रोध प्रधान काल डमराऊ, मन मवासी राजा ॥ पांच पचीस बडे डमराऊ, आडी प्रेमल माया ॥ मोहि गरीबके जोर चले नहिं, मैं का करों रघुराया ॥ सेना सदा तोप ममताके, कुमति कमान चढाई ॥ तृष्णा नीर बहे घट भीतर, सो बुध हाथ न आई ॥ तनकी तोप सुरतके हवाई, ज्ञानके गोला भराई ॥ प्रेम पलीता सहज प्रजारे, एकै चोट गढ ढाई ॥ शील संतोष दोउ लडने लागे, तोडा दस दरवाजा ॥ सार संतनकी भीर भगतनकी, पकरा गढका राजा ॥ साधुके संगत गुरुके परतापे, कटी करमकी फांसी ॥ साहेब कवीर चढे गढ ऊपर, राज लिया अविनाशी ॥
शब्द ७०—संतो तनका मन रखवारा । कोई जाने जाननहारा ॥ टे० ॥ मनही देव देहरा मनही, मन सेवा मन पूजा ॥ मनही मन ले पाती तोरै, मनही मनके साजा ॥ मनही ऊठे मनही बैठे, मन भेगा मन न्यारा ॥ मनही ताता मनही शीतल, मन मीठा मन खारा ॥ ध्यान लगाय बैठे घट भीतर, तजदे विषय बिकारा ॥ कहैं कवीर सुनो भाइ साधू, सो जन जगसों न्यारा ॥
शब्द ७१—अवधू सो जोगी गुरु साँचा । प्रभुजीको सेवो रे मनसा बाचा ॥ टे० ॥ शीलकी मुद्रा सहजकी झोरी, सुरति निरति ले खेला । ज्ञान भभूत सबे तन लागा, साहेब अंतर हेला ॥ क्षमा डंड संतोष मेखला, अंमर प्याला, पीवे । अविनाशी घर