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भारतकोश
कबीरपंथी शब्दावली

कबीरपंथी शब्दावली

Kabirpanthi Shabdavali

स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा

स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)

Devanagarihipublished968 पृष्ठ

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शब्दावली

(७८५)

दर्द ॥ लापर लंपट औ परनिंदा, या तेरी न गई ॥ कहैं कवीर सुनो भाइ साधू, सुख तिहुँ लोक नहीं ॥

शब्द ४१-मनरे तू धीरज क्यों न धरे । शुभ औ अशुभ कर्म पूरविले, रतिओ न चटै बटै ॥ टे० ॥ होनहार होवेसो होवे, चिंता काहू करे ॥ पशु पंछी औ कीट पतंगा, सबकी खबर करे ॥ गर्भ वासमें रच्छा कीन्ही, सो कैसे विसरे ॥ तुमतो हंस वहि साहेबकी, भटकत काह फिरे ॥ सतगुरु छोड औरको धावे, काज तो नाहिं सरे ॥ मात पिता सुत संपत दारा, मोहके झार जरे ॥ समुझ देख मन कोइ न अपना, धोखामें काहि परे ॥ संतन सरन गहो मोरे मन, कोटिन व्याध हरे ॥ कहै कवीर सुनो भाइ साधू, सहजे सहज जीव तरे ॥

शब्द ४२-मनरे तू बूझ सबद उपदेसा । सार सबद औ गुरुमुख बानी, ताका गहो संदेसा ॥ टे० ॥ जाहि तत्त्वको सुनिवर खोजे, ब्रह्मादिक सो ज्ञानी ॥ सोई तत्त्व गुरु चरनन लागे, भक्ति हेतकर प्रानी ॥ प्रथमें दया दीनता आवे, हांसी मिथ्या त्यागी ॥ आतम चीन्ह परातम जाने, सदा रहे अनुरागी ॥ पद प्रतीत औ शब्द कसोटी, निस दिन बिरह विरागी ॥ जहांको अर्थ तहां लो बूझे, जहां लागी जहां लागी ॥ कहै कवीर यह तत्त्व जो बूझे, माने सीख हमारी ॥ काल दुकाल तहां ना ध्यापे, सदा करें रखवारी ॥

शब्द ४३-मनरे तू सपनेमें सुख पाया ॥ टे० ॥ अगम पंथ गुरुगमका चढना, बिन गुरु पंथ नसाया । सतगुरु शब्द कहा न माने, मार्ग कौन बताया ॥ ईहां आपने हेत जानके, जगमें करत बढाई ॥ एक दिन होय कालका पहरा, बिन गुरु कौन छुड़ाई ॥ या तन जान जरे जस लकरी, सब मिल देय जराई ॥ लोग कुटुम मरघटके साथी, हंस अकेला जाई ॥ झूठ मोह तजिदेरे गवांरा,