कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
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कवीरपंथी—
करले नाम सगाई । निहअच्छर लख नाम धनीका, कहें कवीर समुझाई ॥
शब्द ४४-गगन बिच मनको रमना है ॥ टे० ॥ राखत नाद बिंदको बसकर बंक नाल चढ गमना है ॥ बांधत मूल विराजत आसन, उलट पलट सुषमना है ॥ आवे न जाय रहे ना अस्थिर, उलट बहा तब जमना है ॥ कहें कवीर सुनो भाई साधू, जोग जुगतसो मलना है ॥
शब्द ४५-राम तेरो नाम बिना दुख भारी । ताते संतन यही बिचारी ॥ एक बेद कितेबा राते । एक मायाके मदमाते ॥ एक देश देशांतर डोले । एक बहु ज्ञानी हो बोले ॥ एक नागा दूधाधारी । ताते मोहि अचंभा भारी ॥ एक मौनी औ बिसवासी । ताते कटी न जमकी फांसी ॥ एक काया कसत अपारा । एक मरत खरगके धारा ॥ एक किये गुफामें वासा । जानो बहु जीवनकी आसा ॥ कोई आदि जुगादी जागे । जाके जरा मरन भ्रम भागे ॥ कहें कवीर बिचारी । भवसागर उत्तरो पारी ॥
शब्द ४६-राम रासो पंडित मोहि भावे, बिन जिभ्या बेद पढावे ॥ टे० ॥ एक कायथ गुनी कहावे । वह बिन मसी अंक बनावे ॥ वह बिन मशि अंकम होई । तब बहुरि लिखे ना कोई ॥ एक धोबी धोवनहारा । वह बिन जल करत पराारा ॥ वह बिन जल निर्मल होई । तब बहुरि न धोखे कोई ॥ एक बढई बहुते ज्ञानी । वह छीले बिना रुखानी ॥ बिन काठके खंभ बनावे । तब बहुरि न जगमें आवे ॥ एक खेवट बहुत विदानी । वह खेवत है बिन पानी ॥ जब नइयामें नदियां समावे । तब उलटा डंड चढावे ॥ एक पारधी चतुर सयाना । वह तो घात कर असमाना ॥ बिन पिंडके सावज लावे । जब मनहिमें उलट समावे ॥ एक