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भारतकोश
कबीरपंथी शब्दावली

कबीरपंथी शब्दावली

Kabirpanthi Shabdavali

स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा

स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)

Devanagarihipublished968 पृष्ठ

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शब्दावली

(७८९)

लग्गी जोगियासे, भयचं हंस रहेचं ना कागा ॥ जोगियाके कारन जोग कमाऊं, आठ पहर रहों जागा ॥ जब तब जोगिया मौज करत है, पाय अमर पद धागा ॥ कहें कवीर सुनो भाई साधू, जरा मरन अम भागा ॥

शब्द ५१—जोगी नाम न जाना हियेसे ॥ टे० ॥ काह भये गल कंठी डारे, काह तिलक सिर दियेसे ॥ काह भये सिर जटा बढाये, का गुदरीके सियेसे ॥ काह भये वन बनके डोले, का दूबी रंग पियेसे ॥ काह भये काशीके वासे, का गंगाजल लियेसे ॥ कहें कवीर सुनो भाई साधू, का रे बहुत दिन जियेसे ॥

शब्द ५२—प्रभु तो भगतीके बस भाई । जात बरन कुल रीझत नाही, ना रीझे चतुराई ॥ टे० ॥ करमा को न अचार कियो है, कब काशी करिआई ॥ छप्पन भोजन पीछे लागे पहिले खिचड़ी पाई ॥ सेवरी जात मुसहरिन कहिये, जूठ बेर ले आई ॥ प्रीति जान ताके फल खाये, तीनों लोक बढाई ॥ व्याधा कबें अचार कियो है, कब गीता पढ भाई ॥ तुरत गोपालको पकरि ले आया, घरी न दुसर बिताई ॥ तिरलोचन नामदेव पीपा, हरिसों हेत लगाई ॥ सेनरूप होय मरदन कीन्हे, आप भये हरिनाई ॥ सहस्र अठासी सुनी जग्यमें जेवैं, तबहुँ न घंटा बाजे ॥ कहें कवीर सुपचके जेवैं, घंटा मगन होय गाजे ॥

शब्द ५३—अब हम जानो काया बुढानी ॥ टे० ॥ हाड सूख गये मांस सूख गये, पांव पर जैसे ऐंचातानी ॥ आंखिन आगे सूझत नाही, लार गिरे जैसे ओरियक पानी ॥ धीया पूता कोई काम न आवे, देत न बुंदभर पानी ॥ कहें कवीर सुनो भाई साधू, का सोचो दिन आय सिरानी ॥