कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
पृष्ठ 793, कुल 968 में से
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कबहुँ रंक सिर छत्र धरता रे ॥ पुतना को न सुकृत कर आई, गुन औगुन वाके सब हरता रे ॥ ताहि मार बैकुंठ पठाई, बलि-राजासे कौन खता रे ॥ एक पुत्र विन नृप पचि हारे, ताके हते बहुत बनिता रे ॥ साठ पुत्र नारदको दीन्हे, माया त्यागि रहे विरक्ता रे ॥ पंच अतारीके पन राखे, दोष लगाये पतिबरता रे ॥ कहैं कवीर करतासे डरिये, और सकलके झूट मता रे ॥
शब्द २४—करन हारसे डरते रहिये, करतन लागे घडी अरू पल रे ॥ टे० ॥ पलमें देखे महल बावडी, पलमें देखे टीबा थल रे ॥ पलमें मेह बरसते देखे, पलमें देखे चलता हल रे ॥ पलमें पवन अंधेरी चाले पलमें चाले पातल दल रे ॥ दो तपसी जहाँ खड़े पुकारें, ताको दीन्हे अमृत फल रे ॥ पलमें पच्छी बन बन बोलै, पलमें आन कटाया गल रे ॥ पलमें घरसे बाहर काढै, जैसे काढे राजा नल रे ॥ जो कछु किया सो ध्रुवने पाया, किया राज अरू भया अटल रे ॥ साहेब कवीर अवधूसे बोले, तिनहु न पाई पलकि गैल रे ॥
शब्द २५—अवधू सो जोगी गुरु सांचा । प्रभुजीको सेवो मनसा बाचा ॥ टे० ॥ सीलकी सुद्धा सहजकी झोरी, सुरत निरत ले खेले ॥ ज्ञान भक्षुत सबही तन लागा, साहेब अंतर खोलै ॥ क्षमा दंड संतोष मेखला, अम्बर प्याला पीवे ॥ अविनाशी घर भिच्छा मांगे, ऐसे जोगी जीवे ॥ मन थिर राखै आगम खोजे, दुनियाँ संग न लावे ॥ कहे कवीर या जोग जुगतसो, अविनाशी को पावे ॥
शब्द २६—अवधू ऐसो ज्ञान बिचारी । यामें कौन पुरुष को है नारी ॥ टे० ॥ ब्राह्मणके घर नेती धोती, जोगीके घर चेली ॥ कलमा पढ पढ भई तुर्कनी, ताते रहत अकेली ॥ नाँ मैं व्याही नहिँ मैं कुँवारी, पूत जना जन हारी ॥ कारे मूंड कोई ना छांडयो,