कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
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कवीरपंथी—
अजहू बालकुवारी॥ ससुर हमारा बाला भोला, सासू बालकुवारी॥ साई हमारा पालन झूलेँ, हमहिं झुलावन हारी॥ ना जाऊँ ससुरार न नैहर रहुँ मैं, कोउ पुरुष संग नाहिं नसाऊँ॥ कहैं कवीर सुनो भाइ साधू, नहीं अंगसे अंग मिलाऊँ॥
शब्द २७—हंसा छोड करमकी आसा । कर्मकाल सब जगत नचावै, फिर फिर करे गरासा ॥ टे० ॥ उपजन विनसन कर्महिं कहिये, कर्महिं जगत बिनासा ॥ कर्महिं काल ब्याल पुनि कर्महिं, कर्महिंका सब त्रासा ॥ जप तप कर्म बांधि जग राखे, पाप पुन्य विस्वासा ॥ कर्महिं देवल तीरथ कहिये, कर्महिं अलह उदासा ॥ कर्महिं जोग ध्यान तप पूजा, कर्म चढावे दासा ॥ कर्महिं दुख सुख जड़ चेतन है, तीन लोक परकासा ॥ कर्महिं देय लेय पुनि कर्महिं, यज्ञ दान रहिवासा ॥ प्रतिमा भूत कर्मके बस है, सुविचार अचार निवासा ॥ कर्म दुखी दालिद्वी कहिये, कर्महिं भोग विलासा ॥ कर्म बिकार राह तज बैठो, कहैं कबीर सुख बासा ॥
शब्द २८—हंसा त्रिगुन कर्मकी मोट । राजस तामस और सतोषुन, बिषम कालके चोट ॥ टे० ॥ द्वादस बान बंध्यो तीनोको, कोई बडे कोइ छोट । चित बुध अंह मोह मद माया, मार चराचर चोट ॥ राग द्वेष भौ बान कामके, अहि रैन दिन कोट । जरा मरन माहुर बंधायो, मरे विषनके चोट ॥ एकै दिष्टि बान सर ताने, चक्रदेव गन कोट ॥ जप तप कोट साधना पूजा, चढे मांस मद रोट ॥ नाना अमल मात जिव माते, ज्ञानहीन तन खोट । कहैं कबीर विन सतगुरु सेवा, करमन बांधल पोट ॥
शब्द २९—हंसा कर ले शब्द वसेरा ॥ रोम रोम जमदूतन घेरो, ज्यों कांटे टिग केरा ॥ टे० ॥ अहिनिंस बसो शब्दके मांही, गुरुमुख शब्द निवेरा ॥ गुरुके वचन शिष्य जो माने, शब्द सुरति सो हेरा ॥