कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
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कवीरपंथी—
सब नर चाहै बाहर भीतर, नख सिख ईच्छा खेला ॥ ईच्छा भेद लखे जो कोई, पावे पुरुष सुहेला ॥ ज्यों जब त्यो अबही है संतो, समुझ जुगत सो पावे ॥ कहै कवीर शब्दते न्यारा, इस विधि पुरुष रहावे ॥
शब्द ५—संतो दृष्टि परे सो माया ॥ वह तो अचल अलेख एक है, ज्ञान दृष्टिमें आया ॥ सतगुरु दिये बताय आपमें, है माहीं सत सोई ॥ दूजा क्रीतम थाप लिया है, सुक्त कौन विध होई ॥ काया झाँई त्रिगुन तत्त्वकी, विनसे कहवों जाई ॥ जल तरंग जलहीसो उपजे, फिर जल माँहि समाई ॥ ऐसी देह सदा गत सबकी; मनमें हरदम कोइ उचारे ॥ आपे भयो नाम धर न्यारा, इस विधि माया देख विचारे ॥ आपे रहे समाथ समुझमें, ना कहुँ जाय न आवे ॥ ऐसी स्वासा समुझ परे जब, पूजे काह पुजावे ॥ धरै न ध्यान करै ना जप तप, राम रहीम न गावे ॥ तीरथ बरत सकलो भ्रम छोड़े, सुन्न दौर ना जावे ॥ जोग जुगतसो कर्म न छूटे, आप अपन ना सूझे ॥ कहै कवीर सोइ संत जौहरी, जो या समुझे बूझे ॥
शब्द ६—संतो तन चीन्हे मन पाया ॥ तनही मन है मनही मन है, मनही निरंजन राया ॥ मन गुन तीनों पाँच तत्त्व है, मनका सकल पसारा ॥ जैसे चंद उदकमें दीसे, है माहीं सत न्यारा ॥ जागृत सुपन सुषोपत तुरिया, चारों मनके झाँई ॥ मन औतार असंख्य कला होय, मनते दुसरा नाई ॥ आद हता सो अब है संतो, सतगुरु भेद बताया ॥ कहै कवीर कंचनके भूषण, एक हुवा जब ताया ॥
शब्द ७—संतो ज्ञान कौनसे कहिये, कौन ध्यान विज्ञान कौन है, कैसे निज पद लहिये ॥ को है जीव ब्रह्म कहु को है, को