कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
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प्र० होइये क्या ? उ० दास ।
होय रहै जब दास यह, तब सुख पावै अंत । देखि रीति प्रह्लादकी, सबमें निरखो कंत ॥ ७ ॥
प्र० मानिये क्या ? उ० सबकोसत्य.
मानिये सबको सत्य है, जाको व्यवहार । जियन मरत दोऊ लगा, थिर होय देखु विचार ॥ ८ ॥
प्र० बराइये क्या ? उ० झगरा ।
झगरा नित्य बराइये, झगरा बुरी बलाय । दुख उपजे चिंता बढै, झगरामें घर जाय ॥ ९ ॥
प्र० खाइये क्या ? उ० गम ।
गम समान भोजन नहीं, जो कोई गमको खाय । अम्बरीष गम खाइया, दुरवासा बिललाय ॥ १० ॥
प्र० राखिये क्या उ० निज धर्म ।
राखिये निज २ धर्मको, दिठ गहिये सब काल । निज धर्म आपन राखते, सहजे भये निहाल ॥ ११ ॥
प्र० त्यागिये क्या ? उ० सब कुछ ।
त्याग तो ऐसा कीजिये, सब कुछ एकहि बार । सब प्रभुका मेरा नहीं, निश्चय किया विचार ॥ १२ ॥
प्र० छोड़िये क्या ? उ० अभिमान ।
छोड़ि झूठ अभिमानको, सुखी होय यह जीव । भावै कोई कछु कहै, हिये बसे निज पीव ॥ १३ ॥
प्र० पाइये क्या ? उ० सुख ।
सुख पइये निज रूपमें, द्वेत भाव करि त्याग । निरखो आपा सबनमें, रहै न दुखको लाग ॥ १४ ॥
प्र० देखिये क्या ? उ० आत्मराम ।
देखै सबमें राम है, एकहि रस भरपूर । ऊषहिते सब बनत है, चीनी शक्र गूर ॥ १५ ॥