कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
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सेली सुरति समोई बे॥ जत कोपीन सत आडबंद, मगन पतंगा होई बे । सिरजनहार तिलक सिर ऊपर, सुमरन कंठी पोई बे ॥ भिच्छा भाव सहजकी चीपी, झोली अकल जुठोई बे । जो देवै जाइपै लेवे, ऊँच नीच नहिं कोई बे॥ सेज भोम अकास ओढना, जोति चंद्रमा जोई बे॥ पवन रैन दिन करै षवासी, दिठ आसना परि सोई बे ॥ धुनी ध्यान धकावै रैन दिन, फिकर फावडी होई बे॥ आशा तृष्णा इंधन लकरी, धूंनी माहिं धकोई बे॥ उन सुनि दिष्ट उदास जगतसे, निस प्रेही निरमोही बे ॥ तरक त्यागबैराग धारना, राव रंक नहिं जोई बे ॥ एका एकी रहै अवनि पर, दिलकी डुरमति खोई बे ॥ कहैं कवीर अलमस्त फकीरा, आय निरंतर सोई बे ॥
राग काफी ९-वाह वाह गुजरान फकीरी दी ॥ टे० ॥ कबहुँक सौड निहाली पथरिया, कबहुँ भूत सरीरो दी ॥ कबहुँ टुकडा बासी कूसी, कबहुँक खीर मलीदो दी ॥ कबहुँक ओढै मल मल खासा, कबहुँ गुदडी लीरों दी ॥ कबहुँक मैडी कबहुँक मन्दर, कबहुँक आसन चौडो दी॥ कहैं कवीर परवाह न किसी दी, एक परवाह गुर पीरो दी ॥
राग काफी १०-रस मगन भया जब क्या गावै॥ टे० ॥ दिल दरियाव सदा जल निरमल, अनत नहावनकूँ कहैं जावै॥ जाग्रत सुषन सुषोपति तुरिया, भँवर गुफामें घेर छावै॥ इंगला पिंगला सुषमन नारी, वंक नालकी सुधि पावै॥ त्रिकुटी ऊपर ध्यान लगावै, अविनाशीकूँ लखि पावै॥ कहैं कवीर सिष पर बैठा, आवागवन जब मिटि पावै ॥
राग काफी ११-मेरा दिल लगा फकीरीमें ॥ टे० ॥ जो सुख पायो नाम भजनमें, सो सुख नाहिं अमीरीमें॥ भली बुरी सबकी