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भारतकोश
कबीरपंथी शब्दावली

कबीरपंथी शब्दावली

Kabirpanthi Shabdavali

स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा

स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)

Devanagarihipublished968 पृष्ठ

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पृष्ठ 772

(७५८)

कवीरपंथी—

राग काफी ५—नैनन माझ बसाऊँ जो मैं साहिब पाऊँ ॥ टे० ॥ नैननमें मेरा साहेब वसदा, डरती पलक न लगाऊँ ॥ एक टक ठाढी पंथ निहारौं, पलकसौं पलक न लाऊँ ॥ त्रिकुटी महल में बना है झरोखा, जहां सुख झाँकी पाऊँ ॥ अकह महलमें चवँर ढुराऊँ, सुखकी सेज विछाऊँ ॥ पियाको परसि भई पटरानी, आनंद मंगल गाऊँ ॥ कहैं कवीर सुनो भाइ साधो, सिंधु बुंद मिलि जाऊँ ॥

राग काफी ६—लेखा तेरा लीजैगा रे सुनु दिल महरम यार ॥ टे० ॥ चलना दूरि अभी कयूं थाकयो, पंथ खड़की धार ॥ हकहि साखी न्याव जो होयगा, वा सांचे दरबार ॥ धरम राय जब लेखा मांगे, परत गुरजकी मार ॥ घरकी नारी प्रान सों प्यारी, सो न चले तेरे लार ॥ कहैं कवीर सुनो भाइ साधो, हरि भजि उतरो पार ॥

राग काफी पंजाब ७—साहबसों लौ लाव हो मन गरब गुमानी ॥ टे० ॥ आज कालि अरु पांच दिनामें, आवैगे जमदानी ॥ हाथमें मुगदर लोहका, तेरी खूब करै मिजमानी ॥ पल पल आयु घटे छिन छिनमें, ज्यों अंजुली जन पानी ॥ अब तू समझि देख दिल अपने, सुरति करौ पहिचानी ॥ हस्ती घोडा छत्र सिंहासन, दुनियां देखि लुभानी ॥ बाँह पकड़ि जम ले चले जब, होयगी ऐचातानी ॥ भयो नर अंध मगन मायामें, ज्यू कपि मूठ बंधानी ॥ कर्म डोरि बाजीगरके बस, घर घर नाच नचानी ॥ हिल मिल एक जो होय रहै, सबदमें सुरति समानी ॥ अग्रदास दीदार दिवाना, दरिया बुंद मिलानी ॥

राग काफी ८—येही हाल फकीरा हंदा, सुन लीजो सब कोई बे ॥ सुरग मिरत पताल लोककी, फिकर फकीरौ खोई बे ॥ टोपी तत खवनी चितवन, सीगी अनहद सोई बे ॥ नाम निरंतर चोला पहिरे,