कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
पृष्ठ 776, कुल 968 में से
संदर्भ में पढ़ें(७६२)
कबीरपंथी—
फांसि फाँदि आय माया मद जालमें । भवसागरके बीच महा जंजालमें ॥ मोक्ष सुक्ति जब होय दया जनपै करो । मेरो काटो कर्म विकार दास अपनो करो ॥ साहेब कवीर बंदी छोर अजर इक मानिये । हमसे पतित उधारि सरन साहिब आनिये ॥
मंगल ३—जो तुम आये हो सरन बचन इक मानियो । तजियो खलककी आस, सुरति ऐसे जानियो ॥ ज्यू जल मीन सनेह, सदा जलमें रहै । जल बिछूरत तजै परान, लगन ऐसी लहै ॥ तजो नीर पीवो, खीर लप नहि लावई । ते नर हंस हमार, सुरति ऐसे धावई ॥ काग वचन तुम छाँडि दे, हंस गति लावई । तेरे पुनि पूरन करि देऊँ, बहुत सुख पावई ॥ काटूँ करम विकार, भार सिर लेइहौं । हंसा तो मैं रहूं समय, आप सम करि गहौं ॥ कहैं कवीर धरमदाससों, तत मतसार ॥ हंसा बेगे लोक मंझार नाम आधार है ॥
मंगल ४—मूल कमलमें बैठि धरनिको बंध दयो ॥ सप्त अगरासी कोटि सबदको वस भयो ॥ मूंदै सप्त पताल मेरु मंडल हले । गरजो गगन अकास अमीसागर झले ॥ नई भई पहिचानि नवल भयो नेहरा । अगर जोति सिरमौर विराजै सेहरा ॥ उठौ सुहागिनि नारि महलको गम करो । वजर पौर उधारि पुरुषसो तुम मिलौ ॥ परम ज्योति प्रकाश निरंतर राजई । मिलौ सुहागिनी नारि तो पुरुष रिझावई ॥ देख्यो सबद रूप विहँसि सुंदरि मिली । चिकुटी नगर मंझार मदन मूरति लगी । धरमदास चित चेति चरन चित लाईये ॥ सतगुरु कवीर कहि दीन तो दीप जगाइये ॥
मंगल ५—सतगुरु आनंद मंगल आरति बोलिये । जुग जुग कहौ पुकारिके परदा खोलिये ॥ अलख निरंजन राय तो चरित्र बनाइया । संसामें छिन भंगु सुपनौ दिखाइया ॥ यह संसार सराय तो बाट