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भारतकोश
कबीरपंथी शब्दावली

कबीरपंथी शब्दावली

Kabirpanthi Shabdavali

स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा

स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)

Devanagarihipublished968 पृष्ठ

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शब्दावली

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बरानिया। उठ चले अपने पंथ न काहू जानिया॥ सुन धरमदास सयान पुकार जो कीजिये। निंदा अस्तुति त्यागि पिया चित दीजिये॥ पंथ दुहेला नाहिं कोई सत संगिया। सायर बुंद विनोद प्रेम चित मंडिया॥ नाहिं करो संशय सोग जीवन सब धुन्द है। अजर अमर एक आत्मा अमृत बुंद है॥ पांच तत्त्व सम बुंद पचीस सुहाना। अष्ट धातुको जुगल सो पियाको खेलावना॥ पिया है प्रगट विचारि नाहिं कोई बुझिया। अंत सुहागिनि नारि तत्त्व नहिं सुझिया॥ अछरमें गम राखि निःअछर जानिये। शब्द मंत्र गुरु भाषि सुरति पहिचानिये॥ हरष शोकते भिन्न बूझ प्रवीन हैं। जोग विवेकतैं दरसै जोति अधीन हैं॥ जग मग दीप बनाय आरति कीजिये। घट घट जोति परगास दरस सुख लीजिये॥ यहाँ वहाँ भरिपूर न दुनिया भावना। गुरुगम परचे होत तो इस विधि पावना॥ कहै कवीर धर्मदाससों मूल उचारिये। यही विधि आरती साजि शवद निरवारिये॥

मंगल ६-मनुषा देही पाये सुकृतको धाइये। सुरति जो अषन कुवॉरि हंसको ब्याहिये॥ सतगुरु विप्र बुलाय तो लगन लिखाईये। वेगि करि लेहु ब्याह ठील नहिं लाइये॥ मिलौ पचीसौ नारि तो मंगल गाइये। चौरासीका दुख बहुरि नहिं पाइये॥ सुरति जो सज्यो सिंगार पियापै जाइये। जन्म कर्मके अंक तो तुरत मिटाइये॥ हंसै कियो विचार सुरति सो यों कही। जुग जुग अछन कुँवरि एता दिन क्यों रही॥ सुरति छ करि सलाम पीया तुम सत कही। मोहि सतगुरु मिलिया नाहीं कुवॉरि यों रही॥ परम पुरुषकी सेज अखंडित खेलना। अमृत प्याला पाइ अधरही झेलना॥ पान परवाना पाय तो नाम सुनावई। सतगुरु कहैं कवीर जीव गति पावई॥