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भारतकोश
कबीरपंथी शब्दावली

कबीरपंथी शब्दावली

Kabirpanthi Shabdavali

स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा

स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)

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पृष्ठ 778

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कवीरपंथी—

मंगल ७-पीहर रही भुलाय घना दिन बापके। कर सतगुरुको संग चालु घर आपके॥ मामा और ममसाल भुवा दस बेहनरी। तजि उनहूँको संग जाय सन्मुख अरी॥ मात पिता सुतवीर तजो परिवारको। उभा छोड़ लोग चली है पारको ॥ बहुरि न मिलना होय पीहरि प्यारा लोग सो। चली है अपने देश पूरवला जोग सो ॥ लंघिया औघट घाट कमल सब छेदिया। भँवर गुफाके घाट निरंजन भेदिया ॥ चढी कलश पर जाय अगम गम्य जहाँ किया। निराकार निरलेष पयाना तहाँ दिया ॥ अगम महलमें जाय मिलिहै पीवसो। ब्रह्म कियो भरतार पर हरिया जीवसों ॥ अधर दीपके मध्य पुरुष यक सार है। सांची कहै कवीर सोई भरतार है ॥

मंगल ८-समुझि सुमिर सतनाम जीव गति पाइये। नाहिं न आन उपाय चरन चित लाइये ॥ जहाँ गुरुको अस्थान तहाँ चलि जाइये। कोटि भान परगास सुरति तहाँ छाइये॥ तन मन होय अनंद हरषि गुन गाइये। खुलिहैं ग्यानके नैन ध्यान धरि धाइये॥ कहैं कवीर सतनाम जीव गति पाइये। अविगति अलख लखाय निरखि सिर नाइये ॥

मंगल ९-सतगुरु दीन दयाल काल भय भेटिया। दीन्हां दीपक ग्यान अमर बर भेटिया ॥ हरि देखनको चाव गई सतसंगमें। बाठो अधिक सनेह भिजोई हरि रंगमें ॥ देख्यो अलख अपार अखंडित पूर है। झिलमिल होय सोई हरि नूर है॥ अगिन जले जल माहिं सिंधु बिन पाल है। चहुं भानु गम नाहिं जहाँ मेरा लाल है॥ एक सुन्य दोय सून्य सून्य लख चारि है। जाने कोई गुरुमुख संत विवेक विचारि है ॥ कहैं कवीर विचारि संत भल पावई। बसे अमर घर जाय बहुरि नहिं आवई ॥